खरी-अखरी : सत्ता के लिए देश की कुर्बानी मंजूर – देश के लिए सत्ता की कुर्बानी ना मंजूर
सत्ता के लिए देश की कुर्बानी मंजूर – देश के लिए सत्ता की कुर्बानी ना मंजूर
FACT SHEET : The United States and India announce historic Trade Deal. India will eliminate or reduce tariffs on all U.S. industrial goods and a wide range of U.S. food and agricultural products, including dried distillers grains (DDGs) red sorghum, tree nuts, fresh and processed fruit, soybean oil, wine and spirits and additional products. India will address non-tariff barriers that affect bilateral trade in priority areas. The United States and India will negotiate rules of origin that ensure that the agreed benefits accrue predominantly to the United States and India. India intends to buy more American products and purchase over 500 billion dollar of U.S. energy, information and communication technology, coal, and other products. India will address non-tariff barriers that affect bilateral trade in priority areas. The United States and India will negotiate rules of origin that ensure that the agreed benefits accrue predominantly to the United States and India.
ये वो कृति कफ़न है जिसे व्हाइट हाउस ने जारी किया है भारत और अमेरिका के बीच हुए व्यापारिक समझौते को लेकर। जिसे बताने के लिए भारत के वाणिज्य मंत्री और विदेश मंत्री एक दूसरे के पाले में गेंद फेंक रहे थे और प्रधानमंत्री ने चुप्पी साध ली। विपक्ष इस कृति कफ़न को लेकर जनता खासतौर पर किसानों के बीच पहुंच गया तो मुश्किल में आई सरकार ने अपनी गिरती साख को बचाने के लिए मंत्रियों की फौज उतार दी विपक्ष द्वारा बताई जा रही सच्चाई को झूठ में बदलने के लिए। दूसरी तरफ जिस तरह से एप्स्टिन फाइल से निकल रहे सांप-बिच्छू प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, तेल मंत्री हरदीप पुरी, कुबेरपति अनिल अंबानी, राजघराने वाली दिया कुमारी को डसने की ओर बढ़ रहे हैं उससे भी मोदी सत्ता की धड़कनें बढ़ी हुई हैं और उन धड़कनों को पूरी तरह से अस्त व्यस्त करने के लिए विपक्ष लगा हुआ है। तो सरकार करे क्या ?
पिछले 11 बरस से टैक्स पेयर्स के अरबों रुपये खर्च कर जिस शख्स की छबि गढ़ी गई अब उसी शख्स की वो छबि दरकने लगी है और दूसरा ऐसा कोई शख्स है नहीं जो उसे दरकने से रोक सके तो क्या बदनुमा होती तस्वीर पर परदा डालने के लिए किसी बलि के बकरे को तलाशा जा रहा है ? तो क्या इसीलिए तेल मंत्री हरदीप पुरी को कहा गया कि जाइए और हर न्यूज चैनल को इंटरव्यू देकर खुद को निशाने पर ले आइए कि आपकी मुलाकात मिस्टर जेफरी एप्स्टिन से हुई थी। इसीलिए कैबिनेट मिनिस्टर गिरिराज सिंह से कहा गया कि आप नेहरू को कटघरे में खड़ा करने वाली तस्वीरों को लेकर सड़क पर उतर जाइए और बताइए कि एप्स्टिन फाइल कोई मायने नहीं रखती है। इसीलिए विदेश मंत्री एस जयशंकर से कहा गया कि अभी तक आप जिस तेल खरीदी को लेकर मुखर थे अब बिल्कुल खामोश हो जाइए। इसीलिए कामर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल को कहा गया अमेरिका से हुई डील को इस तरीके से बताना शुरू कर दीजिए कि भारत को लाभालाभ होने वाला है आप भले ही