खरी-अखरी : बुरे दिन नहीं आयेंगे यह कहने की ताकत भारत के भीतर किसी के पास नहीं है
बुरे दिन नहीं आयेंगे यह कहने की ताकत भारत के भीतर किसी के पास नहीं है
IF BE TAKE A STEP BACK A LITTLE AND REFLECT EVERY GLOBAL SHOCK IN THE LAST FIVE TO SIX YEARS HAS COMPOUNDED THE PREVIOUS SHOCK LEAVING VERY LITTLE TIME FOR RECOVERY THE NOTION OF RESILIENCE HAS THERE FOR BEEN TESTED WORLD WIDE LIKE NEVER BEFORE IN SUCH A SCENARIO THE INDIAN ECONOMY NOT ONLY VISTUDE EACH OF THESE SHAKES BUT EMERGE EVEN STRINGER AFTER EVERY CRISIS THE OUTCOMES ARE NOT BY ACCIDENT THEY ARE THE RESULT OF THOUGHTFUL POLICY CHOICES AND RESILIENT BUFFERS BUILT OVER THE LAST 10 TO 12 YEARS. यह उस बयान का अंश भाग है जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रिंसिपल सेक्रेटरी, रिजर्व बैंक के गवर्नर रह चुके शक्तिकांत दास ने सीआईआई की बैठक में दिया है। दुनिया में ना जाने कितने झटके लगे लेकिन भारत हर झटके से अछूता रहा। भारत के सामने कोई संकट नहीं है। यह बयान इस बात का प्रमाणीकरण है कि सरकार जब दिल्ली की लाल दीवारों के भीतर कैद रहती है तो उसका नजरिया बहुत साफ और इतना शानदार होता है कि वह कहती है कि सब कुछ बहुत सुंदर और बेहतरीन है। प्रधानमंत्री भी कमोबेश इन्हीं बातों का जिक्र अपनी कैबिनेट की बैठक या कोर ग्रुप की बैठक में करते हुए सुनहरे सपने जरूर देखते होंगे !
लेकिन एसबीआई ने जो रिपोर्ट जारी की है वह मोदी सरकार के रंगीन सपनों को बदरंग डरावनी तस्वीर में बदलती हुई लग रही है। उस रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी डॉलर अगर 95 पर टिका रहता है तो भी भारत की इकाॅनामी 4 ट्रिलियन डॉलर तक ही पहुंचेगी यानी जो 5 ट्रिलियन डॉलर की इकाॅनामी का सपना दिखाया गया है वह कम से कम 2029 तक तो सपना ही रहेगा। जबकि हकीकत यह है कि रूपया डाॅलर के मुकाबले निरंतर गिर रहा है वह 95 का आंकड़ा तो पार कर ही चुका है और जिस तेजी के साथ नीचे की ओर लुढ़क रहा है पता नहीं कब वह सौ के आंकड़े को पार कर ले यह भी अपने तौर पर आरबीआई की रिपोर्ट बताती है । साथ ही जिस तरीके से अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड आयल की कीमत बढ़ रही है जो कि फिलहाल 105 डाॅलर प्रति बैरल है। तो यह तय मान कर चलना चाहिए कि भारत की इकाॅनामी 3 – 3.5 ट्रिलियन डॉलर पर आकर खड़ी हो जाएगी। देश का भुगतान संतुलन गड्डमड्ड हो जायेगा। एक्सपोर्ट इंपोर्ट को बैलेंस करने में दिक्कतें पैदा होंगी। वैसे भी लाजिस्टिक की कीमतें बढ़ रही है। परिवहन मंहगा हो रहा है। बीमा की लागत बढ़ रही है। इन सबके बीच ऐसे हालात पैदा हो सकते हैं कि विदेशों में गए हुए भारतियों के लिए सरकार को विशेष पैकेज के तहत बाण्ड जारी करना पड़ जायेगा ।
युध्द की परिस्थितियों के बीच कमोबेश हर देश के सामने वैश्विक बाजार में बढ़ने और अपनी इकाॅनामी को संभालने की चुनौती है। इसी कड़ी में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भी फिक्र उन पांच – सात फीसदी भारतियों को लेकर है जो सेल्फ एम्पलाइड हैं, जो अपने तौर पर प्रोफेशनल्स हैं, जो देश की इकाॅनामी को समझते हैं और कार्पोरेट भी उसके दायरे में आता है। लेकिन भारत के भीतर अजीबोगरीब परिस्थिति यह है कि भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां पर कार्पोरेट्स के बीच में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। यहां पर तो जब एक कंपनी दूसरी कंपनी को खरीदने जाती है तभी एक तीसरी कंपनी सामने आती है जो सत्ता के काफी करीब है तो उसे ही बड़ी बेफिक्री के साथ सब कुछ सौंप दिया जाता है। यहां तक कि मामला सुप्रीम कोर्ट में जाने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी सत्ता की करीबी कंपनी के पक्ष में ही आता है। यानी सब कुछ चंद हथेलियों में सिमटा हुआ है। भारत के कार्पोरेट्स सबसे कम रोजगार देते हैं फिर भी उनका नेटवर्थ दुनिया के तमाम देशों के बड़े बड़े कार्पोरेट्स और उन देशों की जीडीपी के मुकाबले कहीं ज्यादा है। तो सहज ही समझा जा सकता है कि भारत के भीतर डवलपमेंट का मतलब क्या होता है, रईसी के मायने क्या होते हैं और सरकार का नजरिया क्या है? स्वाभाविक है इन परिस्थितियों में सत्ता से करीबी नहीं रखने वाले बिजनेसमैन और कार्पोरेट्स डरे हुए हैं।
देश के भीतर इसका भी संकट खड़ा हो गया है कि डाॅलर की आवक रुक गई है और जावक बढ़ गई है। इसे ऐसा समझें कि जो 100 डाॅलर आते थे वह अब 20 डाॅलर ही आ रहे हैं तथा जो 100 डाॅलर जा रहे थे वो अब 200 डाॅलर में तब्दील हो चुके हैं। यानी खतरे की घंटी बज रही है क्योंकि देश के भंडार पर जहां फाॅरेन करेंसी है उस पर हमला हो रहा है। सरकार के इकाॅनामिक सर्वे का आंकड़ा बताता है कि देश के भीतर सेल्फ एम्प्लॉइज की औसत कमाई (शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों को मिलाकर) 16000 तथा रेगुलर एम्प्लॉइज की औसत कमाई 22000 से ज्यादा नहीं है। इसी तरह कैजुअल लेबर औसतन 450 कमा पाता है। तो सवाल है कि इन तीनों कैटेगरी में आने वाले लोग कितनी गाड़ियां रख सकते हैं ? कितनी विदेश यात्राएं कर सकते हैं ? कितना सोना (गोल्ड) खरीद सकते हैं ? कितना मंहगा खाने का तेल इस्तेमाल कर सकते हैं ?
