खरी-अखरी : क्या राजा के विकेट गिरने की बारी आ गई है ?
We hold mister Amit Shah directly responsible for the violence that has taken place against our students. He authorised the shooting of our students. He authorised the use of Lethal weapons, Pet guns on our students. So that for us is a fundamental issue. We will not accept our own forces shooting the future of India. So that is going to be a major issue in parliament. Off course the students as I said have also got the demand of an apology from the Preme Minister.
इस सबके लिए अगर कोई जिम्मेदार व्यक्ति है तो वह केवल और केवल प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा हुआ व्यक्ति है। जिसने अपनी कुर्सी बचाये रखने के लिए बीते 12 सालों से देश को अंधेरी खोह में धकेल कर रखा हुआ है। वह यह मानकर चल रहा था कि उसके द्वारा रचा गया व्यूह अभेद है। बीते 12 सालों में उसने जो चाहा सो किया। विरोध में आवाजें भी उठी लेकिन उन आवाजों का गला सत्ता के जोर से घोंट दिया गया। चाहे वह नोटबंदी रही हो या जीएसटी। सीएए रहा हो या एनसीआर। किसानों के लिए लाए गये तीन कृषि कानून भी इसी दायरे में ही थे। किसानों ने सालभर सड़क पर रहकर आंदोलन किया। सैकड़ा भर से ज्यादा लोगों की आहुतियां दी गई तब कहीं जाकर उन तीनों काले कानूनों को वापस लिया गया। मंहगाई बेरोजगारी को तो देश के मुद्दों की सूची से ही गायब कर दिया गया। देश की ऊंगलियां तो ईवीएम और एसआईआर को लेकर भी उठ रही हैं लेकिन इलेक्शन कमीशन और सुप्रीम कोर्ट सरकार की ढाल बनकर साथ खड़ा है। मोदी सरकार का ऐसा एक भी मंत्रालय नहीं है जो बीते 12 बरस में फेल ना हुआ हो लेकिन एक भी मंत्री का इस्तीफा नहीं लिया गया। इसके लिए हठधर्मिता की सारी हदें पार कर दी गई। सारे संवैधानिक संस्थानों को मुट्ठी में कैद कर लिया गया। लेकिन फिर ऐसा कुछ हुआ जो अविश्वसनीय हुआ जिसकी कल्पना करना भी देश भूल सा गया था।
द्रोपदी ने अगर दुर्योधन को अंधे का पुत्र अंधा ना कहा होता तो महाभारत भी ना होता ठीक उसी तर्ज पर अगर सीजेआई जस्टिस सूर्य कांत ने बेरोजगार युवाओं को काॅकरोच, पेस्टीसाइड ना कहा होता तो 12 बरस में अभेद बन चुकी दीवार की एक ईंट नहीं उखड़ती। इसका सारा श्रेय तो सीजेआई जस्टिस सूर्य कांत के खाते जाना चाहिए जिनके मुखारबिंद से निकले एक शब्द काॅकरोच ने सोशल मीडिया पर ही काॅकरोच जनता पार्टी पैदा कर दी। भले ही सफाई देकर जस्टिस सूर्य कांत बाद में अपना पल्ला झाड़ते नजर आए।
युवाओं की काॅकरोच जनता पार्टी राजनीतिक रूप से नहीं बल्कि सामाजिक रूप से अपनी बात कहने दिल्ली के जंतर-मंतर पर आई थी और उस सामाजिक पार्टी के पीछे देश की तमाम राजनीतिक पार्टियां कतार बध्द खड़ी हो गईं। युवाओं की इस सामाजिक पार्टी के आंदोलन को कुचलने के लिए मोदी सत्ता ने 20 जुलाई 2026 को क्रूरता की सारी हदें पार कर दी इसके बावजूद भी वह आंदोलन को कुचल नहीं पाई। और फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने काॅकरोचों के सामने घुटने टेकते हुए 25 जुलाई को अपने दो सिपहसालारों और काॅकरोच जनता पार्टी के दो नुमाइंदों के साथ साझा प्रेस वार्ता आयोजित की जिसमें मोदी के सिपहसलार काॅकरोचों के नुमाइंदों से तत्काल ही आंदोलन खत्म करने की घोषणा करने की विनती करते नजर आए।
