विश्व ओजोन दिवस : पृथ्वी के सुरक्षा कवच का संरक्षण
ओजोन परत नीले ग्रह यानी कि हमारी पृथ्वी के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच है। यह वह परत है जो, सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (यूवी) किरणों के बड़े हिस्से को अवशोषित कर उन्हें पृथ्वी की सतह तक सीधे पहुंचने से रोकती है। वास्तव में, विशेष रूप से यूवी-बी और यूवी-सी किरणों का अधिकांश भाग ओजोन परत द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। इससे मनुष्यों, पशु-पक्षियों, वनस्पतियों और समस्त जीव-जगत की रक्षा होती है। यदि ये किरणें अधिक मात्रा में पृथ्वी तक पहुंचें तो त्वचा कैंसर, आंखों को नुकसान, कोशिकाओं पर प्रतिकूल प्रभाव, फसलों को क्षति तथा समुद्री खाद्य श्रृंखला पर गंभीर असर पड़ सकता है। इसलिए ओजोन परत का संरक्षण पृथ्वी पर जीवन की सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।
यहां पाठकों को बताता चलूं कि हर वर्ष 16 सितंबर को विश्व ओजोन दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 की थीम है-‘शीतित ग्रह के लिए वैश्विक कार्रवाई : मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के किगाली संशोधन के तहत सतत शीतलन के 10 वर्ष पूरे होने का जश्न।’ इस थीम का उद्देश्य ओजोन परत के संरक्षण के साथ-साथ पर्यावरण के अनुकूल और ऊर्जा-कुशल शीतलन तकनीकों को बढ़ावा देना है।
बहरहाल, यहां पाठकों को जानकारी देता चलूं कि मानव की अनियंत्रित और स्वार्थी गतिविधियों ने कभी जीवनदायिनी ओजोन परत को गंभीर संकट में डाल दिया था। दरअसल, 1980 के दशक में एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर और एरोसोल स्प्रे में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) और हैलोन जैसी गैसें समताप मंडल (स्ट्रैटोस्फियर) में पहुंचकर ओजोन अणुओं को तेजी से नष्ट करने लगीं। इसके परिणामस्वरूप, अंटार्कटिका के ऊपर एक विशाल ‘ओजोन छिद्र’ विकसित हुआ। समय रहते कदम नहीं उठाए जाते तो सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी (यूवी-बी) किरणों का बढ़ा हुआ प्रभाव त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद, फसलों को नुकसान और समुद्री खाद्य श्रृंखला के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता था।
ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख रसायनों में क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी), हैलोन, कार्बन टेट्राक्लोराइड और मिथाइल क्लोरोफॉर्म आदि शामिल हैं। इनका उपयोग पहले रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर, अग्निशामक यंत्र और एरोसोल जैसे उत्पादों में होता था। इन रसायनों को नियंत्रित करने के लिए वर्ष 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल अपनाया गया, जिसे पर्यावरण संरक्षण की दिशा में दुनिया के सबसे सफल अंतरराष्ट्रीय समझौतों में माना जाता है। सरल शब्दों में कहें तो मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का मुख्य उद्देश्य ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले रसायनों, जैसे क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसीज), के उत्पादन और उपयोग को चरणबद्ध तरीके से कम करना और समाप्त करना है।भारत भी मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के कार्यान्वयन में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। फिर भी ओजोन परत की सुरक्षा के लिए निरंतर प्रयास जरूरी हैं। यह केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य और पृथ्वी पर जीवन की सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न है। इसलिए पर्यावरण के अनुकूल शीतलन तकनीकों को अपनाना और ओजोन-क्षयकारी पदार्थों के उपयोग को कम करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।