खरी-अखरी : 80 साल बाद भी देश सरदार पटेल द्वारा 1948 में लिखी गई परिस्थितियों के चक्रव्यूह में फंसा हुआ क्यों दिख रहा है ?
80 साल बाद भी देश सरदार पटेल द्वारा 1948 में लिखी गई परिस्थितियों के चक्रव्यूह में फंसा हुआ क्यों दिख रहा है ?
Organizing the hindu and helping them is one kind but going in for revenge for it suffering on innocent and helpless man woman and children is an other thing a part from this they are opposition to the Congress that to such valence this regarding all consideration personality take of decorum created a kind of a nearest among the people. All their speeches were fill off communal poison. It was not necessity to spread poison in order to infuse the hindu and organize for the protection as a final result of the poison the country had to safar the sacrifice the in valval life of gandhi even an iota sympathy of the government people no more remain for the RSS in face opposition government, opposition turn more severe when the RSS main express joy and distributed sweets after gandhi death under this condition it become animal for the government to take action against the RSS. Since then over six month have let’s we had hope after the lapse of time willful and the proper consideration RSS person would come to the right path but from the report that come to me it in ascendant attempts to put fresh life in that same old activities are a foot.
ये उस पत्र के अंश है जो 11 सितम्बर 1948 को देश के प्रथम गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर (गुरूजी) को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की निर्मम हत्या के बाद लिखा था जिसे नाथूराम गोडसे द्वारा अंजाम दिया गया था। सरदार पटेल ने अपने पत्र में आरएसएस को सीधे-सीधे महात्मा गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया। लेकिन वो अपने पत्र में लिखते हैं कि हिन्दुओं की मदद करना, हिन्दुओं को संगठित करना अलग बात है लेकिन जब आप हिन्दुओं को संगठित करने के प्रयास में इस कदर जहर उगलते हैं जो पूरे तरीके से साम्प्रदायिक हलाहल से भरे हुए होते हैं, आपने जिस तरीके से नफरत फैलाई उसी का नतीजा है कि देश ने महात्मा गांधी को खो दिया। यानी आपके द्वारा बोये गये साम्प्रदायिक विष बीज की फसल है गांधी का हत्यारा नाथूराम गोडसे। उस साम्प्रदायिक विष बीज की फसल को नष्ट करने के बजाय उसे सलीके के साथ खाद पानी देकर संरक्षित रखा गया और कह सकते हैं देशभर में अलग अलग रूप में नाथूराम गोडसे रक्तबीज की माफिक दिखाई देते हैं।
भारतीय राजनीति में तीखे सवाल जवाब की परंपरा रही है। शास्त्रार्थ के जरिए जीत हार तय होती थी और इसे ही बहादुरी का प्रतीक माना जाता था। लेकिन बीते 10-11 वर्षों से जबसे नरेन्द्र मोदी ने देश की सत्ता सम्हाली है जो खुद संघ से शिक्षित दीक्षित होकर निकले हैं तो फिर से वही नफरती राजनीति का नजारा दिखाई देने लगा है जिसका जिक्र 11 सितम्बर 1948 को संघ प्रमुख गोलवलकर को लिखे अपने पत्र में सरदार पटेल ने किया था। सरकार की बातों से इत्तफाक नहीं रखने वालों, सरकार की नीतियों की आलोचना करने वालों, विपक्ष के नेताओं, अल्पसंख्यक तबके खास तौर पर मुसलमान ईसाई समुदाय के लोगों को निशाने पर लेकर उन्हें देशद्रोही, देश का दुश्मन, पाकिस्तान परस्त, गद्दार कहकर देश के भीतर नफरती वातावरण बनाया जा रहा है। लगातार हिन्दू मुसलमान का सवाल खड़ा किया जा रहा है। सत्ता में बैठे हुए लोगों द्वारा लगातार नफरती राजनीति की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समते उनकी टीम के तमाम लोगों की एक लंबी फेहरिस्त है जो संवैधानिक पदों पर बैठे हुए हैं और नफरती, जहरीली बयानबाजी करने से चूकते नहीं हैं। देखने में तो यही आ रहा है कि जो जितनी ज्यादा नफरती बयानबाजी करता है उसे पुरस्कृत करते हुए उतनी ऊंची कुर्सी पर बैठा दिया जाता है। इतना ही नहीं न्यूज चैनल्स के एंकर भी जहरीली जुबान चलाने की होड़ में लगे दिखते हैं !
