खरी-अखरी : जिस तरह से अमेरिकी आवाम सड़कों पर उतरी है तो क्या अमेरिका का हाल भी सोवियत संघ (USSR) की तरह होगा ?
जिस तरह से अमेरिकी आवाम सड़कों पर उतरी है तो क्या अमेरिका का हाल भी सोवियत संघ (USSR) की तरह होगा ?
ईरान से छेड़ा गया अमेरिका-इजराइल का युद्ध अब अमेरिका और इजराइल के भीतर ही गृह युद्ध में तब्दील होता हुआ दिख रहा है। अमेरिका और इजराइल की आवाम खुलकर सड़कों पर उतर कर युद्ध को रोकने की मांग करते हुए अपनी ही सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने लगी है। अमेरिका के 50 राज्यों में 3500 जगहों पर तकरीबन 80 लाख लोगों ने ईरान जंग के खिलाफ सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से इस्तीफे की मांग की। यहां तक कि ट्रंप को राजा की पदवी देते हुए कहा गया No TO KING. ITS TIME TO SAY NO TO KING’S. ITS TIME TO SAY NO TO DONE TRUMP WE HAD ENOUGH NO KING TRUMP NO UNNECESSARY WARS RUB OUR RESOURCE SACRIFICES ARE BREB SERVICE MEN AND WOMEN AND SLOT INNOCENCE NO CORRUPT LEADER INCHES HIM SELF AND CLUB. यानी कल तक जो लोग डेमोक्रेट्स के खिलाफ थे अब वही लोग रिपब्लिकन्स के खिलाफ खड़े हो गए हैं और उसी अंदाज में खिलाफत कर रहे हैं कि आप जो निर्णय ले रहे हैं वो बिल्कुल ठीक नहीं है।
राष्ट्रपति ट्रंप और उनका व्हाइट हाउस सिर्फ और सिर्फ इस बात पर आशान्वित और उम्मीददराज है कि अमेरिका ताकतवर है। अमेरिका की सेना सबसे मजबूत है। इसीलिए उसने देशभर में लाखों लोगों द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शन को यह कह कर खारिज कर दिया कि हम विरोध प्रदर्शन के बारे में बिल्कुल भी नहीं सोच रहे हैं लेकिन ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन के भीतर इस बात को लेकर खलबली कि सवाल तो जनता से ज्यादा अब अलग अलग पदों पर बैठकर गवर्नेंस के तौर तरीकों के तहत कानून को तय करने वाले रिपब्लिकन सेनेटर्स उठा रहे हैं। उनके भीतर इस बात की जद्दोजहद है कि आने वाले समय में रिपब्लिकन पार्टी की राजनीति बचेगी या नहीं बचेगी ? अमेरिका के भीतर यह माना जा रहा है कि ट्रंप जिस दिशा में युद्ध को ले जा चुके हैं ऐसे में उनके पास कोई विकल्प बचा नहीं है सिवाय इसके कि वो हर खिलाफत को खारिज कर दें, नजरअंदाज कर दें। इसीलिए नाटो कंट्रीज और यूनाइटेड किंगडम जिन मुद्दों पर जवाब मांग रहे हैं, जो सवाल स्पेन के प्राइम मिनिस्टर पूछ रहे हैं, जो सवाल जापान और आस्ट्रेलिया में उठ रहे हैं। उनका जवाब ना तो ट्रंप दे रहे हैं ना ही व्हाइट हाउस दे रहा है।
यह कोई सामान्य स्थिति नहीं है वह भी तब जब देश के सैनिक युद्ध लड़ने के लिए मैदान में भेजे जा रहे हों और देश की जनता यह कहते हुए सड़कों पर उतर आये कि यह युद्ध हमारा नहीं है। यह युद्ध हम पर जबरन थोपा गया है। युद्ध का निर्णय भी अलोकतांत्रिक तरीके से लिया गया है। और बात आगे बढ़ते हुए राजनैतिक तौर पर सत्ताधारियों के बीच ही दो अलग अलग दिशाओं में चल पड़े। यह स्थिति है अमेरिका के भीतर। दूसरी तरफ ऐसी ही स्थिति इजराइल के भीतर भी है। वहां पर भी लाखों लोग यह कहते हुए सड़क पर आ गये कि युद्ध रुक जाना