खरी-अखरी : देश के पालिटिकल सिस्टम की लगाम और नकेल थामे चुनाव आयोग भी जं जी के निशाने पर है क्या !
2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लालकिले की प्राचीर पर खड़े होकर देशवासियों को भरोसा दिलाया था कि आगामी 15 अगस्त के पहले स्वच्छ भारत का, देशभर के हर स्कूल में शौचालय होने का और जनधन योजना का। लेकिन 12 बरस बाद भी देश के हर स्कूल में शौचालय नहीं है। जनधन योजना के तहत खोले गए अकाउंट में से आधे से ज्यादा अकाउंट खाली पड़े हैं। यानी जन के भीतर धन नहीं है। और यह तो भारत के रिजर्व बैंक ने ही बता दिया है खातों में पैसा भेजा ही नहीं जाता है। 2015 के 15 अगस्त के दिन फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लालकिले पर खड़े होकर 2014 में किए गए वादों पर मिट्टी डालते हुए देशवासियों से नया वादा किया कि एक साल के भीतर किसानों की आय दोगुनी कर देंगे और हर सांसद इस से लेकर हर आने वाले साल में कम से कम एक गांव को गोद लेकर उसे आदर्श गांव बनाएगा। लेकिन प्रधानमंत्री के दोनों ऐलान खारिज हो गये। एक साल तो छोड़िए 12 साल बाद भी ना तो किसानों की आय दोगुनी हुई ना ही किसी सांसद द्वारा गोद लिया गया गांव आदर्श गांव बन सका है बल्कि सांसदों द्वारा गोद लिए गए गांवों की हालत सालभर के भीतर बद से बदतर जरूर हो गई है। इसके बाद तो शायद ही किसी सांसद ने किसी गांव को गोद लिया हो। इस जमात में खुद पीएम मोदी भी शामिल हैं। पिछले दो बरस के ऐलान पर राख डालते हुए 2016 को स्वतंत्रता दिवस के दिन एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लालकिले पर आये और नया भारत बनाने पर जोर दिया। उसमें किसान, गरीब, गाँव सबका जिक्र था। लेकिन आज भी कई गांव बिजली विहीन हैं। 2017 में प्रधानमंत्री ने फिर स्वतंत्रता दिवस के दिन लालकिले पर खड़े होकर एकबार फिर न्यू इंडिया का जिक्र किया। जिसमें करप्शन, ब्लैकमनी और टेररिज्म को खत्म करने का वादा देशवासियों से किया गया। लेकिन हो इसका उल्टा गया। करप्शन आर्गेनाइज्ड हो गया, ब्लैकमनी तो स्विस बैंक में ही बढ़कर दुगनी हो गई और टेररिज्म से आज भी लड़ाई लड़ी जा रही है। 2018 में स्वतंत्रता दिवस के दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लालकिले पर खड़े होकर देशवासियों से वादा किया कि 2022 तक भारत पूरी तरह से स्वच्छ हो जाएगा। सभी घरों में बिजली पहुंच जाएगी। एलपीजी का लक्ष्य पूरा कर लिया जाएगा। लेकिन ये सारी चीजें आज भी अधर में लटकी हुई हैं।
2019 में 15 अगस्त को लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ऐलान किया गया कि हर घर नल जल होगा। 2024 तक भारत की इकाॅनामी पांच ट्रिलियन डॉलर हो जाएगी ना नौ मन तेल हुआ ना राधा नाची। 2024 कब का निकल गया। भारत की इकाॅनामी पांच ट्रिलियन डॉलर तो बहुत दूर की कौड़ी है चार ट्रिलियन डॉलर भी नहीं पहुंच पाई है यानी आज की स्थिति में भारत की इकाॅनामी 3.96 ट्रिलियन डॉलर पर खड़ी हुई है। 2020 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त को लालकिले पर खड़े होकर जोरशोर से आत्मनिर्भर भारत का जिक्र किया। लेकिन हुआ क्या चीन के साथ इंपोर्ट बढ़ गया। दुनिया के बाजार से तेल खरीदने में इजाफ़ा हो गया। 