90 दिन बाद भी खाली हैं पंचकूला निगम की दो अहम कुर्सियां
डिप्टी मेयर और सीनियर डिप्टी मेयर चुनाव पर छाई सियासी चुप्पी ?
नियमों में 60 दिन की समयसीमा, और मेयर को शपथ लिए 75 दिन बीते;
पार्षदों में अंदरखाने बढ़ रही नाराजगी, क्योंकि 2021 से चली आ रही है दोनों पदों के चुनाव टलने की कहानी
पंचकूला नगर निगम में डिप्टी मेयर और सीनियर डिप्टी मेयर के चुनाव को लेकर अब राजनीतिक सवाल लगातार तेज हो रहे हैं। नगर निगम चुनाव के परिणाम घोषित हुए आज 90 दिन पूरे हो रहे हैं, जबकि नियमानुसार दोनों पदों के लिए चुनाव परिणाम के 60 दिनों के भीतर कराए जाने चाहिए । इसके बावजूद नगर निगम की दो महत्वपूर्ण राजनीतिक कुर्सियां अब तक खाली हैं।
दिलचस्प बात यह है कि मेयर श्याम लाल बंसल को शपथ लिए भी करीब 75 दिन बीत चुके हैं। ऐसे में अब कई पार्षद अंदरखाने सवाल उठा रहे हैं कि जब सदन का गठन हो चुका है और मेयर भी पदभार संभाल चुके हैं, तो फिर डिप्टी मेयर और सीनियर डिप्टी मेयर के चुनाव में देरी क्यों हो रही है?
60 दिन की समयसीमा, फिर भी फैसला नहीं
नगर निगम में डिप्टी मेयर और सीनियर डिप्टी मेयर सिर्फ औपचारिक पद नहीं माने जाते। ये दोनों पद सदन की राजनीतिक व्यवस्था और निर्णय प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं। ऐसे में निर्धारित समयसीमा के भीतर चुनाव नहीं होने से निगम की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
पार्षदों का कहना है कि वे लगातार निगम कार्यालय पहुंच रहे हैं और हर बार यही उम्मीद रहती है कि चुनाव की तारीख घोषित होने की सूचना मिलेगी। लेकिन अभी तक तस्वीर साफ नहीं हुई है।
2021 से खाली चल रही हैं दोनों कुर्सियां
सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यह है कि यह स्थिति पहली बार पैदा नहीं हुई। 2021 से ही पंचकूला नगर निगम में डिप्टी मेयर और सीनियर डिप्टी मेयर के पदों को लेकर अनिश्चितता बनी रही है।
पिछले कार्यकाल में जब कुलभूषण गोयल मेयर थे, तब भी दोनों पदों के चुनाव लंबे समय तक नहीं हो सके। बताया जाता है कि उस दौरान हाईकोर्ट के स्तर से चुनाव कराने के निर्देश भी आए थे, लेकिन चुनाव प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई।
चुनाव वाले दिन अधिकारी के बीमार होने से उठे थे सवाल
पिछले कार्यकाल में चुनाव कराने की प्रक्रिया शुरू होने के बावजूद जिस दिन चुनाव होना था, उसी दिन चुनाव अधिकारी के अचानक बीमार होने से प्रक्रिया रुक गई थी। इसके बाद चुनाव दोबारा कब होंगे, इसे लेकर लंबे समय तक स्थिति स्पष्ट नहीं हुई। उस घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक गलियारों में कई सवाल उठे, लेकिन कार्यकाल खत्म होने तक दोनों पदों के चुनाव को लेकर स्थायी समाधान नहीं निकल पाया।
अब नए सदन के गठन के बाद एक बार फिर वही सवाल सामने है—क्या इस बार भी पांच साल तक ये दोनों पद खाली रहेंगे?
पंजाब चुनाव से जोड़कर देखी जा रही राजनीतिक देरी
राजनीतिक गलियारों में एक चर्चा यह भी है कि डिप्टी मेयर और सीनियर डिप्टी मेयर के चुनाव को आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव की राजनीतिक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। चर्चा है कि भाजपा इन पदों पर अपने राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए चेहरे तय कर सकती है।
हालांकि, इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। यही वजह है कि पार्षदों के बीच भी असमंजस बना हुआ है।
‘पंजाब चुनाव को ध्यान में रखकर ही सही, कम से कम चुनाव तो हों’
कई पार्षदों का कहना है कि राजनीतिक समीकरण अपनी जगह हैं, लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लंबे समय तक टालना उचित नहीं है। उनका कहना है कि यदि चुनाव किसी राजनीतिक रणनीति के कारण लंबित हैं तो भी जल्द से जल्द तारीख घोषित की जानी चाहिए।
कुछ पार्षद तो यहां तक कह रहे हैं कि जिस तरह पिछली बार दोनों पद खाली रह गए थे, उससे अब उन्हें आशंका है कि इस बार भी पूरा कार्यकाल बिना डिप्टी मेयर और सीनियर डिप्टी मेयर के गुजर सकता है।
सवाल सिर्फ दो कुर्सियों का नहीं, व्यवस्था की विश्वसनीयता का है
पंचकूला नगर निगम में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब चुनाव परिणाम आए 90 दिन हो चुके हैं और मेयर को शपथ लिए 75 दिन, तो फिर दोनों पदों के चुनाव की तारीख कब तय होगी?
60 दिन की कथित समयसीमा के बाद भी चुनाव नहीं होने से अब सवाल राजनीतिक दलों से ज्यादा प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही पर उठ रहा है। पार्षदों की नजर अब उस तारीख पर है, जब निगम की ये दोनों खाली कुर्सियां आखिरकार राजनीतिक प्रतिनिधित्व हासिल करेंगी।
20 में से 17 पार्षद बीजेपी के फिर भी कुर्सियां खाली
यहां यह भी एक जानने वाली बात है कि पंचकूला नगर निगम में कुल 20 पार्षद है जिसमें से 17 पार्षद बीजेपी के कोटे से चुनाव जीत कर आए हैं । ऐसे भी भाजपा के सामने भी बड़ी असमंजस की स्थिति खड़ी हुई दिखाई पड़ रही है कि किसको कुर्सी पर बैठाया जाए और किसको माना किया जाए क्योंकि भाजपा के अंदर भी गुटबाजी बहुत ज्यादा चरम पर है । बड़े नेताओं ने अपने-अपने गुट बना रखे हैं और पार्षदों भी अलग-अलग गुट के बताए जाते हैं , गुटबाजी भी दोनों कुर्सियों को ना भरे जाने का एक कारण हो सकता है ।



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