चाहिए। यानी अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ लोग सड़क पर हैं और इन सबके बीच ईरान लगातार हमलावर है। तो क्या यह एक मैसेज है कि इस युद्ध में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अपनी साख गवां चुके हैं ? इजराइली पीएम नेतन्याहू युद्ध लड़ने की जिस कला के लिए जाने जाते हैं उसको लेकर भी अब तेल अबीब के भीतर बदहवासी में भागते हुए लोग, बजते हुए सायरन इसका संकेत दे रहे हैं कि कोई नहीं जानता है कि रास्ता किस ओर जायेगा। इसीलिए लगभग 80 हजार ट्रेनिंग शुदा लोगों ने यह कहते हुए किनारा कर लिया कि हम युद्ध में शरीक नहीं होंगे। यानी इजराइल के अंदर यह एक पालिटिकल संकट भी है और अनुशासित सेना के भीतर एक दरार भी है।
अमेरिका के भीतर सत्ताधारी रिपब्लिकन पार्टी के सेनेटर्स भी सवाल उठा रहे हैं कि पैदल सेना को मैदान में उतारा जाय या नहीं इसका फैसला पेंटागन क्यों नहीं कर पा रहा है ? कौन कौन से युध्दक विमान, युद्धपोत क्षतिग्रस्त हो गये हैं ? कल तक रणनीति की जो दिशा हार्मुज रूट की तरफ थी वह अब खार्ग आइलैंड की तरफ कैसे मुड़ गई ? होती अगर हमला करना शुरू कर चुके हैं तो रेड सी का क्या होगा ? किसी भी सवाल का उत्तर सेनेटर्स को पेंटागन के जरिए नहीं मिल रहा है। वहीं 7 महीने बाद यानी नवम्बर 2026 में मिड टर्म पोल होने वाला है। अगर इसमें रिपब्लिकन पार्टी अपनी सीटों को बरकरार नहीं रख पाती है तो उसका पुन: सत्ता में लौटना असंभव हो जाएगा और यह रिपब्लिकन पार्टी के आगामी राष्ट्रपति उम्मीदवार जेडी वेंस के लिए बहुत बड़ा आघात होगा। वैसे भी युद्ध के पहले जो 70 फीसदी जेडी वेंस के समर्थन में थे वह घटते घटते 53 फीसदी पर आ गए हैं। इसके बाद मार्को रूबियो हैं जिन्हें 40-42 फीसदी समर्थन प्राप्त है।
जेडी वेंस को यह समझ आने लगा है कि अगर वह अमेरिकी राजनीति में ट्रंप की परछाईं की तरह नजर आयेंगे और वह भी तब जब देश की 70 फीसदी जनता इस युद्ध के खिलाफ हो चली है और उसने तमाम रिकॉर्डों को तोड़ते हुए भारी बहुमत से जीती हुई ट्रंप सत्ता को ललकारते हुए कह दिया कि यहां पर डेमोक्रेसी है। यहां पर कोई राजा नहीं चलेगा। नो किंग्स। इस नो किंग्स का मतलब है कि युद्ध का फैसला एकतरफा लिया गया है। देखा जाए तो इतनी बड़ी तादाद में लोगों का एक साथ सड़कों पर उतरना केवल युद्ध भर को लेकर नहीं बल्कि युद्ध से पैदा हो रही परिस्थितियों में ट्रंप गवर्नेंस के द्वारा आवाम के लिए राहत भरे निर्णय ना ले पाने को लेकर भी है। देश के भीतर बढ़ रही मंहगाई, गैसोलीन की बढ़ती कीमतें, हड़ताल के कारण नाजुक हो चला एयर ट्रैवल और गवर्नेंस की उदासीनता भी जिम्मेदार है। और शायद इसीलिए कमोबेश हर क्षेत्र से जुड़ा हुआ तबका अमेरिका की सड़कों पर यह कहते हुए नजर आया कि डेमोक्रेटिक सैटअप में आप ऐसे निर्णय नहीं ले सकते। कांग्रेस भी यह कहने से चूके नहीं कि हमसे तो कोई संवाद ही नहीं किया गया और उसके बाद रिपब्लिकन सेनेटर्स भी यह कहते हुए सामने आ गए कि आखिर 2 बिलियन डॉलर जो पेंटागन को देना है उसके पीछे कितने हथियार खत्म हुए ? कितनी पूंजी खत्म हुई ? टैक्सपेयर का कितना पैसा इस युद्ध में झोंक दिया गया ?
