शायद तुम मेरे हो जाओ
शायद तुम मेरे हो जाओ,
क्या पता मेरी किस्मत भी मुस्कुरा जाए,
जो बरसों से ख़ामोश है मेरे भीतर,
शायद वो भी कोई गीत गुनगुना जाए।
क्या पता मेरी आँखों में ठहरा हुआ ये इंतज़ार,
तुम्हारे आने से ख़्वाब बन जाए,
जो अधूरी-सी लगती है मेरी ज़िंदगी,
शायद तुम्हारे साथ पूरी हो जाए।
क्या पता मैं फिर से मुस्कुराने लगूँ,
तुम्हारा नाम मेरी दुआ बन जाए,
तुम्हारे होंठों पर जब मेरा ज़िक्र हो,
तो मेरी हर उदासी कहीं खो जाए।
मैंने माँगा नहीं है तुमसे बहुत कुछ,
बस इतना-सा ख़्वाब सजाया है,
जब दुनिया मुझे समझ न पाए,
तुमने मेरा हाथ थामकर
बस इतना कहना—
“मैं हूँ ना…”
शायद फिर डरना छोड़ दूँ मैं,
शायद फिर सपने देखने लगूँ,
तुम्हारी आँखों में अपना कल देखकर,
मैं अपने आज को सँवारने लगूँ।
अगर मेरी किस्मत में लिखा हो तुम,
तो कोई शिकायत नहीं रहेगी,
मेरी सारी अधूरी दुआओं को
शायद एक मंज़िल मिल जाएगी।
और अगर ईश्वर को मंज़ूर हुआ,
तो तुम मेरे हो जाओगे,
मेरी हर ख़ामोशी समझोगे,
मेरे हर आँसू का कारण जानोगे।
मैं तुम्हें पाने की ज़िद नहीं करती,
बस तुम्हें अपनी दुआ में रखती हूँ,
क्योंकि प्रेम में अधिकार कहाँ होता है,
मैं तो बस तुम्हारी ख़ुशी माँगती हूँ।
फिर भी दिल के किसी कोने में
एक छोटी-सी आस रहती है—
क्या पता तुम मेरे हो जाओ,
क्या पता मेरी दुनिया सँवर जाए,
क्या पता तुम्हारे साथ चलते-चलते
मेरी हर अधूरी राह निखर जाए।
क्या पता मेरी हथेली की लकीरों में
तुम्हारा नाम सच हो जाए,
और जिस प्रेम को आज
मैं सिर्फ़ दुआ समझकर माँगती हूँ,
क्या पता वही प्रेम
एक दिन मेरा नसीब हो जाए।
लेखिका जूही अग्रहरी





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