अमेरिका-इजराइल का ईरान के साथ युद्ध शुरू होने से पहले सरकार के खजाने में जो 728 बिलियन डॉलर था वह युध्द कालखंड में 40 बिलियन डॉलर घट कर 690 बिलियन डॉलर हो गया है अगर ऐसी ही परिस्थितियां बनी रहती है तो यह जुलाई तक 500 बिलियन डॉलर से नीचे आ सकता है। उससे बड़ा संकट तो इसको लेकर भी है कि वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ ने जो कर्ज भारत को दिया है वह कब पटेगा, कब नहीं पटेगा यानी कब मियां मरेंगे कब रोजा घटेंगे लेकिन उस पर जो ब्याज दिया जा रहा है वह भी 20-27 फीसदी से बढ़कर 50 फीसदी तक पहुंच सकता है। देश के भीतर शेयर बाजार की वैल्यू लगातार कम हो रही है। विदेशी निवेशकों द्वारा औसतन 15000 हर दिन निकाले जा रहे हैं। एसबीआई, टीसीएस, एयरटेल और एल एंड टी को मिलाकर लगभग सवा लाख करोड़ की वैल्यू कम हो चुकी है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से एक साल तक गोल्ड नहीं खरीदने का फरमान जारी कर देश के भीतर ज्वेलरी कारोबार में जुड़े हुए करीब तीन करोड़ से ज्यादा लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा कर दिया है। यानी भारत के भीतर वैसे ही बेरोजगारी अपने चरम पर है उस पर बेरोजगारी का नया राक्षस पैदा किया जा रहा है। देश में लगभग 6 लाख ज्वेलरी की दुकानें हैं। उसमें 2 लाख हाॅलमार्क रजिस्टर्ड हैं बाकी 4 लाख के करीब छोटे दुकानदार, सुनार, कारीगर, मैन्यूफैक्चर्स, होलसेलर्स, रिफाइनर, डिजाइनर हैं। गोल्ड के साथ टेक्सटाइल, आयल और फर्टिलाइजर को भी मिला लेना चाहिए।
क्या यह सब कुछ सिर्फ बीते 35-40-45 दिनों का खेल है ? ऐसा नहीं है। यह एक लंबी कतार है जो नोटबंदी से शुरू होकर जीएसटी पर जाकर खड़ी होती है। उसके बाद कार्पोरेट्स और सत्ता का नेक्सेस सब कुछ कार्पोरेट्स के हवाले कर दिया जाता है। पब्लिक सेक्टर को खत्म किया जाने लगता है। पब्लिक सेक्टर के मातहत आने वाली इंडस्ट्री को दिए जाने वाला सरकारी बजट कम किया जाने लगता है। सरकारी संस्थानों में नियमित भर्ती करने की जगह कान्ट्रेक्ट पर रखने का चलन शुरू हो जाता है।
भारत के भीतर कई भारत बसते हैं और हर भारत की आर्थिक स्थिति दूसरे भारत से बिल्कुल अलग है। जिसका आर्थिक पैमाना आज तक ना तो नीति आयोग बता पाया है ना ही रिजर्व बैंक की रिपोर्ट कुछ कह पाई है। यहां तक कि पार्लियामेंट के भीतर सरकार भी यह बता नहीं पाई है कि देश के भीतर मजदूरों की तादाद कितनी है और वो कमाई कितना कर लेते हैं।
क्या यह सिर्फ एक संकट भर है। नहीं। यह दरअसल उस सफर का अंत है जो सफर इस देश के भीतर अच्छे दिन आयेंगे के राग से शुरू हुआ और बुरे दिन नहीं आयेंगे यह कहने की ताकत किसी के पास नहीं है। वह चाहे प्रधानमंत्री हों, फाॅरेन मिनिस्टर हों, कामर्स मिनिस्टर हों, प्राइम मिनिस्टर के ईर्द-गिर्द घेरा बनाकर बैठे वो इकाॅनामिस्ट हों जो दुनिया की इकाॅनामी में करोड़ों रुपये की चीजों को तो उठाते बैठाते हैं लेकिन करोड़ों लोगों की आजीविका पर आने वाले संकट को लेकर खामोशी बरत लेते हैं।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार



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