ईरान ने सऊदी अरब स्थित अमेरिकी बेस पर हमला करके सैनिकों को घायल करने के साथ ही युध्दक विमान स्पाई एयरक्राफ्ट भी डैमेज कर दिए। जिसकी तस्वीरें रशिया के स्पूतनिक ने अपने तौर पर वीडियोग्राफी करके जारी कर दीं। जो यह मैसेज देने के लिए पर्याप्त है कि युद्ध भले ईरान से हो रहा है लेकिन स्ट्रेटेजिकली इकाॅनामिक आस्पेक्ट में चाइना और रशिया अमेरिका की उस इकाॅनामी को चुनौती देने के लिए तैयार हो चले हैं जिसके आसरे अमेरिका की ट्रेड डील चल रही है और वह पूरी दुनिया को अपने ईशारे पर नचा रहा है। अमेरिका और इजराइल युद्ध से पहले ईरान में तख्तापलट के लिए ईरानी जनता को भड़का रहे थे लेकिन युद्ध शुरू कर जब ईरान के सुप्रीम लीडर को परिजनों सहित मार डाला गया तो पूरा ईरान एकजुट होकर खड़ा हो गया वहीं युद्ध की विभीषिका को लेकर अमेरिका और इजराइल में अपनी ही सरकार का विरोध करने जनता सड़कों पर उतर कर सत्ता प्रमुख का इस्तीफा मांगने लगी। यानी युद्ध को लेकर एकजुटता ना तो अमेरिका के भीतर है ना ही इजराइल के भीतर है।
आगे बढ़ते हुए युद्ध बता रहा है कि भले ही ईरान और इजराइल आमने सामने हों लेकिन अंतरराष्ट्रीय या ग्लोबल इकाॅनामी के मद्देनजर लड़ाई तो अमेरिका के साथ चीन और रूस की चल रही है। खास तौर पर अमेरिका और चीन इस मैदान पर अपनी अपनी ताकत के साथ भविष्य की उस बिसात को बिछाना चाहते हैं जिसमें वो अपने अपने देश में यह मैसेज दे पायें कि कैसे ग्लोबल पावर बना जाता है। चीन अमेरिका की इकाॅनामी को ध्वस्त होते देखना चाहता और अमेरिका मानकर चल रहा है कि चाइना सब कुछ गवां देगा। लेकिन अगर चीन को कुछ प्राप्ति हो रही है तो फिर इस लड़ाई में बने रहना होगा। अमेरिका की अंदरूनी राजनीति और युद्ध को करीब से समझ कर राष्ट्रपति पद के संभावित और प्रबल दावेदार जेडी वेंस ने अपनी घटती लोकप्रियता के मद्देनजर अपना रास्ता अलग कर लिया है कि अगर मिड टर्म पोल में यह नजर आने लग जाए कि रिपब्लिकन पार्टी कहीं नहीं टिक रही है और भविष्य में होने वाले राष्ट्रपति के चुनाव में उनकी हार तय है तो उनके लिए परिस्थिति कितनी नाजुक हो जाएगी। जहां ट्रंप युद्ध के तैयार है वहीं जेडी वेंस कह रहे हैं कि हम जल्द ही युद्ध से बाहर निकल जायेंगे।
इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से हुई जेडी वेंस की बातचीत का हवाला छापते हुए अमेरिकन न्यूज पेपर ने छापा “आपके पास ना कोई ब्लूप्रिंट था ना कोई प्लान था। इस युद्ध को लेकर आपने जो टार्गेट तय किए थे वह भी आपके पास नहीं बचे हैं। जेडी वेंस को लगने लगा है कि अगर युद्ध जल्द खत्म नहीं हुआ तो वह अमेरिकी आवाम के बीच खलनायक के तौर पर देखे जायेंगे। युद्ध को विश्व युद्ध में तब्दील होने की चर्चाओं को एक तरह से खारिज करते हुए जेडी वेंस कह रहे हैं कि नहीं यह तो एक क्षेत्रीय संघर्ष है जो इजराइल और ईरान के बीच हो रहा है। लेकिन इस युद्ध में अमेरिका की एंट्री, चाइना और रशिया का इनपुट तो यही मैसेज दे रहा है कि दुनिया के बहुत सारे देश इसमें शामिल होते चले जा रहे हैं। शायद यही वजह है कि जब स्पूतनिक ने अमेरिका को सऊदी अरब में हुई क्षति की तस्वीरों के वीडियो जारी किये, कुवैत एयरपोर्ट की तस्वीरें वायरल की तो एक मैसेज तो यह निकल कर आया कि अब ट्रंप और वेंस का रुख अलग अलग दिशा में जा रहा है।
