अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का कड़वा सच : महिला आरक्षित सीटें, पर पोस्टरों में पुरुषों की पहचान हावी
International Women’s Day के अवसर पर देशभर में महिलाओं के सशक्तिकरण और समान अधिकारों की बात की जा रही है, लेकिन पंचकूला नगर निगम चुनाव की तैयारियों के बीच महिलाओं कोलेकर जमीनी तस्वीर कई सवाल खड़े करती नजर आ रही है।
हरियाणा की अघोषित राजधानी माने जाने वाले पंचकूला में जल्द ही नगर निगम चुनाव होने वाले हैं। इन चुनावों में सात वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए हैं। चुनाव से पहले सभी संभावित उम्मीदवारों ने प्रचार तेज कर दिया है और शहर के चौक-चौराहों पर बधाई संदेशों और प्रचार के बोर्ड दिखाई देने लगे हैं।
हालांकि इन बोर्डों में एक खास पैटर्न साफ दिखाई देता है। जिन वार्डों में महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं, वहां उनके पोस्टरों पर उनकी तस्वीर के साथ-साथ पति, पिता या किसी अन्य पुरुष परिजन की तस्वीर भी प्रमुखता से लगाई जा रही है। कई जगहों पर तो पुरुष परिजन की पहचान और नाम अधिक प्रमुख नजर आते हैं।
यह स्थिति उस बहस को फिर से सामने लाती है कि क्या महिलाओं को आरक्षण मिलने के बावजूद राजनीति में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने का पूरा अवसर मिल पा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कई बार सामाजिक और पारिवारिक प्रभाव के कारण महिला उम्मीदवारों को अपनी पहचान से ज्यादा परिवार की पहचान के सहारे प्रचार करना पड़ता है।
नगर निगम चुनाव के प्रचार में दिख रही यह तस्वीर एक बड़ा सवाल छोड़ती है—क्या महिलाएं अपने दम पर चुनावी पहचान बना पाने में
अभी भी संघर्ष कर रही हैं, या फिर यह केवल राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। महिला आरक्षण का उद्देश्य महिलाओं को नेतृत्व के अवसर देना है, लेकिन असली सशक्तिकरण तब माना जाएगा जब उनकी पहचान किसी और के सहारे नहीं, बल्कि उनके अपने काम और नेतृत्व से बने।




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