एग्रीकल्चर मिनिस्टर नहीं हैं लेकिन आप ही बताइए इस डील से किसानों को कितना फायदा होने वाला है लेकिन तेल से पल्ला झाड़ लीजिए । इसीलिए अश्वनी वैष्णव को आगे कर दिया गया कि आईटी एक्ट को नये सिरे से गूंथना शुरू कीजिए जिससे आईटी एक्ट को लेकर बरती जा रही ढिलाई के संदेशे पर पर्दा पड़ जाए। इसीलिए अरावली पर्वत को लेकर सरकार की हो रही छीछालेदर पर पर्यावरण मंत्री को खामोशी बरतने के लिए कह दिया गया और अगर कुछ कहना भी तो अरावली के हो रहे चीरहरण को जायज ठहराते हुए कहना। इसीलिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन को कहा गया जाइए और बजट के मद्देनजर उन बातों का जिक्र कीजिए जो सीधे तौर पर अमेरिकी डील से जाकर जुड़ती हैं। भारत की अर्थव्यवस्था कैसे मजबूत हो रही है और बजट भारत को विकसित भारत बनाने के लिए बनाया गया है। इसीलिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को कहा गया कि डिफेंस डील पर चुप रहिए मगर यह जरूर बोलिए कि आपरेशन सिंदूर के बाद भारत की सैन्य ताकत कैसे बढ़ी है लेकिन इस पर कोई प्रतिक्रिया बिल्कुल मत दीजिए जो किस तरीके से फ्रांस, रशिया और अमेरिका से डिफेंस क्षेत्र में समझौते होने वाले हैं।
अमेरिका के भीतर से आने वाले फैक्ट्स एंड फिगर तो यही बता रहे हैं कि आने वाले समय में भारत को कितना नुकसान उठाना पड़ेगा। अमेरिका का रुख जिस तरीके से रशिया की तरफ मुड़ रहा है और रशिया भी जिस तरीके से अमेरिका के साथ खड़ा हो चला है जिसे ब्लूमबर्ग में छपी रिपोर्ट से समझा जा सकता है जिसमें रशिया को डाॅलर पर कोई आपत्ति नहीं है वह अपनी तमाम डील डाॅलर में करने को तैयार है यानी अमेरिका और रशिया एक मंच में खड़े दिख रहे हैं। हो सकता है कि आने वाले समय में यूक्रेन युद्ध ना केवल थम जाए बल्कि जिस जमीन पर रशिया ने कब्जा कर लिया है वह जमीन यूक्रेन के ही हवाले कर दी जाए। यानी एक बिल्कुल नई सोच डवलप हो सकती है। लेकिन सवाल तो भारत के भीतर का है। क्या मोदी कैबिनेट के किसी भी मंत्री में इतनी ताकत है या कहें इतनी काबिलियत है या कहें इतनी औकात है कि वह अपने मंत्रालय को अपने हिसाब से चला सके ? और अगर नहीं है तो फिर उसकी पहचान क्या है ?
इस दौर में तमाम मंत्रालयों का कच्चा चिट्ठा बतलाता है कि बीते 10 वर्षों में जिस भी मंत्रालय ने जो भी निर्णय लिए हैं जिस पर अभी तक यही माना जा रहा था कि वह पीएमओ से निकल कर आ रहे हैं लेकिन नहीं वह तो किसी तीसरी जगह से निकल कर आये हैं ! वह वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ का प्लान हो सकता है। वह उन ताकतवर देशों के राष्ट्राध्यक्षों से निकली हुई परिस्थितियों से हो सकते हैं जिनके नाम एप्स्टिन फाइल में दर्ज हैं। अब तो सवाल 2014 से अभी तक बनने वाले मंत्रीमंडल को लेकर भी है कि क्या उसके ऊपर अंतरराष्ट्रीय नेक्सेस का प्रभाव है। अमेरिका के भीतर इस बात को लेकर हलचल है कि दरअसल उसे अब नई विश्व व्यवस्था में नये तौर तरीके के आसरे नये नये देशों के साथ खड़ा होना होगा जिसका जिक्र मार्को रूबियो यह कहकर करते हैं कि सब कुछ बदल गया है। इस जियो पालिटिक्स का मतलब वह नहीं है जो पुराने वक्त में हुआ करता था। इस नई विश्व व्यवस्था का मतलब है जिन भी देशों में राजनीतिक सत्ता के समानांतर वहां का जो कार्पोरेट है, जो बिजनेसमैन है, जो अंतरराष्ट्रीय धंधे में अमेरिका के साथ खड़ा है उसे ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाय और यह संदर्भ भारत को लेकर भी है।