पेंटागन के जरिए यह जानकारी तो नहीं आई कि उसे क्या क्या नुकसान हुआ है, कितना नुकसान हुआ है लेकिन यह जानकारी जरूर आ गई है कि अमेरिकी जहाज USS त्रिपोली 3500 सैनिकों के साथ मिडिल ईस्ट पहुंचने वाला है। F35 फाइटर जेट भी तैनात हो चला है। तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर (जो पहले अब्राहम लिंकन और जेरार्ड आरफोर्ड उसके बाद जार्ज एच डब्लू बुश है) वह भी उसी दिशा में रवाना हो गया है। सवाल यह खड़ा हो रहा है कि क्या यह सब स्ट्रेटेजिकली किया जा रहा है क्योंकि दूसरी तरफ पाकिस्तान में मौजूद सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र के विदेश मंत्रियों की मौजूदगी में मध्यस्थता के संवाद को आगे बढ़ाया जा रहा है। सवाल है कि अगर ईरान और इजराइल का युद्ध रीजनल वार है तो फिर अमेरिका कर क्या रहा है ? अगर यह युद्ध वर्ल्ड वार में तब्दील नहीं हो रहा है तो फिर चीन और रूस का इनपुट क्यों हो रहा है ? अगर इस परिस्थिति में वर्ल्ड इकाॅनामी प्रभावित हो रही है और ग्लोबल इकाॅनामी के साथ जो नई परिस्थिति खास तौर से एशियाई देशों के सामने संकट की उभरने वाली है और उसका जवाब भी अमेरिका नहीं दे रहा है तो पहली बार उसका जवाब यही है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिकी उप राष्ट्रपति जेडी वेंस का रुख इस तरीके से चल रहा है जैसे रिपब्लिकन पार्टी के भीतर ही निर्णय लिए जा रहे हों और रिपब्लिकन पार्टी के भीतर ही विरोध हो रहा हो जिससे एक बैलेंस बना रहे या फिर यह टकराव की वह स्थिति है जिसमें अब रिपब्लिकन सेनेटर्स को नजर आने लगा है कि जेडी वेंस को मजबूत करना जरूरी है अन्यथा रिपब्लिकन पार्टी भविष्य की राजनीति के लिहाज से सब कुछ गवां बैठेगी।
वाशिंग्टन पोस्ट ने अज्ञात अधिकारियों के हवाले से बताया है कि कोई भी जमीनी कार्रवाई पूरे तरीके से आक्रमण नहीं होगी बल्कि विशेष कमांडो बल और सामान्य पैदल सैनिकों द्वारा छोटी-छोटी छापेमारी की जायेगी। विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कहा कि अमेरिका जमीनी सैनिकों के बिना भी अपने लक्ष्य को हासिल कर सकता है। द पोस्ट ने बताया कि योजना काफी आगे बढ़ चुकी है। द पोस्ट के अनुसार एक अधिकारी ने कहा यह कोई आखिरी मिनट की योजना नहीं है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट का कहना है कि कमांडर इन चीफ को अधिकतम विकल्प उपलब्ध कराने के लिए तैयारी करना पेंटागन का काम है। U. S. Central Command – U.S. sailors and marines aboard USS