नारी शक्ति वंदन अधिनियम के बाद हरियाणा की सियासत गरम: नगर निगम चुनाव में महिला उम्मीदवारों को लेकर बीजेपी पर बढ़ा दबाव
हरियाणा की राजनीति इन दिनों एक नए मोड़ पर खड़ी नजर आ रही है। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा संसद में पेश किए गए नारी शक्ति वंदन अधिनियम के बाद अब राज्य स्तर पर राजनीतिक दलों के रुख और रणनीतियों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। विशेष रूप से आगामी नगर निगम चुनावों में महिला प्रतिनिधित्व को लेकर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं।
हरियाणा में चुनावी सरगर्मी तेज
हरियाणा में नगर निगम और नगर परिषद चुनावों की घोषणा हो चुकी है। नामांकन प्रक्रिया 21 अप्रैल से 25 अप्रैल तक निर्धारित की गई है। राज्य के तीन प्रमुख नगर निगम—सोनीपत, पंचकूला और अंबाला—में चुनाव होने हैं। इनमें से अंबाला सीट महिला आरक्षित श्रेणी में आती है, जबकि सोनीपत और पंचकूला सामान्य श्रेणी की सीटें हैं।
कांग्रेस की रणनीति: 66% महिला उम्मीदवार
कांग्रेस ने इन चुनावों में महिला प्रतिनिधित्व को लेकर आक्रामक रणनीति अपनाई है। पार्टी ने अंबाला और पंचकूला—दो सीटों पर महिला उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है। इस कदम को राजनीतिक विश्लेषक कांग्रेस की एक सोची-समझी चाल मान रहे हैं, जिसके जरिए वह बीजेपी को उसके ही “महिला सशक्तिकरण” के एजेंडे पर घेरने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस का यह कदम उस समय आया है जब बीजेपी राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं को 33% आरक्षण देने की बात कर रही है। ऐसे में कांग्रेस द्वारा 66% महिला उम्मीदवार उतारना एक राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

बीजेपी की चुप्पी और बढ़ता दबाव
अब तक बीजेपी की ओर से तीनों नगर निगमों के लिए उम्मीदवारों की आधिकारिक सूची जारी नहीं की गई है। हालांकि राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सामान्य सीट होने के कारण सोनीपत और पंचकूला में पुरुष उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी जा सकती है, जबकि अंबाला में महिला उम्मीदवार तय है क्योंकि वह आरक्षित सीट है।
पंचकूला सीट को लेकर चर्चाएं खास तौर पर तेज हैं। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के राजनीतिक सलाहकार तरुण भंडारी का नाम संभावित उम्मीदवारों में लिया जा रहा है, जिससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी यहां पुरुष उम्मीदवार उतार सकती है।
रेखा शर्मा का बयान बना चर्चा का विषय
हाल ही में बीजेपी मुख्यालय में आयोजित एक प्रेस वार्ता में राज्यसभा सांसद रेखा शर्मा से जब पंचकूला में महिला उम्मीदवार को लेकर सवाल पूछा गया, तो उनका जवाब भी बहस का कारण बन गया। उन्होंने कहा कि “जहां सीट आरक्षित है, वहीं महिलाएं चुनाव लड़ेंगी, अन्य सीटों पर नहीं।”
इस बयान ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या सामान्य सीटों पर योग्य महिला उम्मीदवारों को मौका नहीं मिलेगा? क्या आरक्षण के बाहर महिलाओं की भागीदारी सीमित रहेगी?
महिला सशक्तिकरण बनाम राजनीतिक रणनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा मुद्दा अब केवल चुनावी रणनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि महिला सशक्तिकरण की वास्तविकता पर भी सवाल खड़े कर रहा है। एक ओर बीजेपी महिला आरक्षण को ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर उम्मीदवार चयन में उसकी नीति को लेकर विरोधाभास सामने आ रहा है।
कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर बीजेपी पर लगातार हमलावर है और इसे “कथनी और करनी में अंतर” बता रही है।
आगे क्या?
अब सबकी नजर बीजेपी की उम्मीदवार सूची पर टिकी है। क्या पार्टी कांग्रेस की चुनौती को स्वीकार करते हुए सामान्य सीटों पर भी महिला उम्मीदवार उतारेगी, या पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को प्राथमिकता देगी—यह आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा।
फिलहाल इतना तय है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम ने हरियाणा की स्थानीय राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जिसका असर चुनावी नतीजों तक दिखाई दे सकता है।



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