ईरान पर मिसाइल से तो भारत पर महंगाई का अटैक
मिडिल ईस्ट तनाव का असर: कच्चे तेल की महंगाई से भारत की अर्थव्यवस्था पर बढ़ सकता है दबाव
पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल रहा है, जिसका असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो वित्त वर्ष 2027 में देश की महंगाई दर और आर्थिक वृद्धि दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
हालिया घटनाक्रम के बाद वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेजी आई है। फरवरी के अंत में जहां इसकी कीमत लगभग 73 डॉलर प्रति बैरल थी, वहीं हाल के कारोबारी सत्रों में यह बढ़कर 85 डॉलर के आसपास पहुंच गई और कुछ समय के लिए 94 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर चली गई। ऊर्जा कीमतों में यह तेजी भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए चिंता का विषय बन सकती है।
अर्थशास्त्रियों के अनुसार यदि कच्चे तेल का औसत मूल्य 75 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचता है तो भारत में महंगाई दर में लगभग 0.20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो सकती है। कई विश्लेषकों का अनुमान है कि लगातार ऊंची कीमतों की स्थिति में महंगाई पर कुल प्रभाव 10 से 20 बेसिस पॉइंट तक हो सकता है। इसके अलावा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में ईंधन का प्रभाव भी पहले की तुलना में बढ़ गया है, क्योंकि नई सीपीआई श्रृंखला में पेट्रोल और डीजल का भार बढ़ाकर लगभग 4.8 प्रतिशत कर दिया गया है।
भारत अपनी कुल जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें से बड़ी मात्रा पश्चिम एशिया के देशों से आती है। आयातित तेल का लगभग आधा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जो वर्तमान भू-राजनीतिक तनाव के कारण संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। वित्त वर्ष 2026 के शुरुआती महीनों में भारत के कुल तेल आयात का लगभग 47 प्रतिशत हिस्सा सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और इराक से आया था।
तेल की कीमतों में तेजी का असर केवल महंगाई तक सीमित नहीं रहेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे भारत की आर्थिक वृद्धि दर और चालू खाते का घाटा (CAD) भी प्रभावित हो सकता है। अनुमान है कि यदि कच्चे तेल की कीमतों में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है तो वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर में लगभग 0.15 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। इसी तरह यदि कीमतें लंबे समय तक 80 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहती हैं तो वित्त वर्ष 2027 में चालू खाते का घाटा जीडीपी के लगभग 1.3 से 1.8 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।
हालांकि कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि उपभोक्ताओं को तत्काल राहत देने के लिए पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में सीमित बदलाव किए जा सकते हैं। ऐसी स्थिति में तेल कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है, जबकि सरकार को कर संरचना में बदलाव या अन्य नीतिगत कदम उठाने पड़ सकते हैं। कुल मिलाकर वैश्विक तेल बाजार में जारी अनिश्चितता आने वाले समय में भारत की आर्थिक नीतियों के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती बन सकती है।




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