काॅकरोचों का देश में यह ऐसा पहला सामाजिक आंदोलन है जिसमें कोई विषमता नहीं थी। ना कोई हिन्दू था ना कोई मुसलमान, ना कोई सिक्ख ना कोई ईसाई। ना कोई गरीब था ना कोई अमीर। यानी ना कोई काॅस्ट थी ना कोई रिलीजन। वह केवल अपना भविष्य देख रहे थे और उन्होंने देश के डूबते हुए भविष्य के साथ अपने भविष्य को जोड़ दिया। जिसने देश की सभी पार्टियों को यह कहने के लिए मजबूर कर दिया कि देश का भविष्य अंधकारमय है।

अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने युवाओं के दुख दर्द पीड़ा को समझ कर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को समय रहते बर्खास्त कर दिया होता तो प्रधानमंत्री के लिए जितने सारे निम्नस्तरीय कमेंट्स और मीम सामने आये ना आये होते। भले ही इन कमेंट्स और मीमस् से व्यक्तिगत तौर पर नरेन्द्र मोदी को फर्क नहीं पड़ता हो लेकिन देश के सबसे प्रतिष्ठित पदों में से एक प्रधानमंत्री पद पर तो कालिख पुत ही गई है। देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मसार हुआ ही है।
खबर है कि पीएमओ और गृह मंत्रालय की टेबल पर नौकरशाही की जो रिपोर्ट रखी हुई है उसमें साफ तौर पर लिखा हुआ है कि जंतर-मंतर पर धर्मेंद्र प्रधान नहीं था वहां पर तो सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी थे। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी की पूरी की पूरी छबि की छीछालेदर करने के लिए सैकड़ों की संख्या में घटिया नारे और मीमस् उभर कर सामने आते चले गए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की साख का मटियामेट करने के लिए मेन स्ट्रीम मीडिया बराबर का जिम्मेदार है। जो हकीकत दिखाने – बताने के बजाय मोदी और मोदी सरकार की विरुदावली का गायन ही करता रहा। यहां तक कि जब मोदी सरकार ने अपने मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देने का संदेश भी भेज दिया तब भी मेन स्ट्रीम मीडिया इस्तीफा नहीं दिया जायेगा का राग ही अलापता रहा जबकि सोशल मीडिया ने ऐसा नहीं किया उसने तो देश को वही बताया जो देश जानना चाहता है।
मेन स्ट्रीम मीडिया अपनी साख पूरी तरह से खो चुका है। अब जब धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हकीकत बन चुका है तो क्या मेन स्ट्रीम मीडिया नये तरीके से सवालों को कवर करेगा ? शायद वह ब्यूरोक्रेसी भी कुछ कुछ समझ चुकी होगी जिसने 48 घंटे में 78 नौकरशाहों को इधर से उधर फेंकते हुए देखा है। 47 नौकरशाहों को तो बाहर भी कर दिया गया है। क्या इलेक्शन कमीशन भी कुछ समझेगा ? क्या न्यायपालिका की समझ में भी कुछ आयेगा ? उसी न्यायपालिका के जिसमें विराजमान चीफ जस्टिस आफ इंडिया जस्टिस सूर्य कांत को गलत इंटरप्रिटेशन का जिक्र करते हुए बार बार सफाई देनी पड़ी है । लेकिन कैसे कोई इस बात को नजरअंदाज कर सकता है कि काॅकरोच शब्द तो उन्हीं के मुखारबिंद से निकला है। यानी किसी ना किसी रूप में काॅकरोच जनता पार्टी के जनक तो जस्टिस सूर्य कांत ही हैं।
और उन्हीं काॅकरोचों ने एक झटके में देश के उस राजनीतिक माहौल को बदल कर रख दिया है। खासतौर पर बीजेपी के उन अंध समर्थकों के लिए जो यह मानकर चल रहे थे कि कुछ भी हो जाए, भले ही 20 जुलाई 2026 को बार बार दुहराना पड़े धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं होगा, मोदी सत्ता तिल भर भी टस से मस नहीं होगी। लेकिन वह हो गया और वह अपने पीछे यह संदेश भी दे गया कि अब गद्दी चले जाने का अंदेशा भी है। वही गद्दी जो किसी एक व्यक्ति की है, एक पार्टी की है, एक विचारधारा की है।