इसके बाद, वर्ष 2016 में किगाली संशोधन अपनाया गया, जिसके तहत हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (एचएफसी) के उपयोग को धीरे-धीरे कम करने का लक्ष्य रखा गया। उल्लेखनीय है कि मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के कड़े अनुपालन से ओजोन-क्षयकारी गैसों के वैश्विक उत्सर्जन में लगभग 99 प्रतिशत तक की कमी आई है। इसके सकारात्मक परिणाम अब आंकड़ों में भी दिखाई दे रहे हैं। नासा और विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) के वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, अंटार्कटिक ओजोन छिद्र का अधिकतम आकार अब लगभग 22.8 मिलियन वर्ग किलोमीटर के दायरे में रह गया है, जो वर्ष 2000 के 28.4 मिलियन वर्ग किलोमीटर के रिकॉर्ड स्तर से काफी कम है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि मौजूदा नियमों का सख्ती से पालन जारी रहा तो दुनिया के अधिकांश हिस्सों में ओजोन परत 2040 तक, आर्कटिक में 2045 तक और अंटार्कटिका के ऊपर 2066 तक वर्ष 1980 के ऐतिहासिक स्तर पर लौट सकती है।हालांकि, पर्यावरण को लेकर पूरी तरह निश्चिंत होने का समय अभी नहीं आया है। जंगलों की भीषण आग, अनियंत्रित रॉकेट प्रक्षेपण, अप्रतिबंधित औद्योगिक रसायनों, जैसे डाइक्लोरोमीथेन, और लगातार बढ़ता कार्बन उत्सर्जन नई चुनौतियां पैदा कर रहे हैं। जंगलों की आग से उठने वाला रासायनिक धुआं तथा अंतरिक्ष मलबे के ऊपरी वायुमंडल में जलने से उत्पन्न एरोसोल ओजोन की रिकवरी की गति को प्रभावित कर सकते हैं। इसके अलावा, तेजी से बढ़ते अंतरिक्ष अभियानों, रॉकेट प्रक्षेपणों और समताप मंडल में उड़ने वाले विमानों से निकलने वाले ब्लैक कार्बन और कालिख को लेकर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। यह स्पष्ट संकेत है कि प्रकृति के साथ किया गया कोई भी असंतुलन हमारे इस अदृश्य सुरक्षा कवच को प्रभावित कर सकता है।
वास्तव में,ओजोन परत की हिफाजत केवल अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों या सरकारी संधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी दैनिक जीवनशैली और उपभोक्ता प्राथमिकताओं से भी जुड़ी है। व्यक्तिगत स्तर पर घर और कार्यालय में इस्तेमाल होने वाले कूलिंग उपकरणों के प्रति सजग रहना जरूरी है। एयर कंडीशनर और रेफ्रिजरेटर खरीदते समय यह देखना चाहिए कि उनमें ओजोन-क्षयकारी सीएफसी और एचसीएफसी का उपयोग न हो। पुराने उपकरणों की समय पर मरम्मत और सुरक्षित पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) भी आवश्यक है, क्योंकि उपकरणों से गैसों का रिसाव पर्यावरण के लिए नुकसानदेह हो सकता है। एरोसोल स्प्रे, फोम पैकेजिंग, कीटनाशकों और रासायनिक विलायकों के मामले में भी पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इतना ही नहीं, व्यापक स्तर पर ओजोन परत की रक्षा के लिए औद्योगिक और नीतिगत मोर्चे पर निरंतर निगरानी आवश्यक है। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के साथ-साथ किगाली संशोधन का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना होगा। हाइड्रोफ्लोरोकार्बन जैसी शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसों को चरणबद्ध रूप से कम करना, जीवाश्म ईंधनों के सीमित उपयोग और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना तथा औद्योगिक गतिविधियों से होने वाले उत्सर्जन पर नियंत्रण जरूरी है। वाहनों और कल-कारखानों से निकलने वाला नाइट्रस ऑक्साइड भी वायुमंडलीय संतुलन को प्रभावित करता है। इसके साथ ही, अंतरिक्ष अभियानों, रॉकेट प्रक्षेपणों और समताप मंडल से जुड़े विमानों के पर्यावरणीय प्रभावों पर वैज्ञानिक निगरानी तथा आवश्यक नियमन समय की मांग है।
अंततः, यही कहूंगा कि मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ने यह साबित किया है कि जब पूरी दुनिया किसी पर्यावरणीय चुनौती के समाधान के लिए एकजुट होकर काम करती है, तो सकारात्मक परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। ओजोन परत की रिकवरी मानवता के लिए उम्मीद की एक बड़ी किरण है, लेकिन इस उपलब्धि को स्थायी बनाए रखने के लिए व्यक्तिगत समझदारी, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पर्यावरण-अनुकूल तकनीक और कड़े वैश्विक नियमों का निरंतर पालन आवश्यक है। ओजोन परत सुरक्षित रहेगी, तभी पृथ्वी पर जीवन सुरक्षित रहेगा।
सुनील कुमार महला,
फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार





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