30 हजार की सैलरी, 40 लाख का कर्ज: कर्ज के जाल में फंसती Gen Z, आखिर वजह क्या
नई दिल्ली। देश के बड़े शहरों में काम कर रही युवा पीढ़ी तेजी से कमाई तो कर रही है, लेकिन उसी रफ्तार से कर्ज के बोझ तले भी दबती जा रही है। हालिया वित्तीय रिपोर्टों से संकेत मिलते हैं कि 25 से 35 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं में लोन लेने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। स्थिति यह है कि 30-40 हजार रुपये मासिक आय वाले कई युवाओं पर 30 से 40 लाख रुपये तक का बकाया कर्ज है। विशेषज्ञ इसे बदलती जीवनशैली, डिजिटल लोन की आसान उपलब्धता और वित्तीय अनुशासन की कमी का परिणाम मान रहे हैं।
आंकड़े क्या कहते हैं
क्रेडिट ब्यूरो से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, नए क्रेडिट लेने वालों में बड़ी हिस्सेदारी Gen Z की है। एक रिपोर्ट बताती है कि इस वर्ग के 41 प्रतिशत उपभोक्ता हाल के वर्षों में पहली बार औपचारिक क्रेडिट सिस्टम में शामिल हुए हैं। वहीं NBFC और फिनटेक कंपनियों से लोन लेने वालों में 26-35 वर्ष आयु समूह की हिस्सेदारी 65 प्रतिशत से अधिक बताई गई है।
चिंता की बात यह है कि इनमें से लगभग एक चौथाई खाते 90 दिन से अधिक समय से बकाया श्रेणी में हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट 2025 में भी माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में तनावग्रस्त परिसंपत्तियों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो बढ़ते डिफॉल्ट का संकेत है।
छोटे लोन से शुरू होता है बड़ा जाल
विशेषज्ञों के अनुसार अधिकांश युवा होम लोन या एजुकेशन लोन जैसे सिक्योर्ड लोन से नहीं, बल्कि छोटे अनसिक्योर्ड लोन से शुरुआत करते हैं। गैजेट खरीदना, ट्रैवल, लाइफस्टाइल अपग्रेड, इंस्टेंट पर्सनल लोन या ‘अभी खरीदें, बाद में भुगतान करें’ जैसी योजनाएं शुरुआत में आसान लगती हैं।
जब EMI आय से ज्यादा होने लगती है, तो लोग पुराने लोन चुकाने के लिए नया लोन लेने लगते हैं। यही चक्र धीरे-धीरे नियंत्रण से बाहर हो जाता है। कई मामलों में युवाओं के पास 8-9 क्रेडिट कार्ड तक होते हैं, जिनसे वे बकाया रकम को एक से दूसरे में स्थानांतरित करते रहते हैं।
आसान डिजिटल क्रेडिट और ऊंची ब्याज दर
फिनटेक ऐप्स और डिजिटल लेंडिंग प्लेटफॉर्म ने बिना कागजी प्रक्रिया के 10 हजार से 2 लाख रुपये तक के त्वरित लोन उपलब्ध करा दिए हैं। लेकिन इन पर वार्षिक ब्याज दर 18 से 48 प्रतिशत तक हो सकती है। क्रेडिट कार्ड पर केवल ‘मिनिमम ड्यू’ चुकाने से मूल राशि कम नहीं होती और ब्याज चक्रवृद्धि रूप में बढ़ता रहता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार उधार देने वाली संस्थाएं उधारकर्ता की वास्तविक भुगतान क्षमता का समुचित आकलन किए बिना लोन स्वीकृत कर देती हैं, जिससे ओवरलेवरेजिंग की स्थिति बन जाती है।
आय और खर्च का बढ़ता अंतर
महंगाई, किराया, ट्रांसपोर्ट, खाने-पीने और मनोरंजन पर बढ़ते खर्च ने युवाओं की बचत लगभग खत्म कर दी है। एक अध्ययन के अनुसार 41 प्रतिशत युवा अपनी सैलरी से असंतुष्ट हैं और 21 प्रतिशत का कहना है कि आय महंगाई के अनुरूप नहीं बढ़ रही।
जब आय और अपेक्षाओं के बीच अंतर बढ़ता है, तो कमी पूरी करने के लिए क्रेडिट का सहारा लिया जाता है। बड़े शहरों में सामाजिक तुलना और दिखावे की संस्कृति भी खर्च को बढ़ाती है।
सोशल मीडिया और मनोवैज्ञानिक दबाव
सोशल मीडिया पर दिखने वाली लाइफस्टाइल, ट्रैवल रील्स और गैजेट्स की दौड़ युवाओं को प्रभावित करती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ‘तुरंत संतुष्टि’ की मानसिकता और भविष्य की आय पर अत्यधिक भरोसा भी जोखिम बढ़ाता है। कई युवा यह मानकर खर्च करते हैं कि आगे चलकर आय बढ़ेगी और कर्ज आसानी से चुक जाएगा, लेकिन वास्तविकता में ब्याज की गति आय वृद्धि से अधिक होती है।
खतरे के संकेत क्या हैं
वित्तीय सलाहकार कुछ प्रमुख चेतावनी संकेत बताते हैं—
- यदि EMI आय के 50 प्रतिशत से अधिक हो रही है।
- क्रेडिट कार्ड पर बार-बार केवल न्यूनतम भुगतान किया जा रहा हो।
- लोन चुकाने के लिए नया लोन लेना पड़ रहा हो।
- क्रेडिट उपयोग सीमा 80-90 प्रतिशत तक पहुंच गई हो।
ऐसी स्थिति में कर्ज का जाल गहरा होने की आशंका बढ़ जाती है।
समाधान क्या हो सकता है
विशेषज्ञों की राय है कि कुल EMI आय के 30-40 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। क्रेडिट कार्ड उपयोग 30 प्रतिशत सीमा के भीतर रखना बेहतर है। अनसिक्योर्ड लोन को अंतिम विकल्प के रूप में ही लेना चाहिए और केवल संपत्ति निर्माण या करियर उन्नति जैसे उत्पादक उद्देश्यों के लिए कर्ज लेना अधिक सुरक्षित माना जाता है।
साथ ही, कम से कम छह महीने के खर्च के बराबर इमरजेंसी फंड तैयार करना जरूरी है, ताकि अचानक आय रुकने या मेडिकल इमरजेंसी की स्थिति में नया कर्ज लेने की नौबत न आए।
नियामकीय सख्ती की जरूरत
वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि लेंडिंग संस्थानों को भी उधार देते समय सख्त अंडरराइटिंग मानदंड अपनाने चाहिए। अत्यधिक ब्याज दरों और आक्रामक रिकवरी प्रथाओं पर नियंत्रण आवश्यक है, ताकि युवा पीढ़ी कर्ज के अस्थिर चक्र में न फंसे।
तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था में Gen Z उपभोग और डिजिटल क्रांति का चेहरा जरूर है, लेकिन यदि वित्तीय अनुशासन और जागरूकता नहीं बढ़ी, तो यह पीढ़ी कमाई से ज्यादा कर्ज के बोझ के लिए जानी जा सकती है।




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