कहा जा रहा है कि देश के भविष्य ने जिस तरीके से मोदी सत्ता को आईना दिखाया है और मोदी सरकार ने जिस तरह से घुटना टेक कर निर्णय लिया है उससे बीजेपी और संघ परिवार के भीतर अपने भविष्य को लेकर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं। इतना ही नहीं बीजेपी के साथ कदमताल कर सत्ता की मलाई चाट रहे राजनीतिक दल यानी एनडीए के भीतर भी भविष्य की राजनीति को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। उन्हें पता है कि बीजेपी अपने बूते 240 के आंकड़े पर खड़ी है। यानी सरकार बैसाखी पर टिकी हुई है। और अगर इस बैसाखी के मजबूत पाये नितीश कुमार, चंद्रबाबू नायडू, चिराग पासवान ने अपने पैर खींच लिए तो मोदी सरकार भरभरा कर मुंह के बल गिर जाएगी।
लेकिन फिलहाल तो सवाल उस नैरेटिव का है, उस परसेप्शन का है जो बीते 12 साल में पहली बार एक इस्तीफे के साथ गिर गया है। मोदी सरकार के पास मोरल अकाउंटबिल्टी बची नहीं है। सवाल तो यह भी खड़ा हो गया है कि आखिर सरकार पर नियंत्रण किसका है ? क्योंकि जंतर-मंतर पर जो आंदोलन काॅकरोच जनता पार्टी ने शुरू किया उसकी परमीशन देने के लिए तो मोदी शाह की नौकरशाही ही बकायदा एयरपोर्ट पर पहुंची थी। और फिर एक झटके में उन्हीं छात्रों के साथ अमानवीय अत्याचार किया जाने लगता है। कल तक जो राजनीतिक दल खुद को लोहा और बीजेपी को पारस मानकर सोना बनने के लिए चिपक रहे थे एक इस्तीफे ने उनकी आंखें खोल कर रख दी है।
सरकार इस दौर में अंतरराष्ट्रीय दबाव या कहें अमेरिका के दबाव की वजह से नतमस्तक है। एक तरफ सरकार चलाने की परिस्थितियां, दूसरी तरफ आंतरिक तौर पर देश की राजनीति और उसके बीच जं जी का आंदोलन जिसने 36 दिन में वह कर दिखाया जो बरसों बरस से नहीं हुआ था। जं जी ने मोदी के उस तिलिस्म को तोड़ कर रख दिया है जिसे अजेय माना जा रहा है। मजबूत मानी जा रही दीवार की एक ईंट निकल गई है और दीवार कमजोर हो गई है। जिसने हासिये पर ढकेल दिए गए वरिष्ठ नेताओं, गुलामों से भी बदतर हालत में पहुंचा दिए गए खांटी कार्यकर्ताओं और अछूतों की तरह देखे जाने लगे पितृ संगठन को आंतरिक सुखानुभूति का अह्सास तो करा ही दिया है। जंतर-मंतर से निकली जं जी के नारों की गूंज आंध्रप्रदेश के भीतर भी सुनाई दे रही है जो चंद्रबाबू नायडू की राजनीतिक जमीन को हिलाने का माद्दा रखती है।
क्या प्रधानमंत्री मोदी ने मरता क्या ना करता की तर्ज पर धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देने को कहा ? क्योंकि जो निगाहों पर है, जो निशाने पर है उसे अपनी सत्ता भी बचानी है, जं जी के आंदोलन को बड़ा भी नहीं होने देना है, दिल्ली की घेराबंदी भी नहीं होने देनी है तो फिर क्यों ना ले लिया जाए प्रधान का इस्तीफा ? मगर जो रिपोर्ट सरकार की जडों को हिला रही है उससे तो यही संदेश निकल रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक्सपायरी डेट आ गई है ! क्या इसलिए आनन फानन में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फण्वनीस को दिल्ली तलब किया गया है ? यकायक उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उडीसा, उत्तराखंड, गुजरात के मुख्यमंत्रियों को लेकर सवाल क्यों उठने लगे हैं ? सरकार हर कदम पर फेल है तो क्या और विकेट गिरेंगे ? वजीर का विकेट गिरने के बाद क्या राजा के विकेट गिरने की बारी आ गई है ?