2014 के बाद से मोदी सरकार द्वारा जो भी निर्णय लिए जा रहे हैं वो कहीं ना कहीं, कोई ना कोई नेक्सेस एप्स्टिन के नेक्सेस से जुड़ जाता है। अमेरिका ने अभी तक भारत सरकार को वेनेजुएला से तेल खरीदने का कोई लाइसेंस नहीं दिया है लेकिन भारत के भीतर रिफाइनरी चलाने वाले प्राइवेट सेक्टर को लाइसेंस दे दिया गया है कि वे सीधे वेंजुला से तेल खरीद सकें। अमेरिका द्वारा वेंजुला के राष्ट्रपति को अगवा करने के बाद चीन ने तकरीबन 4 लाख बैरल हर दिन लिए जाने वाले तेल को लेना बंद कर दिया है। यानी जब तक राजनीतिक सत्ता की जरूरत हो उस पर वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ की नीतियों के आसरे दबाव बनाकर काम करवाया जाय जो अभी तक किया जा रहा था लेकिन जिस तरीके से भारतीय पालिटिक्स बीते 10-11 बरसों के भीतर बिजनेस पर जाकर निर्भर हो गई तो फिर किसी पालिटीशियंस की जरूरत क्या है ? तो क्यों ना बिजनेस के जरिए ही हर देश की इकोनॉमी को साध लिया जाए ? जिससे हर उस देश के बड़े बड़े कार्पोरेट हाउसेज को अपने हिसाब से हांकने में कोई दिक्कत भी नहीं आयेगी।
13 नवम्बर 2014 को रीड हाफमैंन को एप्स्टिन ने मेल करके डिजिटल इंडिया के बारे में जानकारी दी और जेफरी एप्स्टिन को डिजिटल इंडिया की जानकारी उस वक्त एक साधारण व्यक्ति की हैसियत होने के बावजूद हरदीप पुरी द्वारा दी गई जबकि भारत में डिजिटल इंडिया की शुरुआत जुलाई 2015 में हुई। यानी 2014 में ही डिजिटल इंडिया उस नेक्सेस के हाथ में जा चुका था जिसको जुलाई 2015 में लागू किया गया। जिस तरह से मोदी सरकार द्वारा अंबानी और अडानी को हर क्षेत्र में पैर रखने के लिए एनओसी दे दी जाती है और उसके बाद उस क्षेत्र में काम करने वाली सरकारी कंपनियां एक झटके में घाटे में आ जाती हैं और वो प्रोडक्ट हों, कंपनियों के शेयर्स हों सभी डिसइंवेस्टमेंट के नाम पर प्राइवेट कंपनियों के पास चले जाते हैं तो कहा जा सकता है कि अमेरिका के साथ हुई मौजूदा डील सरकार की मौजूदगी में कार्पोरेट हाउसेज के साथ है। यानी जो दरवाज़ा खोला जा रहा है उस दरवाज़े की चाबी अमेरिका के पास है या फिर अमेरिका जिस नई विश्व व्यवस्था में नये तरीके से चीजों को सहेजना चाहता है उसमें उसे भारत की जरूरत सिर्फ और सिर्फ यहां के कार्पोरेट हाउसेज को किस दिशा में ले जाना है उस नेक्सेस को बांधने की है।
अमेरिका से हुई ट्रेड डील की जो फैक्ट शीट व्हाइट हाउस के भीतर से निकल कर आई है उससे भारत में अलग अलग क्षेत्रों से जुड़े हुए लोगों को आने वाले संकट की आहट सुनाई देने लगी है। इस संकट ने मौजूदा सत्ता के मंत्री, सांसद तक के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी कर दी है जिनके पास इतनी राजनीतिक ताकत नहीं है जो अपने क्षेत्र में भी मोदी के चेहरे के भरोसे जीतते हैं यानी उनका खुद का कोई राजनीतिक वजूद नहीं है। 