2021 में प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त के दिन लालकिले से जिस 100 लाख करोड़ की गतिशक्ति का जिक्र किया उस पर नीति आयोग ने ही ऊंगली उठा कर पलीता लगा दिया। 2022 में स्वतंत्रता दिवस के दिन लालकिले से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी साल दर साल के ऐजेंडे से छुटकारा पाने के लिए सीधे 25 साला छलांग लगाते हुए कहा गया कि 2047 तक भारत विकसित भारत बन जाएगा। पंच प्राण – विकसित भारत, गुलाम मानसिकता से मुक्ति, विरासत पर गर्व, एकता और नागरिक कर्तव्य का जिक्र किया गया। लेकिन एकता के सवाल पर पहली बार देश में सत्ता की निगाहों और निशाने पर देश के ही नागरिक आ गए।
2023 में 15 अगस्त के दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लालकिले पर खड़े होकर बड़े जोरशोर से कहा कि पांच साल के भीतर भारत की इकाॅनामी दुनिया की शीर्ष इकाॅनामी बन जाएगी जबकि आज की स्थिति में वह दुनिया की इकाॅनामी में छठवें पायदान पर खड़ी हुई है। देश की करेंसी डाॅलर के सामने रोज नतमस्तक हो रही है। यानी यह आज भी असंभव सी चीज बनी हुई है। 2024 में 15 अगस्त को एकबार फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लालकिले पर खड़े होकर 2047 तक विकसित भारत और इकाॅनामी को लेकर तरह-तरह की बातें की। पिछले बरस यानी 2025 में भी 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लालकिले की प्राचीर से 2047 तक विकसित भारत बनने का जिक्र किया जिसमें रोजगार योजना होगी। और 2026 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लालकिले पर खड़े होकर 15 अगस्त के दिन एकबार फिर से वही तीन साल से अलापे जा रहे राग का गायन करते हुए कहा कि 2047 तक भारत विकसित भारत बन जाएगा। पिछले तीन सालों से एक ही बात को बार बार दुहराने एक एक ही मतलब और मायने निकाला जा सकता है कि फेलुअर सिचुएशन में संसद भी है और फेलुअर सिचुएशन में साल दर साल स्वतंत्रता दिवस के दिन लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किए जा रहे ऐलान भी हैं।
आजादी के बाद से ही हर कौम में कौम की रहनुमाई के नाम पर नेताओं की पौध इसलिए उपजती चली गई क्योंकि भारत की राजनीति के शुरूआती दौर में ही इस बात को लेकर बहस छिड़ने लगी थी कि कौम विशेष की नुमाइंदगी करने के लिए कौम विशेष का नेता ही होना चाहिए। यानी दलितों के दुख दर्द, आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन, माइनाॅरिटीज के साथ होने वाला सौतेला व्यवहार इन सबसे निजात दिलाने के लिए इसी कौम के बीच से नेता होना चाहिए अन्यथा उस कौम के साथ न्याय नहीं हो पायेगा। जबकि हकीकत यह है कि सबकी नजर में केवल और केवल वोट बैंक समा चुका था। ताजातरीन उदाहरण तो खुद वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही हैं। जिन्होंने खुद को खुलेआम ओबीसी वर्ग का बोल कर कौमाई कार्ड खेला। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री बनने के बाद तो उन्होंने अनेकों जगह छाती ठोंक कर ऐलान किया कि वे भारत के इकलौते ओबीसी प्रधानमंत्री हैं। यानी भारत के भीतर आजादी के बाद शुरू हुई चुनावी राजनीति में हर जाति, हर धर्म को लेकर सवाल उठे और उसको वोट बैंक के नजरिए से देखते हुए उनके प्रतिनिधित्व को उस जाति विशेष और धर्म विशेष के साथ जोड़ा भी गया।