सवाल तो सत्ता को बचाये रखने का है अन्यथा सब कुछ मटियामेट हो जाएगा। वजीर हार चुका है, सामने राजा खड़ा है और उसके अभेद किले को भेदा जा चुका है। इसीलिए उस एक व्यक्ति को लेकर पूरी पार्टी और उसके साथ खड़े होकर कदमताल कर रहे सभी राजनीतिक दल अंदर से डरे हुए हैं, हिले हुए हैं। उन्हें समझ में आ गया है कि अगर इस एक व्यक्ति से जल्द से जल्द छुटकारा नहीं पाया गया तो आज नहीं तो कल परिस्थितियां पलट जाएंगी और उनका भविष्य अंधकार के गर्त में समा जाएगा।
उडीसा के भीतर जो सवाल उठ रहा है उसमें कहीं धर्मेंद्र प्रधान को सामाजिक बहिष्कार का सामना तो नहीं करना पड़ेगा ? क्योंकि जब देश के युवा, देश के बच्चे खड़े हो गए तो फिर बचा क्या ? इस दौर में चलती हुई पार्लियामेंट को गायब कर दिया गया। क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देर रात INSTAGRAM पर आकर रील बनाते हैं और उसे वायरल करते हैं। विपक्ष के नेता राहुल गांधी भी देर रात ही प्रधानमंत्री मोदी के वायरल रील का जबाव INSTAGRAM पर देते हैं। तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर पार्लियामेंट का महत्व क्या है ? यह सवाल हर उस दिल में उठने लगा है जो अभी तक खामोश थे। बहरहाल देश ने 12 बरस बाद सांस ली है !
अदालतें भी कटघरे में आईं………!
We are standing with all the students who are protecting of their rights and we want justice for all of them. We are sharing solidarity with the students. यह कहना है वकीलों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े एक रिटायर्ड जस्टिस का। सीजेआई जस्टिस सूर्य कांत ने जब 20 जुलाई की अमानवीय पुलिसिया कार्रवाई के वीडियोज देखने से यह कहते हुए मना कर दिया था कि हमारे पास फालतू की चीजों को देखने का वक्त नहीं है, हमारा समय बरबाद मत कीजिए तो उसने सुप्रीम कोर्ट के वकीलों को भीतर तक झकझोर कर रख दिया।
सीजेआई की टिप्पणी से आहत वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के बाहर आकर युवाओं की जुबान से जुबान मिलाते हुए देश के हुक्मरानों को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने कहा कि लोगों को यह याद रखना चाहिए कि देश का संविधान युवाओं को भी अधिकार देता है। आज का दौर एक ऐतिहासिक लम्हा है। सुप्रीम कोर्ट के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के लान में आकर संविधान की प्रस्तावना का पाठ किया। देश की सर्वोच्च अदालत के वकीलों ने खुलकर युवाओं की तारीफ करते हुए कहा कि आप सरकार से शांतिपूर्ण तरीके से सवाल पूछ रहे हैं। यह आपका मौलिक और संवैधानिक अधिकार है। Equality and to promote among them all according to the dignity of the individual and unity and integrity of India. India that is Bharat.