2014 में जब से नरेन्द्र मोदी ने सत्ता संभाली तबसे राजनीतिक सत्ता के भीतर नैतिकता शब्द को दफ्न कर दिया गया है और नैतिकता के आधार पर होने वाले इस्तीफे गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो गए हैं। मोदी समेत एक लंबी फेहरिस्त है जिन्हें नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे देना चाहिए था इसमें एस जयशंकर, हरदीप पुरी, पीयूष गोयल, अश्वनी वैष्णव, भूपेन्द्र यादव, धर्मेंद्र प्रधान, निर्मला सीतारमन, गिरिराज सिंह, प्रहलाद जोशी, मनसुख मांडविया को शामिल किया जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इस बात का अह्सास है कि अगर ट्रेड डील हो या एप्स्टिन फाइल हो या फिर देश की इकोनॉमी को ना संभाल पाने की परिस्थिति हो इनके आधार पर अगर एक का भी इस्तीफा लिया गया तो उनकी कुर्सी भी झुलसने लगेगी और सरकार भरभरा कर गिर जायेगी। इसीलिए इस्तीफा नहीं लिया-दिया जाता है।
अपनी साख बचाने के लिए मोदी सरकार के पास एक सूत्रीय फार्मूला है ऐन केन प्रकारेण हरहाल में साम दाम दंड भेद करके चुनाव जीतना। जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मैसेज दिया जाए आपके अनुकूल रास्ता तो हम ही बनायेंगे, हमारे अलावा कोई दूसरा रास्ता बना नहीं पायेगा। तो क्या इसीलिए पहली बार विपक्ष का नेता भारतीय सत्ता प्रमुख की जगह अमेरिकी सत्ता प्रमुख से लड़ता हुआ नजर आया और उस अंतरराष्ट्रीय नेक्सेस को उभारने की कोशिश में लगा रहा जिससे यह मैसेज निकलकर आये कि भारत की मौजूदा राजनीतिक सत्ता वजीर की जगह प्यादे में तब्दील हो गई है। यह भी उभर कर सामने आया कि हर देश की राजनीतिक सत्ता में बैठा हुआ शख्स सबसे बड़ा व्यापारी है और ट्रंप ने अपने दूसरे कालखंड में खुलकर बताना शुरू किया कि बदलती हुई दुनिया के भीतर हर चुनी हुई सरकार का हर निर्णय खुद को बनाए रखने के लिए है। कैपिटल और पालिटिकल इकोनॉमी के ऊपर आकर टिक गया है जो तमाम पाॅलिसीज तय कर रही है। इसीलिए मोदी सरकार में इस्तीफे होते नहीं है। इसलिए अमेरिका के साथ हुई ट्रेड डील हो या एप्स्टिन फाइल हो किसी को लेकर भी ना तो हरदीप पुरी बलि का बकरा बनेगा ना ही पीयूष गोयल, भले ही इस बात को लेकर लाख कयास लगाए जा रहे हों। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गांधी के तीन बंदरों की भूमिका अपना ली है। जबकि अमेरिका के साथ ट्रेड डील किए जाने की लकीर पहली बार खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनवरी 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ व्हाइट हाउस में खींची थी। तब अमेरिकन जर्नलिस्ट ने अडानी को लेकर सवाल पूछते हुए पीएम मोदी को असहज कर दिया था। Modi have you ask the president to take action on that case. जिसका सीधा उत्तर देने के बजाय प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था भारत एक लोकतांत्रिक देश है और हमारे संस्कार, हमारी संस्कृति वसुधैव कुटुम्बकम की है। हम पूरे विश्व को अपना एक परिवार मानते हैं। हर भारतीय को मैं अपना मानता हूं। दूसरी बात है ऐसे व्यक्तिगत मामलों के लिए दो देश के मुखिया ना मिलते हैं ना बैठते हैं ना बात करते हैं। दरअसल आज की परिस्थितियों में यह सवाल जवाब एक ऐसे त्रिकोण की ओर इंगित करता है जिसमें मोदी सरकार फंसी हुई दिखाई देती है। अडानी का मामला, ट्रेड डील का मामला और जेफरी एप्स्टिन का मामला। और इन तीनों परिस्थितियों के बीच किसी ना किसी रूप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी भी दिखाई देती है। मोदी सत्ता के सामने सबसे बड़ी चुनौती मोदी की तार तार हो रही छबि के साथ ही अपनी राजनीति को बचाने की आकर खड़ी हो गई है। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ट्रेड डील और एप्स्टिन फाइल को लेकर खामोशी बरत ली है और कवच बतौर हरदीप पुरी और पीयूष गोयल सहित तमाम मंत्रियों को आगे कर दिया गया है अगर परिस्थितियां इस्तीफे तक आकर खड़ी हो जाती हैं तो किसी को भी बलि का बकरा बना कर कुर्सी बचाने के लिए कुर्बानी दे दी जाए।
