खरी-अखरी : दीदी ओ दीदी vs रंगा-बिल्ला
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ये वो ट्यूट है जिसे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 15 मार्च 2026 को चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों की विधानसभा के चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के लिए बुलाई गई प्रेस कांफ्रेंस के टाइम से ठीक डेढ़ घंटा पहले जारी किया है। कहने को तो पश्चिम बंगाल के साथ ही तमिलनाडु, केरल, असम और केन्द्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में भी विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं लेकिन पश्चिम बंगाल का चुनाव एक तरीके से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जहन में नासूर की तरह टीस दे रहा है क्योंकि लाख कोशिशों के बावजूद वो पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार नहीं बनवा पाये खास तौर पर तब जब उनकी लोकप्रियता शिखर पर थी। अब तो नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता ढलान पर है और ऊपर से अमेरिका के साथ की गई टेरिफ डील, एप्स्टिन फाइल और अब अमेरिका-इजराइल का ईरान के साथ चले रहे युद्ध से देश के भीतर भी पैदा हो रहे विषम हालात भुतहा प्रभाव डाल रहे हैं। तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार नरेन्द्र मोदी बीजेपी के लिए कोई चमत्कार कर पायेंगे, जिसकी संभावना बिहार में चुनाव पूर्व कराये गये एसआईआर से मिली चुनावी जीत से पश्चिम बंगाल में भी एसआईआर के बाद कराये जा रहे चुनाव से बलवती दिख रही है या ममता बनर्जी सारे झंझावतों को पार करते हुए अपनी सत्ता को बरकरार रखने में सफल होंगी।
वर्तमान राजनीति में यह माना जाता है कि नरेन्द्र मोदी का मुकाबला उन्हीं की शैली में अगर कोई कर सकता है तो वह हैं ममता बनर्जी। ममता बनर्जी भली भांति समझने लगी हैं बीजेपी, नरेन्द्र मोदी और चुनाव आयोग को। इसीलिए वह यदा-कदा इनसे छुपा-छुपाई का खेला खेलती रहती हैं। 14 मार्च को कोलकाता में नरेन्द्र मोदी की परिवर्तन रैली की समापन के ठीक दूसरे दिन यानी 15 मार्च को पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के कार्यक्रम घोषित करने के लिए प्रेस कांफ्रेंस बुलाई थी। यह मानते हुए कि अब ममता बनर्जी के पास जनता को कुछ नया देने के लिए कोई समय नहीं है ऐसा कुछ करने के लिए जैसा चुनाव की घोषणा से ठीक पहले बीजेपी करती है। यह अलग बात है कि बिहार में तो चुनाव के दौरान भी बीजेपी आर्दश आचार संहिता को रौंदती रही है और चुनाव आयोग धृतराष्ट्र बना बैठा रहा। मगर ममता बनर्जी ने तुम डाल-डाल तो हम पात-पात की तर्ज पर ज्ञानेश कुमार की प्रेस कांफ्रेंस से ठीक डेढ़ घंटा पहले अपने ट्यूटर पर जानकारी साझा करती हैं कि पश्चिम बंगाल में पुजारियों और मुअज्ज़िनों यानी मौलवियों (जो मस्जिदों में नमाज पढ़ाते हैं) के मानदेय में 500 रुपये मासिक की वृद्धि करते हुए 2000 रुपये मासिक कर दिया गया है। जो इस बात को बताता है कि ममता बनर्जी अच्छे तरह से जानती हैं कि चुनाव आयोग, नरेन्द्र मोदी और उनकी पूरी मशीनरी कैसे काम करती है। तभी ना कोलकाता के ब्रिगेड मैदान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आम सभा के दूसरे दिन चुनाव आयुक्त द्वारा चुनाव का शेड्यूल जारी किया जाता है।