सीजेआई के इस आदेश की भी आलोचना की जाने लगी है जिसमें उन्होंने कोर्ट की इजाजत के बगैर अदालत की हियरिंग के वीडियो शेयर करने पर रोक लगा दी है। विधिक जगत में यह कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट दरबारी मीडिया के एक मालिक पत्रकार की जमानत पर सुनवाई कोर्ट खोलकर आधी रात को तो कर सकता है यानी उसके पास समय ही समय है लेकिन उसके पास छात्रों की गई बर्बरतापूर्ण कार्रवाई के वीडियो देखने के लिए दिन के उजाले में भी वक्त नहीं है।
मामले के तूल पकड़ने के बाद सीजेआई जस्टिस सूर्य कांत ने अपने कहे पर सफाई दी। यह कोई पहला मौका नहीं है जब सीजेआई जस्टिस सूर्य कांत को अपने कहे पर सफाई देनी पड़ी है। इसके पहले भी वह बेरोजगार युवाओं को काॅकरोच पेस्टीसाइड कहने के बाद सफाई देने सामने आये थे कि उनके कहे को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है। उनके कहे का गलत मतलब निकाला गया है। दरअसल इस तरह का चरित्र नेताओं का होता है जो हमेशा गिरगट की तरह रंग बदलते रहते हैं किसी जस्टिस का नहीं।
सुप्रीम कोर्ट के वकील वी एस मलिक का कहना है कि हम सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पर जिस तरह का विश्वास रखते हैं वह डगमगा गया है क्योंकि देश के भविष्य, देश के छात्रों के साथ जिस तरह की अमानवीयता की गई उस पर उन्होंने खामोशी बरती। दिल्ली हाई कोर्ट ने भी इस मामले से दूरी बनाये रखने की बात कही। सुप्रीम कोर्ट ने कहा हमारा और अपना समय बर्बाद मत कीजिए। वीडियो देखने में हमें कोई दिलचस्पी नहीं है। तो क्या देश में ऐसी स्थिति आ गई है कि अदालतों पर उठ रहे सवाल, जजेज के पक्षपाती रवैये, सरकार के पक्ष में खड़े होने के जो आरोप लग रहे हैं क्या यह सब कुछ वाकई सच है ? क्या अब अदालतें अदालतों की अवमानना के नाम पर अभिव्यक्ति का गला घोंटने पर उतारू हो रही हैं ?
बहरहाल दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस और सरकार को नोटिस जारी कर सीसीटीवी फुटेज, वीडियोज, सुरक्षित रखने के लिए कहा है। लेकिन क्या दिल्ली पुलिस अपनी गर्दन फंसाने के लिए सीसीटीवी फुटेज और वीडियोज बिना छेड़छाड़ के सुरक्षित रखेगी.? क्या यह सच कभी सामने आ पाएगा कि मोदी सरकार ने किस तरह की नीति और रणनीति के जरिए जंतर-मंतर पर किए जा रहे प्रोटेस्ट को कमजोर करने, खत्म करने के लिए षड्यंत्र रचे हैं ? क्या अदालत इस बात पर सुमोटो लेगी कि इंटरनेट सेवाएं, मेट्रो स्टेशनस् क्यों बंद किए गए ? शिक्षा जगत में जिस तरीके से आरएसएस ने कब्जा किया हुआ है, युनिवर्सिटी के प्रमुख जिस तरह से छात्रों को जंतर-मंतर से दूर रहने की एडवाइजरी जारी करते हुए छात्रों को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी भरी धमकी दे रहे हैं। वोट कबाडने के लिए तो सरकार युवाओं से संवाद करती है लेकिन जब उनके राइट्स की बात आती है तो दूरी बना लेती है, खामोशी बरत लेती है।
सोनम वांगचुक ने जिस तरह से अपना अनशन तोड़ा है उसको लेकर भी चर्चा चल रही है कि सोनम वांगचुक क्या दूसरे अन्ना हजारे बन चुके हैं ?
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार




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