पेट्रोल ₹18 और डीजल ₹35 तक महंगा हो सकता है: कच्चे तेल की तेजी से बढ़ा दबाव, चुनावों के बाद कीमतों में उछाल की आशंका
देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर बड़ा अपडेट सामने आया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव और हालिया तेजी के चलते आने वाले समय में ईंधन की कीमतों में भारी वृद्धि हो सकती है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि पेट्रोल करीब ₹18 प्रति लीटर और डीजल ₹35 प्रति लीटर तक महंगा हो सकता है।
बताया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों में चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद तेल कंपनियां कीमतों में बढ़ोतरी का फैसला ले सकती हैं।
कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में पिछले कुछ हफ्तों में जबरदस्त तेजी देखी गई है। आंकड़ों के अनुसार:
- 27 फरवरी को कच्चा तेल करीब 73 डॉलर प्रति बैरल था
- 19 मार्च तक यह बढ़कर 120 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया
- 14 अप्रैल को यह घटकर लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया
इस तरह महज 46 दिनों में कीमतों में करीब 27 डॉलर का उछाल दर्ज किया गया, जिसने भारतीय तेल कंपनियों की लागत को काफी बढ़ा दिया है।
तेल कंपनियों को भारी नुकसान
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बावजूद देश में पेट्रोल-डीजल के दाम लंबे समय से स्थिर बने हुए हैं। इसके कारण सरकारी तेल कंपनियों पर भारी वित्तीय दबाव बन गया है।
रिपोर्ट के अनुसार:
- पेट्रोल पर करीब ₹18 प्रति लीटर का नुकसान
- डीजल पर करीब ₹35 प्रति लीटर का घाटा
पहले यह नुकसान प्रतिदिन लगभग ₹2,400 करोड़ तक पहुंच गया था। हालांकि सरकार द्वारा एक्साइज ड्यूटी में ₹10 की कटौती के बाद यह घटकर करीब ₹1,600 करोड़ प्रतिदिन रह गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से कंपनियों का नुकसान लगभग ₹6 प्रति लीटर बढ़ जाता है।
चुनाव के बाद बढ़ सकते हैं दाम
विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा समय में कई राज्यों में चुनाव प्रक्रिया जारी होने के कारण तेल कंपनियां कीमतों में बदलाव से बच रही हैं। लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होंगे, कंपनियां नुकसान की भरपाई के लिए दाम बढ़ा सकती हैं।
इससे आम उपभोक्ताओं पर सीधा असर पड़ेगा और महंगाई में भी इजाफा हो सकता है।
आयात पर निर्भरता बनी बड़ी चुनौती
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। देश करीब 88% कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है, जिसमें:
- लगभग 45% मिडिल ईस्ट देशों से
- करीब 35% रूस से आयात होता है
ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
चालू खाता घाटा बढ़ने की आशंका
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें देश के चालू खाता घाटे (CAD) को भी प्रभावित कर सकती हैं। अनुमान है कि 2026 की पहली तिमाही में यह घाटा बढ़कर 20 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
इससे रुपये पर दबाव बढ़ सकता है और आर्थिक संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
सरकार के राजस्व पर असर
तेल पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी सरकार के राजस्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है, लेकिन इसमें लगातार गिरावट देखी जा रही है।
- वित्त वर्ष 2017 में कुल राजस्व में हिस्सेदारी 22% थी
- वर्तमान में यह घटकर लगभग 8% रह गई है
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सरकार एक्साइज ड्यूटी पूरी तरह खत्म भी कर दे, तब भी मौजूदा हालात में तेल कंपनियों का घाटा पूरी तरह समाप्त नहीं होगा।
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, तेल कंपनियों के बढ़ते नुकसान और चुनावी परिस्थितियों के बीच पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी लगभग तय मानी जा रही है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चुनावों के बाद सरकार और तेल कंपनियां कीमतों को लेकर क्या फैसला लेती हैं और इसका आम जनता की जेब पर कितना असर पड़ता है।




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