समानता, सशक्तिकरण और आरक्षण: जब ‘द्वारपाल’ ही ताले लगाएं
क्या भारत की महिलाएं राष्ट्रीय ‘नारी शक्ति’ का हिस्सा नहीं बनना चाहतीं? जवाब जटिल है। दुर्गा से काली, सरस्वती और लक्ष्मी तक तमाम देवियों के प्रति गहरी आस्था के बावजूद, हम पूछ सकते हैं कि भारत में पितृसत्ता की जड़ें इतनी गहरी क्यों हैं। निश्चय ही, हम महिलाएं भी उन जड़ों को सींचने और अपने ही पैरों तले जमीन काटने के लिए जिम्मेदार हैं।
यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि महिलाएं सदियों से अधीन रखी गई हैं, और इस अधीनता को खत्म करना ही होगा। इसे कैसे किया जाए, यही असल सवाल है। क्योंकि महिलाओं को दबाने वाले पुरुष ही हैं, और इसे रोकना अंततः महिलाओं पर निर्भर करता है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि जब इस अधीनता को खत्म करने के लिए कानूनी और संवैधानिक कदम उठाए जाते हैं, तो लोग इसे बहस का मुद्दा बना देते हैं। इस तरह की सकारात्मक कार्रवाई या संरक्षात्मक भेदभाव का उद्देश्य वंचितों को सशक्त बनाना है।
International Institute for Democracy and Electoral Assistance (IDEA) की रिपोर्ट कहती है:
“लगभग सभी राजनीतिक व्यवस्थाओं में, चाहे कोई भी चुनावी प्रणाली हो, मतदाता नहीं बल्कि राजनीतिक दल ही महिलाओं के लिए निर्वाचित पदों तक पहुँचने के असली द्वारपाल होते हैं।”
भारत में वंशवाद से चलने वाली पार्टियों को ही देख लीजिए। कांग्रेस, NCP, SP या DMK में अध्यक्षों ने महिला विकल्पों की सापेक्ष योग्यता को नजरअंदाज कर पुरुष सदस्यों को ही उत्तराधिकारी चुना है। पार्टियां टिकट बंटवारे में ही तय कर देती हैं कि सदन में कौन पहुंचेगा।
दुनिया का अनुभव बताता है कि सिर्फ कोटा बनाने से काम नहीं चलता। Rwanda, Sweden, Norway, France, Mexico और Tunisia में हुए अध्ययनों से साफ है कि महिला कोटा तभी कारगर है जब कानूनी ढांचा मजबूत हो, राजनीतिक इच्छाशक्ति हो और लागू करने की व्यवस्था हो। सिर्फ ‘टोकनिज्म’, सामाजिक विरोध और पुरानी लैंगिक सोच से असली न्याय नहीं आता।
इसके उदाहरण दुनिया भर में हैं। Argentina 1990 के दशक में उम्मीदवार स्तर पर महिला कोटा लाने वाला पहला देश था। आज Argentina, Mexico और Costa Rica में कानूनी पार्टी कोटा से 36% से ज्यादा महिला प्रतिनिधित्व है। वहीं South Africa, Sweden और Germany ने बिना कानून, सिर्फ पार्टी स्तर पर स्वैच्छिक कोटा से यही स्तर हासिल किया।
South Africa की नेशनल असेंबली में 44.8% महिलाएं हैं, क्योंकि African National Congress (ANC) ने 50% टिकट महिलाओं को देने की नीति अपनाई। ANC की सफलता का असर दूसरी पार्टियों पर भी पड़ा।
लेकिन पुरुषों की पारंपरिक सोच सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। Spain में शोध बताता है कि पार्टियों ने कोटा को तोड़-मरोड़ कर महिलाओं को हारने वाली सीटें दीं और प्रतिनिधित्व घटा दिया। France में कोटा नीति में जुर्माने का प्रावधान था, पर कई पार्टियों ने महिलाओं को टिकट देने की बजाय जुर्माना भरना चुना।
भारत में भी यही पैटर्न दिखा। पंचायती राज में महिला आरक्षण शुरू होने पर ‘सरपंच पति’ का चलन इसी मानसिकता का सबूत था। लेकिन समय के साथ बदलाव आया है। अब महिलाएं स्वतंत्र फैसले ले रही हैं। स्थानीय चुनावों पर हुई रिसर्च बताती है कि महिलाओं के दोबारा चुने जाने का प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा है, जो ‘चुनाव जिताऊ नहीं हैं’ वाली दलील को खारिज करता है।
अब महिला आरक्षण बिल को परिसीमन से जोड़ने की राजनीति भी सामने है। आशंका है कि महिला आरक्षण को तेजी से लाने के पीछे का मकसद परिसीमन की प्रक्रिया शुरू करना है, जिसे भाजपा चुनावी तौर पर फायदेमंद मानती है। परिसीमन यानी राज्यों के बीच और भीतर सीटों का बंटवारा, एक विवादास्पद मुद्दा है क्योंकि इससे राजनीतिक शक्ति का संतुलन बदलता है। इसलिए व्यापक विचार-विमर्श जरूरी है।
1970 के दशक में आम सहमति थी कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा काम किया है, उन्हें लोकसभा में सीटें घटाकर सजा नहीं दी जानी चाहिए। इसलिए हर राज्य की सीटों की संख्या फ्रीज कर दी गई। 2001 में वाजपेयी सरकार ने इस फ्रीज को 2026 तक बढ़ा दिया, लेकिन राज्यों के भीतर सीटें जनसंख्या के हिसाब से फिर से बनाई गईं।
पांच दशकों से सहमति है कि अकेली जनसंख्या सीटों के बंटवारे का आधार नहीं होनी चाहिए। तो फिर विकल्प क्या हो? तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का सुझाव है कि विकास के पैमाने जोड़े जाएं, जैसे सकल राज्य घरेलू उत्पाद, क्योंकि ऐसे राज्य आंतरिक प्रवास को आकर्षित करते हैं। प्रोफेसर संतोष मेहरोत्रा का कहना है कि वित्त आयोग की तरह कोई फॉर्मूला बनाया जाए, जिससे राष्ट्रीय कर पूल राज्यों में बांटा जाता है। ये रास्ते तलाशने लायक हैं।
महिला आरक्षण को सफल बनाने के लिए कानून से ज्यादा पुरुषों को अपनी सोच बदलनी होगी। जब तक राजनीतिक दल द्वारपाल बनकर दरवाजे पर ताले लगाते रहेंगे, और जब तक कोटा को परिसीमन जैसे पेचों में फंसाया जाएगा, तब तक बराबरी सिर्फ कागजों में रहेगी।
इस बिखरे हुए समय में, महिला आरक्षण का यह आखिरी पासा उम्मीद देता है।
कानू शर्मा
अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय, भारत
पूर्व संयुक्त सचिव, PHHCBA, चंडीगढ़




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