‘समाज सेवा’ या सियासी गणित? निकाय चुनावों में बहु-वार्ड दावेदारी पर भी उठे सवाल !
नगर निगम चुनावों में उम्मीदवारों की सक्रियता एडीबी तेज हो गई है, लेकिन इस बार एक नया ट्रेंड चर्चा में है—एक ही नेता द्वारा अलग-अलग वार्डों से दावेदारी या परिवार के अन्य सदस्यों को मैदान में उतारना। इसे लेकर राजनीतिक हलकों में ‘समाज सेवा’ बनाम ‘सियासी रणनीति’ की बहस छिड़ गई है।
नई वार्डबंदी और आरक्षण व्यवस्था के बाद कई नेताओं के पारंपरिक वार्ड बदल गए हैं। कहीं सामान्य सीट महिला आरक्षित हो गई, तो कहीं आरक्षण के कारण पुराने समीकरण टूट गए। ऐसे में कई नेता अब दूसरे वार्डों से चुनाव लड़ने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि कुछ मामलों में टिकट न मिलने की स्थिति में पत्नी या परिवार के सदस्य को उम्मीदवार बनाने की रणनीति अपनाई जा रही है।
आलोचकों का कहना है कि इसे ‘समाज सेवा का जज्बा’ बताना वास्तविकता से दूर है। उनका तर्क है कि यदि सेवा का उद्देश्य ही प्रमुख होता, तो स्थानीय कार्यकर्ताओं और नए चेहरों को भी अवसर दिया जाता। इसके उलट, एक ही राजनीतिक समूह द्वारा अलग-अलग वार्डों में पकड़ बनाए रखने की कोशिश लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा को सीमित करती है।

चुनावी विश्लेषकों के अनुसार, नगर निकायों में बढ़ती आर्थिक गतिविधियां और बजट आकार भी इस रुझान के पीछे एक कारण माने जाते हैं। स्थानीय निकायों में ठेकों, परियोजनाओं और विकास कार्यों से जुड़े निर्णयों का प्रभाव बढ़ने के साथ ही इन पदों की राजनीतिक अहमियत भी बढ़ी है। यही वजह है कि पार्षद से लेकर मेयर पद तक के लिए दावेदारों की संख्या में तेजी देखी जा रही है।
विपक्षी स्वर यह भी सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह प्रवृत्ति स्थानीय नेतृत्व को कमजोर कर रही है। उनका कहना है कि हर वार्ड की अपनी समस्याएं और प्राथमिकताएं होती हैं, जिन्हें समझने के लिए जमीनी जुड़ाव जरूरी है। बाहरी दावेदारों के आने से स्थानीय प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।
हालांकि, दावेदारों का पक्ष अलग है। उनका कहना है कि वे वर्षों से विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं और जहां से भी जनता समर्थन दे, वहां से चुनाव लड़ना उनका अधिकार है। वे इसे व्यापक जनसेवा का विस्तार बताते हैं।
इस बीच, मतदाताओं के सामने चुनौती यह है कि वे प्रचार और दावों के बीच वास्तविक काम और विश्वसनीयता का आकलन करें। साफ है कि इस बार निकाय चुनाव केवल उम्मीदवारों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी नीयत और प्राथमिकताओं की भी परीक्षा बनने जा रहे हैं।




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