जिस तरह से मोदी सरकार एप्स्टिन फाइल, ट्रेड डील, यूजीसी विवाद और एआई समिट में अव्यवस्थाओं को लेकर घिरी हुई है। हर मोर्चे पर सवाल ही सवाल उमड़ घुमड़ रहे हैं और जिम्मेदारों के जवाब नदारत हैं। जो जवाब आ भी रहे हैं वो वही घिसे पिटे जवाब आ रहे हैं जो पिछले 10 सालों से हर सवाल के जवाब में कहे जा रहे हैं। हर सवाल के जवाब में लीडर आफ अपोजीशन को निशाने पर लेते हुए उसे देश की सुरक्षा के लिए खतरा बताया जा रहा है। अब तो बात लीडर आफ अपोजीशन को गाली गलौज देने से बहुत आगे बढ़ते हुए गोली मार कर हत्या कर देने की धमकी तक पहुंच गई है। तो इस बात को लेकर बतकही शुरू हो गई है क्या एक बार फिर से गोड़से फैक्ट्री को सक्रिय किया जा रहा है ? क्या सरकार अपनी कुर्सी बरकरार रखने के लिए देश को आतंकवादियों के गढ़ में तब्दील करने का इरादा रखती है ? सत्ताधारी पार्टी से जुड़े हुए एक कद्दावर नेता ने एक प्रेस कांफ्रेंस में यहां तक कह दिया कि देश के भीतर सुसाइड स्काट बनाने की जरूरत है। सरकार ने उसके बयान पर कोई कार्रवाई नहीं की। सरकार की चुप्पी क्या इस बात की ओर इशारा करती है कि वह देश के भीतर आइसिस जैसा इस्लामिक आतंकवादी संगठन बनाने का समर्थन करती है जो खुलेआम गोली मार देना, गर्दन काट देना, जिंदा जला देना, जिंदा जमीन में गाड़ देना, कोड़े मारना जैसे दरिंदगी भरे काम करता है। क्या मौजूदा राजनीतिक सत्ता इस तरह का समाज बनाना चाहती है ?
जिस तरह से लीडर आफ अपोजीशन और 25 सांसदों को गोली मारने की धमकी देने वाला वीडियो वायरल हुआ है और धमकी देने वाला खुद को स्पीकर ओम बिरला का कट्टर समर्थक बता रहा है और स्पीकर ओम बिरला की ओर से धमकी देने वाले पर कार्रवाई करने के लिए कोई त्वरित टिप्पणी नहीं आई है उससे स्पीकर ओम बिरला भी कटघरे में खड़े हो गए हैं। यदि लीडर आफ अपोजीशन वास्तव में अगर देश के लिए खतरा है, देश का दुश्मन है, देश पर बोझ है, लोकतंत्र के लिए खतरा है, अर्बन नक्सली है जैसा कि मौजूदा राजनीतिक सत्ता और सत्ताधारी पार्टी के लोगों द्वारा अक्सर कहा जाता है तो उसे तत्काल सलाखों के पीछे भेज दिया जाना चाहिए अन्यथा यही माना जाएगा कि लीडर आफ अपोजीशन देश के लिए नहीं बल्कि मौजूदा राजनीतिक सत्ता के लिए खतरा है और मौजूदा राजनीतिक सत्ता देश नहीं है। मौजूदा राजनीतिक सत्ता अपनी सत्ता बनाये रखने के लिए तरह-तरह के अनर्गल गैरकानूनी हथकंडे अपना रही है जो देश और समाज के लिए बहुत ही खतरनाक स्थिति है। आखिरी सवाल तो यही है कि जो इंदिरा के साथ हुआ, जो राजीव के साथ हुआ वही राहुल के साथ किये जाने की तैयारी की जा रही है क्या ?
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार




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