लेकिन भारतीय राजनीतिक इतिहास में संभवतः पहली बार हुआ है जब छात्रों से जुड़े हुए मुद्दे जं जी, जं अल्फा के द्वारा देश के सामने आये, तो क्या सत्ता पक्ष और क्या विपक्ष दोनों यह कहते हुए कतारबद्ध आमने सामने आ गए कि वे जं जी, ज अल्फा, युवाओं को अच्छी तरह से जानते हैं। उनके मुद्दों को तरजीह देते हैं और उसी हिसाब से काम करेंगे। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लालकिले पर खड़े होकर यह कहने के लिए विवश हो गये कि “युवाओं के आसरे ही तो विकसित भारत होगा”। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यह बात देश को हजम नहीं हो रही है क्योंकि बीते महीने भर के भीतर दिल्ली और राज्य दर राज्य जिस तरह से जं जी, जं अल्फा, युवाओं के साथ अमानवीयता की पराकाष्ठा को लांघ कर जो कुछ किया गया और जिसे पूरी दुनिया ने अपनी नंगी आंखों देखा। इसके बावजूद भी जब युवा, जं जी और जं अल्फा टस से मस नहीं हुआ तो झक मार कर मोदी सत्ता को नतमस्तक होना पड़ा और वह करना पड़ा जो बीते बारह बरस में नहीं किया।
एक झटके में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को हटा दिया गया वह भी आंदोलन के चलते 12 घंटे के अंदर । हैदराबाद की एक लाॅ युनिवर्सिटी के छात्रों ने चीफ जस्टिस आफ इंडिया जस्टिस सूर्य कांत के हाथों से डिग्री लेने से मना कर दिया तो बार कौंसिल आफ इंडिया के अध्यक्ष व बीजेपी द्वारा बनाए गए राज्यसभा सांसद मनन मिश्रा सीजेआई की आंखों का तारा बनने के लिए यह फरमान जारी करते हुए सामने आए कि इन छात्रों को भारत के किसी भी न्यायालय में वकालत करने के लिए पंजीकृत नहीं किया जाएगा और चंद मिनट के भीतर ही इस हिटलरी फरमान पर जिस तरह की राष्ट्रव्यापी प्रतिक्रिया निकल कर सामने आई उसने चीफ जस्टिस आफ इंडिया को झुकने के लिए मजबूर कर दिया और उन्होंने मनन मिश्रा को यह कहते हुए फटकार लगाई कि “मेरे और छात्रों के बीच में अपनी टांग अड़ाने वाले तुम कौन होते हो”। सीजेआई ने साफ तौर पर चेतावनी देते हुए कहा कि “आप डेमोक्रेटिक कंट्री में डिक्टेटर की तरह काम नहीं कर सकते हैं। छात्रों को अपनी राय, अपनी अभिव्यक्ति व्यक्त करने का हक है। आप उसमें रोक नहीं लगा सकते हैं क्योंकि आप एक संस्थान विशेष के चेयरमैन हैं”। और इसके बाद झक मार कर मनन मिश्रा को तत्काल अपना हिटलरी फरमान वापस लेना पड़ा।
पिछले बारह बरस से पालिटिकल तौर पर राजनीतिक परिस्थितियों में संसद के भीतर क्या हो रहा था ? बीते 12 साल से देश की न्यायपालिका क्या कर रही थी ? बीते 12 साल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बारह बार लालकिले की प्राचीर पर तिरंगा फहराने के बाद देश को हसीन सपने दिखा कर वादे पर वादा करते रहे लेकिन सब कुछ “आगे पाठ पीछे स्पाट” होता रहा। लेकिन जैसे ही अचानक एक झटके में देशभर के छात्र एकजुट होकर सामने आए तो मौजूदा राजनीतिक सत्ता को एकजुटता के मतलब और मायने समझ में आने लगा। यह सब कुछ इसलिए संभव हुआ क्योंकि इसमें कोई भी पालिटिकली सिचुएशन नहीं है। छात्रों ने अभी तक अपने आपको किसी पालिटिकल पार्टी या वोट बैंक के नजरिए से देखा ही नहीं है। लेकिन हर पालिटिकल पार्टी के भीतर एनालिसिस शुरू हो गया है।
