बुजुर्ग माता-पिता बच्चों को संपत्ति से कर सकते हैं बेदखल: सुप्रीम कोर्ट
फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा—बढ़ती उम्र का मतलब अपमान या असुरक्षा नहीं, गरिमा से जीना हर व्यक्ति का अधिकार
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों के संपत्ति अधिकार और सम्मान को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि बुजुर्ग माता-पिता अपनी संपत्ति से बच्चों को बेदखल करा सकते हैं। अदालत ने कहा कि उम्र बढ़ने के साथ किसी व्यक्ति की गरिमा, सुरक्षा और सम्मान से समझौता नहीं किया जा सकता।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें वरिष्ठ नागरिकों के पक्ष में ट्रिब्यूनल द्वारा बेटे और बहू को मकान से बाहर करने के आदेश को रद्द कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि संबंधित कानून के तहत वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए ट्रिब्यूनल को ऐसे मामलों में बेदखली का आदेश देने का अधिकार है।
अदालत ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों से संबंधित कानून का उद्देश्य केवल संपत्ति विवादों का समाधान करना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराना भी है। यदि संतान या अन्य परिजन बुजुर्ग माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार करते हैं अथवा उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा डालते हैं, तो कानून उन्हें संरक्षण देने के लिए बनाया गया है।
बुजुर्गों का सम्मान सभ्य समाज की कसौटी
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी समाज की संवेदनशीलता का आकलन इस बात से किया जा सकता है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है। अदालत ने जोर दिया कि वरिष्ठ नागरिकों को अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में सम्मान, सुरक्षा और गरिमा के साथ रहने का अधिकार है।
फैसले से यह संदेश भी स्पष्ट हुआ कि संपत्ति पर अधिकार का इस्तेमाल बुजुर्ग माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार या उन्हें असुरक्षित महसूस कराने के लिए नहीं किया जा सकता।




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