अब डॉक्टर को झोला छाप कहना महंगा पड़ सकता है !
होम्योपैथी पर विवाद के बीच राष्ट्रीय आयोग का सख्त संदेश, ‘झोलाछाप’ जैसे शब्दों पर जताई आपत्ति , मीडिया के लिए एडवाइजरी जारी
होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति को लेकर सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर जारी बहस के बीच नेशनल कमीशन फॉर होम्योपैथी (NCH) ने कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने कहा है कि पंजीकृत होम्योपैथिक चिकित्सकों के लिए अपमानजनक या भ्रामक शब्दों का इस्तेमाल न केवल उनकी पेशेवर प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि कुछ मामलों में यह मानहानि और कानूनी विवाद का कारण भी बन सकता है।
आयोग ने एक आधिकारिक बयान जारी कर मीडिया संस्थानों, स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े पेशेवरों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों से सार्वजनिक चर्चा में जिम्मेदारी बरतने की अपील की है। NCH ने कहा कि प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर होम्योपैथी को लेकर कई ऐसी टिप्पणियां सामने आई हैं जो तथ्यात्मक रूप से अपुष्ट, भ्रामक या पेशेवर गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली हैं।
आयोग ने स्पष्ट किया कि किसी भी पंजीकृत होम्योपैथिक चिकित्सक को “झोलाछाप” कहकर संबोधित करना उचित नहीं है। यदि किसी डॉक्टर के आचरण, योग्यता या कार्यप्रणाली को लेकर शिकायत है तो उसका समाधान नियामक और कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से किया जाना चाहिए, न कि पूरे चिकित्सा समुदाय पर सामान्य टिप्पणी करके।
NCH ने यह भी दोहराया कि होम्योपैथी भारत में मान्यता प्राप्त चिकित्सा पद्धति है और इसके चिकित्सक निर्धारित कानूनी एवं शैक्षणिक मानकों के तहत पंजीकृत होते हैं। आयोग का कहना है कि किसी भी मान्यता प्राप्त चिकित्सा प्रणाली या उसके पेशेवरों की छवि को बिना पर्याप्त आधार के नुकसान पहुंचाने के प्रयासों पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।
हाल के दिनों में होम्योपैथी को लेकर सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस और सार्वजनिक टिप्पणियों के बाद आयोग का यह बयान महत्वपूर्ण माना जा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि चिकित्सा पद्धतियों पर वैज्ञानिक और तथ्याधारित चर्चा आवश्यक है, लेकिन इसमें पेशेवर सम्मान और कानूनी मर्यादाओं का पालन भी उतना ही जरूरी है।



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