टिकट से पहले ही शुरू ‘मनाने-बिठाने’ की राजनीति, अंदरूनी खींचतान से जूझती भाजपा
नगर निगम चुनावों के लिए टिकट वितरण से पहले ही भारतीय जनता पार्टी के भीतर अंदरूनी समीकरण तेज होते नजर आ रहे हैं। कई वार्डों में एक ही पार्टी से पांच या उससे अधिक दावेदार सामने आने के बाद अब पर्दे के पीछे “मनाने” और “बिठाने” की कवायद शुरू हो गई है।
सूत्रों के अनुसार, कुछ संभावित उम्मीदवार अपने ही प्रतिद्वंद्वियों को चुनाव न लड़ने के लिए राजी करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए अलग-अलग तर्क दिए जा रहे हैं—कहीं किसी को “कमजोर उम्मीदवार” बताकर पीछे हटने की सलाह दी जा रही है, तो कहीं “आप पहले से सक्षम हैं” जैसे तर्क देकर मैदान छोड़ने का दबाव बनाया जा रहा है। कई दावेदारों का दावा है कि उन पर अलग-अलग स्तरों से चुनाव न लड़ने के लिए दबाव भी डाला जा रहा है।

मामले को और पेचीदा बनाते हुए कुछ इच्छुक उम्मीदवारों ने संकेत दिया है कि यदि उन्हें पार्टी टिकट नहीं मिला, तो वे निर्दलीय मैदान में उतर सकते हैं। ऐसे में पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के सामने आंतरिक असंतोष एक बड़ी चुनौती बन सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस तरह की स्थिति वोटों के बंटवारे और परिणामों पर सीधा असर डाल सकती है।
दूसरी ओर, कई दावेदार अभी “रुकने या लड़ने” की रणनीति पर गणित बैठा रहे हैं। वे इस आकलन में लगे हैं कि समझौता करना उनके लिए अधिक लाभकारी होगा या पूरी ताकत से चुनाव लड़ना। यह स्थिति टिकट वितरण की अंतिम सूची तक जारी रहने की संभावना है।
विश्लेषकों के अनुसार, किसी भी चुनाव में आंतरिक एकजुटता जीत की अहम शर्त होती है। लेकिन यदि टिकट से पहले ही खेमेबाजी और दबाव की राजनीति हावी हो जाए, तो इसका असर संगठन की छवि और चुनावी प्रदर्शन दोनों पर पड़ सकता है। ऐसे में देखना होगा कि पार्टी नेतृत्व किस तरह संतुलन बनाकर असंतोष को संभालता है और अंतिम सूची जारी होने के बाद एकजुटता कायम रख पाता है या नहीं।




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