क्या यह समाज के भीतर होने वाला चर्निंग है, बदलाव है, एक पालिटिकल ट्रांसफार्मेशन है और यह एक ऐसा पालिटिकल ट्रांसफार्मेशन है जो युवाओं, जं जी, जं अल्फा के भीतर समा चुका है और वहां तक पहुंचने का सामर्थ्य मौजूदा वक्त की पार्लियामेंट्री पालिटिकल सिस्टम के पास तो बिल्कुल भी नहीं है। देशभर में जं जी, जं अल्फा अपना दुख दर्द बताने के लिए सामने आकर खड़े हो गए हैं। सवाल है कि ऐसे में सरकार करेगी क्या ? उन्हें कैसे रोकेगी ? क्या यह पालिटिकल सिचुएशन आने वाले समय में उस पार्लियामेंट्री पालिटिकल सिचुएशन से टकराने वाली है ? या टकराएगी ? जिसमें बीते 70-80 बरस से हर पालिटीशियन यही मानकर चल रहा है कि संसदीय विशेषाधिकार से सुसज्जित होकर वही प्रतिनिधित्व कर रहा है। जबकि हकीकत यह है कि जनता से उसका प्रत्यक्ष जुडाव है ही नहीं। वह संसद की चारदीवारी के भीतर बैठ कर अपना वेतन, भत्ता बढ़ा रहा है, अपनी सुख सुविधाओं के मनमाना इजाफ़ा करते चला जा रहा है। उसका जनता से कोई सरोकार है ही नहीं। यह सवाल जं जी, जं अल्फा और युवाओं के जहन में उतरता चला जा रहा है, इसे रोकेंगे कैसे ? और अगर नहीं रोक पाए तो क्या अपनी-अपनी छत टटोलने, सुरक्षा खोजने के लिए निकल पड़ेंगे ? क्या पार्लियामेंट्रीज और पार्लियामेंट्री पालिटिक्स के बीच एक सहमति बन जाएगी ? राजनीति और राजनीतिज्ञों का चरित्र बताता है कि सहमति बन जाएगी और इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि जिस दिन झारखंड में छात्रों के ऊपर डंडे बरस रहे थे उसी दिन दिल्ली में एक पालिटीशियन के पारिवारिक फंक्शन में केर-बेर (सत्ताधारी-विपक्षी) गलबहियाँ डाले गुलाब जामुन खा रहे थे।
तो क्या यह पालिटिकल ट्रांसफार्मेशन देश में उसी जं जी के भीतर से किसी को खड़ा करेगा ? क्या वही जं जी इस देश के पालिटिकल सिस्टम में बदलाव करेगा ? शायद इसीलिए मौजूदा राजनीतिक सत्ता के मुखिया द्वारा लालकिले से जं जी को बांटने का ऐलान किया जा चुका है और उस पर तमाम राजनीतिक पार्टियां चिंतन-मनन भी करने लग गई हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लालकिले से “दिमागी नक्सली” शब्द का उच्चारण एक सोची समझी साजिशन रणनीति के तहत ही किया है.! देश में अर्बन नक्सल शब्द इसीलिए लाया गया था कि “देश के जंगल विनाश करने के लिए कार्पोरेट्स को सौंप दिए जाएं और जो उसका विरोध करे उसे अर्बन नक्सली करार देकर विरोध की आवाज खारिज कर दी जाए। लेकिन वर्तमान सिचुएशन अलग सी है। देश के भीतर की असमानता, गरीबी, मुफलिसी, बेरोजगारी, इसके बाद एज्युकेशन, पेपर लीक, नौकरी ना मिलना, इसके बाद इन तमाम चीजों की निगरानी करने वाले आर्गनाइजेशन के नौकरशाह, उन नौकरशाहों पर पालिटीशियंस की कमांड, उन पालिटीशियंस के जीतने और आगे बढ़ने के लिए पालिटिकल फंडिंग का रास्ता, उस पालिटिकल फंडिंग में करप्शन, करप्शन के दायरे में एक पूरा नेक्सेस, जो अपनी हथेली में देश को समेटे हुए है और उस हथेली के अंदर लालकिला और संसद सब कुछ समेटा जा चुका है तभी तो सभी हाजिर थे पार्टी में गुलाब जामुन खाने के लिए ! जं जी और युवाओं का यह आक्रोश क्या अब उस दिशा में बढ़ जाएगा जो पालिटिकल सिस्टम की नकेल और लगाम अपने हाथ में पकड़े हुए है यानी इलेक्शन कमीशन। फेसलेस को आगे करके अब देश पूछ रहा है आजादी के 80 साल बाद भी कहाँ है आजादी ? किसके लिए है आजादी ?
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार



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