सोचता हूँ, कि वो कितने …. थे मान्यवर हो रहे देखते-देखते !
नगर निगम चुनाव की आहट क्या हुई, हमारे क्षेत्र के एक नेताजी अचानक से पूर्णकालिक जनसेवक बनने की राह पर चल पड़े हैं । जो कल तक चाय की प्याली के साथ राजनीति के साथ-साथ दूसरों के कारगुजारी का विश्लेषण किया करते थे, सुना है आजकल सुबह की सैर भी जनता के बीच ही करते हैं । कहीं कैमरा से एक पल भी छूट न जाए , इसलिए हर मोमेंट को रिकॉर्ड करके सोशल मीडिया पर डालना आजकल उनका लक्ष्य हो गया है । लक्ष्य स्पष्ट है नेताजी से “मान्यवर” बनने की यात्रा जो पूरी करनी है ।
नेताजी इन दिनों अपनी संघर्षगाथा बड़े भावुक अंदाज़ में लोगों को सुनाते दिखाई पड़ जाते हैं। कहते हैं, “मैं तो वर्षों से तपस्या कर रहा हूँ।” सुनने वाले भी श्रद्धा से सिर हिलाते हैं। फर्क बस इतना है कि यह तपस्या किसी वन में नहीं, बल्कि वातानुकूलित कमरों और व्हाट्सऐप ग्रुपों में आजकल ज्यादा हो रही है। नेताजी का दावा है कि जैसे ऋषि विश्वामित्र की तपस्या में विघ्न डालने के लिए अप्सराएँ आई थीं, वैसे ही उनकी तपस्या में विघ्न डालने सोशल मीडिया आ गया।
अब विघ्न भी ऐसा पड़ा कि तपस्या ही प्रचार बन गई। आजकल नेताजी यदि किसी को दो रोटी भी खिला दें तो पहले प्लेट सजती है, फिर कैमरा , और उसके बाद पोस्ट सजती है। कैप्शन होता है “जनसेवा ही मेरा धर्म।” क्योंकि नेताजी का नया सिद्धांत है “जो दिखता है, वही बिकता है।” सेवा से ज्यादा महत्वपूर्ण है उसका ‘स्टेटस अपडेट’।
सोशल मीडिया ने नेताजी को इतना जागरूक बना दिया है कि अब वे हर कार्य के पहले पूछते हैं “वीडियो बन रहा है ना?” जनता भी समझदार है, वह जानती है कि यह दौर तपस्या से ज्यादा ‘ट्रेंडिंग’ का है। हालांकि पहले मान्यवर ऐसे ना थे पहले वह वाकई में तपस्या करते थे यह तो सोशल मीडिया ने उनको ऐसा चस्का लगाया कि अब तपस्या सोशल मीडिया पर ही होने लगी है । और खुद ही मियां मिट्ठू बिल्कुल मिले सुर मेरा तुम्हारा की तर्ज पर बने पड़े हैं ।
उधर, इन दिनों नेताजी एक और विषय पर गहरी चिंता जताते दिखते हैं—Jeffrey Epstein case को लेकर । कुछ महीनों पहले की गई विदेश यात्रा से लौटने के बाद से अब वे हर चर्चा में इस फाइल का जिक्र कर देते हैं। असल में चिंता यह है कि कहीं वैश्विक फाइलों में नाम न आ जाए और नगर निगम की कुर्सी की जगह कोई और ‘पदवी’ न मिल जाए। यानी मान्यवर बनने से पहले “मान्यवर संदिग्ध” न घोषित कर दिए जाएँ।
राजनीति में मासूमियत का यह रूप बड़ा रोचक है। कल तक जो व्यवस्था को कोसते थे, आज उसी व्यवस्था के पोस्टर पर मुस्कराते हैं। मान्यवर की तपस्या अब तप नहीं, ट्रेंड है। सेवा अब सेवा नहीं, सेल्फी है। और चुनाव अब जनादेश से ज्यादा खुद के प्रचार का उत्सव बन गया है।
कभी-कभी सचमुच मन में ख्याल आता है , तब दिल सोचता है , कि वो कितने ….. थे , मान्यवर हो रहे देखते-देखते!




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