141 दवाएं गुणवत्ता जांच में फेल, हेल्थकेयर सप्लाई चेन पर सवाल; कंपनियों को रिकॉल के निर्देश
नई दिल्ली/शिमला, 22 अप्रैल — देश के फार्मा सेक्टर में गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ गई है। Central Drugs Standard Control Organization (CDSCO) की ताज़ा जांच में 141 दवाओं के सैंपल मानकों पर खरे नहीं उतरे हैं, जिन्हें ‘नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी’ (NSQ) घोषित किया गया है। नियामक ने संबंधित कंपनियों को नोटिस जारी करते हुए प्रभावित बैच का पूरा स्टॉक बाजार से वापस मंगाने के निर्देश दिए हैं।
जांच के दायरे में आई दवाएं रोजमर्रा की बीमारियों—सिरदर्द, पेट दर्द, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और अल्सर—से लेकर गंभीर बीमारियों जैसे हृदय रोग और कैंसर तक के इलाज में इस्तेमाल होती हैं। उद्योग सूत्रों के अनुसार, फेल सैंपल्स में 46 दवाएं हिमाचल प्रदेश के प्रमुख फार्मा क्लस्टर्स—बद्दी, बरोटीवाला, नालागढ़, ऊना और सोलन—में निर्मित पाई गईं, जो देश के बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब माने जाते हैं।
इस घटनाक्रम ने दवा नियमन और निगरानी तंत्र पर बहस तेज कर दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ फेल बैच अपेक्षाकृत हाल के उत्पादन (2024) के हैं, जिससे सप्लाई चेन में गुणवत्ता आश्वासन की प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं। हालांकि, नियामक ढांचा Drugs and Cosmetics Act, 1940 के तहत कंपनियों पर गुणवत्ता की प्राथमिक जिम्मेदारी डालता है, वहीं विभाग द्वारा रेंडम सैंपलिंग की व्यवस्था लागू है।
ड्रग कंट्रोल प्रशासन के अधिकारियों के मुताबिक, किसी दवा की सप्लाई से पहले अनिवार्य प्री-टेस्टिंग का प्रावधान नहीं है; सैंपलिंग और जांच के बाद यदि दवा फेल होती है, तो संबंधित बैच को तुरंत रिकॉल किया जाता है। नियमों के उल्लंघन पर लाइसेंस निलंबन, रद्दीकरण और आर्थिक दंड जैसी कार्रवाई भी की जा सकती है।
फार्मा उद्योग के लिए यह घटनाक्रम प्रतिष्ठा और निर्यात संभावनाओं, दोनों के लिहाज से अहम माना जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि बार-बार सामने आ रहे NSQ मामलों से भारत की “फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड” छवि को नुकसान पहुंच सकता है, यदि गुणवत्ता नियंत्रण में ठोस सुधार नहीं किए गए।
कुल मिलाकर, दवाओं की गुणवत्ता पर सख्ती और निर्माण स्तर पर निगरानी बढ़ाने की जरूरत फिर से रेखांकित हुई है, ताकि मरीजों की सुरक्षा और उद्योग की विश्वसनीयता दोनों को सुनिश्चित किया जा सके।




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