सोशल मीडिया का बढ़ता असर : कम उम्र में शादी की जिद ने बढ़ाई अभिभावकों और प्रशासन की चिंता
डिजिटल दौर में सोशल मीडिया जहां संवाद और अभिव्यक्ति का बड़ा मंच बन चुका है, वहीं इसके कुछ चिंताजनक सामाजिक प्रभाव भी सामने आने लगे हैं। उदाहरण के तौर पर मध्य प्रदेश के इंदौर जिले में हाल के महीनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें नाबालिग किशोर-किशोरियां सोशल मीडिया पर बने रिश्तों को विवाह तक ले जाने की जिद कर रहे हैं। स्थिति यह है कि कई अभिभावक अब प्रशासन और बाल संरक्षण तंत्र से मदद मांगने को मजबूर हो रहे हैं। न सिर्फ मध्य प्रदेश बल्कि कई अन्य राज्यों में भी लगभग ऐसे ही स्थिति बन रही है।
महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों के अनुसार, बाल विवाह रोकथाम अभियान के दौरान अब एक नई चुनौती उभरकर सामने आई है। पहले जहां प्रशासन को परिवारों द्वारा कराए जा रहे बाल विवाहों को रोकने पर ध्यान देना पड़ता था, वहीं अब कई मामलों में बच्चे स्वयं विवाह या साथ रहने की इच्छा जताते हुए परिवारों पर दबाव बना रहे हैं।
हाल ही में एक ग्रामीण क्षेत्र में सामने आए मामले ने इस प्रवृत्ति को उजागर किया। उसके बाद सरकार का भी ध्यान ऐसे मामलों को रोकने पर लग गया है। एक मामले में एक किशोरी की सोशल मीडिया के माध्यम से हुई दोस्ती कुछ ही समय में भावनात्मक संबंध में बदल गई। जब परिवार ने कानूनी उम्र पूरी होने तक इंतजार करने की बात कही तो उसने घर छोड़ने की चेतावनी दे दी। बाद में बाल संरक्षण अधिकारियों और काउंसलरों की मदद से स्थिति को संभाला गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि इंस्टाग्राम, फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लगातार संपर्क, भावनात्मक निर्भरता और फिल्मों-वेब सीरीज से प्रभावित रिश्तों की अवधारणा किशोरों को जल्दबाजी में बड़े फैसले लेने के लिए प्रेरित कर रही है। कम उम्र में रिश्तों को लेकर बनने वाली यह गंभीरता कई बार शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य की संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।
अधिकारियों के अनुसार, अधिकांश मामलों में सख्त कार्रवाई के बजाय काउंसलिंग अधिक प्रभावी साबित हो रही है। बच्चों को कानूनी प्रावधानों, स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों, शिक्षा के महत्व और भविष्य की जिम्मेदारियों के बारे में समझाकर उनकी सोच बदलने का प्रयास किया जा रहा है। इसके साथ ही आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और स्थानीय बाल संरक्षण इकाइयों को संवेदनशील परिवारों के नियमित संपर्क में रहने के निर्देश दिए गए हैं।
लगभग सभी राज्यों में पुलिस, शिक्षा विभाग और महिला एवं बाल विकास विभाग संयुक्त रूप से स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता अभियान भी चला रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या केवल बाल विवाह की नहीं, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के प्रभाव में आकर किशोरों द्वारा भावनात्मक निर्णय लेने की बढ़ती प्रवृत्ति की है।
सामाजिक जानकारों का मानना है कि तकनीक को दोष देने के बजाय परिवार, स्कूल और समाज को बच्चों के साथ संवाद मजबूत करना होगा। क्योंकि सोशल मीडिया की दुनिया में एक क्लिक से बनने वाले रिश्ते कई बार वास्तविक जीवन की जटिलताओं और जिम्मेदारियों को समझे बिना ही बड़े फैसलों की ओर ले जा रहे हैं। ऐसे में जागरूकता, संवाद और समय पर मार्गदर्शन ही इस नई सामाजिक चुनौती का सबसे प्रभावी समाधान माना जा रहा है।


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