राजनीतिक विश्लेषकों के बीच में इस बात को लेकर भी चर्चा चल रही है कि संसद की कार्रवाई के आखिरी 10 दिनों में मोदी की परछाई, बीजेपी के चाणक्य, सरकार के संकट मोचन कहे जाने वाले गृहमंत्री अमित शाह की मौजूदगी क्यों नहीं रही ? अभी तक माना जाता था कि जो भी मोदी और शाह की जोड़ी तय करती है बीजेपी उसी दिशा में चल देती है। लेकिन जब किसी व्यक्ति को किसी पद पर स्थापित करना होता है तो मोदी की पसंद ही सर्वोपरि होती है यहां पर शाह की पसंद कोई मायने नहीं रखती शिवाय यस सर कहने के। चाहे वह ईडी, सीबीआई, सीएम, राज्यपाल की नियुक्ति ही क्यों ना हो। तभी तो मध्यप्रदेश में मोहन यादव, राजस्थान में भजन लाल शर्मा, छत्तीसगढ़ में विष्णु देव सांई, उडीसा में मोहन चरण मांझी, दिल्ली में रेखा गुप्ता तमाम सीनियर्स और कद्दावरों को दरकिनार करते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिए गए। इतना ही नहीं समूची बीजेपी का बाॅस एक ऐसे नये नवेले नितिन नवीन को बना दिया गया जिसने अपने समूचे राजनीतिक कैरियर में कोई भी राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारी नहीं संभाली थी। शायद इसमें भी अमित शाह से कोई मशवरा नहीं किया गया सिर्फ जानकारी दी गई। यह सही है कि फिलहाल बीजेपी के भीतर 1 से लेकर 10 नंबर पर एक ही नेता का नाम है लेकिन 11 नंबर पर तो अमित शाह का नाम आता है। जिसने किसी ना किसी रूप में अपनी अलग पहचान बनाई है। जो अपनी अहमियत और अपनी ताकत के बूते अपनी राजनीति के लिहाज से अपनी बिसात बिछाता है। लेकिन जब संसद के भीतर स्पीकर संकट में आ गए यहां तक कि उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आ गया, अडानी के खिलाफ अमेरिका में चल रहे केस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की गर्दन फंसी होने का जिक्र किया गया, एप्स्टिन फाइल का खुले तौर पर जिक्र किया गया, अमेरिका के साथ हुई ट्रेड डील को लेकर सरकार पर देश को गिरवी रखने का सवालिया निशान लगा दिया गया लेकिन उसे संभालने के लिए कोई नहीं था और जो संभालने के लिए आगे आए उनकी अपनी कोई राजनीतिक साख है नहीं । वे तो मदारी के इशारे पर जमूरों की भांति बिना सिर पैर की बातों को बोलने निकल पड़ते हैं।
You are not totally, employee and by the BJP at least trying do a little bit of a objective staff. You know it gets really shameful. It’s to match don’t you think you are one second. You are responsible people. You are media people. You have a responsibility to be objective. You can’t just take a word they give you. Right every day. And then sure whole show on that. You are doing a disservice to this country. You are not able to recognize that. ये है विपक्ष के नेता की स्ट्रीम मीडिया के लिए मीडिया कर्मियों के बीच की गई समसामयिक टिप्पणी।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार



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