कोलकाता के ब्रिगेड मैदान को भरना राजनीतिक चुनौती से कम नहीं है। आज तक इसे केवल दो ही राजनीतिक दल पैक कर सके हैं कम्युनिस्ट पार्टी और तृणमूल कांग्रेस। परिवर्तन रैली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी के बाद भी मैदान का लगभग चालीस फीसदी हिस्सा खाली रह जाना बताता है कि पश्चिम बंगाल नरेन्द्र मोदी के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। या कहें कि पश्चिम बंगाल की फतह पीएम नरेन्द्र मोदी के लिए जियो या मरो का सबब बन गया है। बीजेपी ने जितनी भी रैलियां की हैं उनमें ज्यादातर हिंदी भाषी थे ना कि बांग्ला भाषी। ममता बनर्जी माॅं – माटी – मानुष की राजनीति करती हैं लेकिन उन्होंने अपने साथ कीर्ति आजाद और शत्रुध्न सिन्हा को जोड़ कर एक ऐसा काॅम्बिनेशन तैयार कर लिया है जिसकी कोई काट फिलहाल बीजेपी के पास चुनाव तक तो दिखाई नहीं दे रही है। पश्चिम बंगाल में बीजेपी लीडरलेस भी है यानी उसके पिटारे में एक भी ऐसा नेता, एक भी ऐसा चेहरा नहीं है जो ममता बनर्जी के सामने खड़ा होने लायक हो। उसके पास जो भी नेता हैं उनमें से अधिकतर तृणमूल कांग्रेस से आयातित नेता हैं जो खुद अपनी औकात को जानते पहचानते हैं और बीजेपी भी उनकी असलियत को जानती पहचानती है। कहने का मतलब पश्चिम बंगाल का चुनाव नरेन्द्र मोदी के लिए परीक्षा की घड़ी है। अगर वह पश्चिम बंगाल में बीजेपी के लिए करिश्माई साबित होते हैं तो सारा श्रेय उनकी झोली में ही जायेगा और नहीं हो पाये तो ठीकरा फोड़ने के लिए नया नवेला अध्यक्ष तो है ही।
वैसे देखा जाए तो ममता के निशाने पर बीजेपी से ज्यादा नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की गुजराती जोड़ी रहती है। जिसकी उन्होंने रंगा-बिल्ला के साथ महाभारत के कुछ पात्रों से भी तुलना करने से परहेज नहीं किया है। फिलहाल जिस तरीके से काम करते हुए ममता बनर्जी अपनी चालें चल रही हैं उससे बहुत कुछ संकेत भी मिलते हैं जैसे मोदी के पास ममता के मुकाबले पश्चिम बंगाल की जमीन पर खड़े होने की सलाहियत नहीं है। उनका धरातल बहुत कमजोर है। उनकी तैयारी, उनकी राजनीति बहुत कमजोर है। बीजेपी को कभी भी जमीन पर उतर कर लड़ने वाली पार्टी के तौर पर नहीं माना जाता और पश्चिम बंगाल में उसकी यह कमी खुलकर दिखाई देती है। बीजेपी जब तक कोई प्रेस कांफ्रेंस करने की तैयारी करती है या सड़क पर उतरने की तैयारी करती है या फिर कोई बयान देने की तैयारी करती है तब तक ममता पैदल मार्च शुरू कर चुकी होती है। उसके पीछे सैकड़ों लोगों की भीड़ चलने लगती है। इसी कमजोर कड़ी में नरेन्द्र मोदी फंसे हुए नजर आते हैं। पश्चिम बंगाल जीतना ना केवल नरेन्द्र मोदी के लिए राजनीतिक जीवन मरण का सवाल बन गया है बल्कि यह उतना ही या कहें उससे ज्यादा ममता बनर्जी के लिए भी है और वह भी तब जब एम्पायर खुद एक टीम के साथ बतौर खिलाड़ी खेलते हुए दिखाई दे रहा हो ! जिसका नजारा मध्यप्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार और दूसरे राज्यों के चुनाव में दिखाई दिया है।
जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं उनमें कराये गये स्पेशल इंसेंटिव रिवीजन(एसआईआर) में सबसे ज्यादा नाम तमिलनाडु में काटे गए हैं। उसके बाद पश्चिम बंगाल और केरल में डिलीट हुए हैं। पश्चिम बंगाल में कराये गये एसआईआर का मामला तो सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा था जहां देश के इतिहास में पहली बार किसी राज्य की सिटिंग मुख्यमंत्री ने खुद उपस्थित होकर एक वकील की तरह पैरवी की थी। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस की सीधी फाइट बीजेपी से है। 2021 के विधानसभा चुनाव में जहां तृणमूल कांग्रेस ने कुल 294 सीटों में से 48 फीसदी वोट के साथ 213 सीटें जीती थी वहीं बीजेपी ने भले ही 77 सीटें जीती थी लेकिन उसका वोटिंग पर्सेंटेज 38.1 रहा है जो ममता बनर्जी के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है। यहां पर लम्बे समय तक शासन कर चुकी कांग्रेस पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी इतिहास बन चुकी हैं।
तमिलनाडु की पूरी राजनीति डीएमके (करुणानिधि) और एआईडीएमके (जयललिता) के बीच ही चलती रही है। अक्सर यहां पर हर पांच साल में राजनीतिक सत्ता की रोटी को पलटते हुए देखा गया है। करुणानिधि और जयललिता की मौत के बाद अब राजनीतिक कमान उनके उत्तराधिकारियों के हाथ में है लेकिन काफी उठापटकीय विवादों के बाद। अब जनता उन्हें किस तरीके से देखती है 4 मई को ही पता चलेगा जब चुनाव परिणाम सामने आयेगा। 2021 में यहां पर द्रविड़ मुनेत्र कणगम ने कुल 234 सीटों में से 169 सीट तथा आल इंडिया द्रविड़ मुनेत्र कणगम ने 75 सीट जीती थी। दक्षिणी राज्य केरल में एलडीएफ और यूडीएफ-कांग्रेस के बीच राजनीतिक तराजू का पलड़ा ऊपर नीचे होता रहता है। वर्तमान में यहां की 140 सीटों में से 99 सीटों के साथ एलडीएफ सत्ता पर काबिज है जबकि यूडीएफ-कांग्रेस 41 सीटों के साथ विपक्ष में है। असम में फिलहाल पंजा छाप कमल पार्टी के नेता सीएम की कुर्सी पर विराजमान हैं। यहां पर कुल 140 सीटें हैं। इसी तरह केन्द्र शासित प्रदेश पुडुचेरी (दक्षिणी राज्य) में कुल 30 सीटें हैं। जिसमें सत्ता पर काबिज होने का जादुई आंकड़ा स्वीट सिक्सटीन (16) है।
पश्चिम बंगाल में दो चरणों में यानी 23 और 29 अप्रैल को वोटिंग होनी है वहीं तमिलनाडु और केरल, असम, पुडुचेरी में एक ही चरण में 23 अप्रैल और 9 अप्रैल को मतदान होगा। नतीजे 4 मई को जारी किए जायेंगे। कहने को तो चुनाव कार्यक्रम की घोषणा होते ही इन पांचों राज्यों में आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है लेकिन देखना होगा कि यहां पर भी बिहार की तरह एक पार्टी विशेष के लिए धृतराष्ट्र की भूमिका निभाने वाले चुनाव आयोग और उसके कर्ता-धर्ता की छत्रछाया में पार्टी विशेष आदर्श आचार संहिता का चीरहरण करती है या नहीं। वैसे भी स्पेशल इंसेंटिव रिवीजन (एसआईआर) के बाद से गैर भाजपाई पार्टियों की सांसें उखड़ी हुई हैं बावजूद इसके कि पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, में बीजेपी सत्ता में नहीं है लेकिन सत्ता में आने के लिए सब कुछ दांव पर लगाने के लिए बेचैन है।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार




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