Tripoli (LHA7) arrived in the U.S. central command area of responsibility, March 27. The America-class amphibious assault ship serves as the flagship for the Tripoli Amphibious Ready Group/31st Marine Expenditionary Unit composed of about 3500 sailors and marines in addition to transport and strike fighter aircraft, as well as amphibious assault and tactical assets. पेंटागन के अफसरों के हवाले से वाशिंग्टन पोस्ट ने एक खौफनाक रिपोर्ट छापी है। खौफनाक इस लिहाज से कि अगर यह रिपोर्ट सच साबित हो गई तो दुनिया की सबसे ज्यादा तबाही वाली जंग होगी। ईरान और ईरान का सीमावर्ती इलाका पूरे अमरिकी सैनिकों के लिए कब्रिस्तान बन सकता है।
पुनश्च : अंबेडकर ने कहा था संविधान अच्छा या बुरा नहीं होता। संविधान किसके हाथ में है यह उस पर डिपेंड करता है। मुझे डर है चूंकि भारत व्यक्ति पूजक देश है और कोई ऐसा व्यक्ति सत्ता में आ जाए जो अपनी पूजा करवाने लग जाए तो फिर संविधान के मायने खत्म हो सकते हैं और तानाशाही पैदा हो सकती है। इसकी एक झलक श्रीमती इंदिरा गांधी में देखी गई थी और नरेन्द्र मोदी में देखी जा रही है। इसे सोनम वांगचुक प्रकरण से समझा जा सकता है। सोनम वांगचुक मोदी सरकार की कई योजनाओं के ब्रांड एम्बेसडर हुआ करते थे लेकिन जब उनने यह पूछ लिया कि वादे कब निभाओगे तो उन पर देशद्रोह का मुकदमा लगाकर जेल में डाल दिया गया। सरकार सुप्रीम कोर्ट में सोनम वांगचुक पर लगाए गए देशद्रोह का एक भी सबूत पेश नहीं कर पाई लिहाजा अपनी इज्जत बचाने के लिए देशद्रोह की धाराओं को हटा दिया गया। प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, संसद, स्ट्रीम मीडिया में से कौन है इसका जिम्मेदार या फिर सभी हैं जिम्मेदार। लद्दाख के साथ जब अन्याय होता है तो उसकी गूंज चैन्नई, हैदराबाद, कोलकाता आदि जगहों पर सुनाई नहीं देती आखिर क्यों ? क्योंकि समाज मृतप्राय हो चला है। समाज को मृतप्राय बनाने में सबसे बड़ा योगदान है स्ट्रीम मीडिया का। भारत में पत्रकार भारतीय प्रधानमंत्री से सवाल करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते जबकि अमेरिका में पत्रकार आंख में आंख डालकर अमेरिकी राष्ट्रपति से तीखे से तीखे सवाल पूछते हैं। इसे कहते हैं लोकतंत्र।
कहते हैं सृजन में ही विध्वंस के बीज समाये होते हैं यानी निर्माण में ही पतन समाहित होता है तो क्या अमेरिका के निर्माण (50 राज्यों का गुट) में ही उसके पतन का बीज छुपा हुआ है जिसे अंकुरित करने के लिए खाद पानी दे रहे हैं राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप – मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के पीछे मेक ट्रंप ग्रेट अगेन, मेक ट्रंप फैमिली ग्रेट अगेन का एजेंडा लागू करके ?
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार

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