ज़ीरकपुर की हाउसिंग सोसाइटियों में बदहाल हालात: बिल्डरों की लापरवाही पर उठे गंभीर सवाल
ज़ीरकपुर की उभरती रियल एस्टेट पहचान के पीछे एक कड़वी सच्चाई तेजी से सामने आ रही है। आधुनिक सुविधाओं और बेहतर जीवनशैली के दावों के बीच कई हाउसिंग सोसाइटियां आज बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रही हैं। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि शिक्षित और जागरूक वर्ग भी अव्यवस्था के बीच जीवन जीने को मजबूर है—जो सीधे तौर पर बिल्डरों की जवाबदेही और प्रशासनिक निगरानी पर सवाल खड़े करता है।
विशेष रूप से सुषमा ग्रुप द्वारा विकसित सोसाइटियों में सामने आ रही समस्याएं इस संकट की गंभीरता को उजागर करती हैं। ताज़ा मामला सुषमा सोसाइटी का है, जहां पिछले कई दिनों से बिजली आपूर्ति बाधित है। यह स्थिति किसी तकनीकी खराबी तक सीमित नहीं लगती, बल्कि रखरखाव और बैकअप इंफ्रास्ट्रक्चर की घोर कमी को दर्शाती है। 24×7 बिजली, पावर बैकअप और आधुनिक सुविधाओं के वादों के साथ बेचे गए फ्लैट आज अंधेरे में डूबे हुए हैं।
बिजली संकट का सीधा असर रोजमर्रा के जीवन पर पड़ रहा है। लिफ्ट बंद होने से बुजुर्गों और मरीजों को दिक्कतें हो रही हैं, पानी की सप्लाई बाधित हो रही है और छोटे बच्चों के लिए हालात असहनीय बनते जा रहे हैं। यह केवल असुविधा नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता से समझौता है—जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
निवासियों का आरोप है कि बार-बार शिकायतों के बावजूद बिल्डर और मेंटेनेंस प्रबंधन कोई ठोस समाधान देने में विफल रहे हैं। कॉल, ईमेल और शिकायत पोर्टल—हर स्तर पर गुहार लगाने के बाद भी समस्या जस की तस बनी हुई है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या फ्लैट बेचने के बाद बिल्डर अपनी जिम्मेदारियों से पूरी तरह पल्ला झाड़ लेते हैं?
रियल एस्टेट क्षेत्र के जानकारों के मुताबिक, ज़ीरकपुर और आसपास के इलाकों में पिछले कुछ वर्षों में तेजी से निर्माण हुआ है, लेकिन कई प्रोजेक्ट्स में बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर—जैसे स्थायी बिजली कनेक्शन, सीवरेज, पानी की सप्लाई और सुरक्षा व्यवस्था—को पूरी तरह विकसित किए बिना ही पजेशन दे दिया गया। यह प्रवृत्ति खरीदारों के हितों के साथ सीधा खिलवाड़ है।
यह भी सामने आया है कि कई खरीदार बिना प्रोजेक्ट की कानूनी स्थिति, बिजली कनेक्शन की स्वीकृति और अन्य जरूरी दस्तावेजों की पूरी जांच किए निवेश कर देते हैं। बिल्डर के आकर्षक विज्ञापन और ‘प्रीमियम लाइफस्टाइल’ के वादे अक्सर वास्तविकता से कोसों दूर होते हैं।
अब सवाल यह है कि क्या संबंधित प्रशासन और नियामक संस्थाएं इस स्थिति पर संज्ञान लेंगी? क्या बिल्डरों की जवाबदेही तय होगी, या फिर आम नागरिक इसी तरह बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करता रहेगा?
ज़ीरकपुर की सुषमा सोसाइटी का यह मामला केवल एक प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र में रियल एस्टेट सेक्टर की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान है। अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो ‘ड्रीम होम’ का सपना हजारों परिवारों के लिए एक अंतहीन परेशानी में बदलता रहेगा।
सबसे बड़ी बात यह मामला लगभग दो से तीन पुराना है और पिछले दो से तीन दिनों से लगातार सुषमा बिल्डर के मालिकों से संपर्क करने की कोशिश की जा रही है पर हर बार ना तो फोन उठाया जा रहा है ना ही व्हाट्सएप पर किसी प्रकार का कोई जवाब दिया जा रहा है ।

जिससे यह समझ में आता है कि सुषमा बिल्डर निवासियों की तो सुनता ही नहीं है साथ-साथ पत्रकारों के सवालों के जवाब से भी भागता हुआ नजर आ रहे हैं।
आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है इस बिल्डर की जो ना वह निवासियों की सुन रहे हैं ना ही पत्रकारों की ?




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