‘ब्रांड मोदी’ की चमक पर महंगाई और बेरोजगारी की खरोंच? अब सवाल नारों से आगे, नौकरी और रसोई के हैं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक पकड़ को लेकर तस्वीर अभी भी एकतरफा नहीं है, लेकिन 2026 के कुछ आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि सरकार के सामने अब सिर्फ विपक्ष की चुनौती नहीं, बल्कि जनता की रोजमर्रा की परेशानियों का हिसाब भी बड़ा मुद्दा बन रहा है। अगस्त 2026 के इंडिया टुडे-CVoter Mood of the Nation सर्वे में मोदी 48.7% समर्थन के साथ अगले प्रधानमंत्री के लिए सबसे पसंदीदा चेहरा रहे, लेकिन जनवरी के 54.7% के मुकाबले उनका आंकड़ा करीब छह प्रतिशत अंक नीचे आया।
यानी ‘ब्रांड मोदी’ खत्म होने जैसी तस्वीर तो नहीं है, लेकिन चमक पर सवाल उठाने वाली वजहें जरूर बढ़ी हैं। खास बात यह है कि इन सवालों का केंद्र अब बड़े राजनीतिक नारों से ज्यादा नौकरी, महंगाई, परीक्षा व्यवस्था और आमदनी जैसे मुद्दे बनते दिखाई दे रहे हैं।
नौकरी का सवाल… आंकड़ों से ज्यादा युवाओं की बेचैनी
सरकार रोजगार योजनाओं और आर्थिक विकास के आंकड़े सामने रख सकती है, लेकिन युवा मतदाता का सवाल सीधा है—नौकरी मिलेगी कब और कितनी आमदनी वाली?
MOTN के Gen Z सर्वे में 53% युवाओं ने रोजगार और नौकरी को सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बताया। 32% ने पर्याप्त नौकरियों की कमी को युवाओं की सबसे बड़ी रोजगार समस्या माना, जबकि 18% ने कम वेतन और 17% ने योग्यता के अनुरूप नौकरी न मिलने की बात कही।
यहां सरकार के सामने चुनौती साफ है। रोजगार के आंकड़े सुधरने की बात अपनी जगह है, लेकिन अगर पढ़ा-लिखा युवा परीक्षा देता रहे, भर्ती का इंतजार करता रहे और नौकरी मिलने के बाद भी वेतन व सुरक्षा को लेकर संतुष्ट न हो, तो सरकारी आंकड़ा उसके अनुभव को पूरी तरह नहीं बदल सकता।
महंगाई की मार… और सियासत का हिसाब
MOTN सर्वे में महंगाई भी सरकार के लिए बड़ा सवाल बनकर सामने आई। सर्वे में 23% लोगों ने बेरोजगारी और 15.9% ने महंगाई/कीमतों में बढ़ोतरी को NDA सरकार की बड़ी विफलताओं में गिना। वहीं महंगाई को देश की प्रमुख समस्याओं में बताने वालों का हिस्सा जनवरी के 12.8% से बढ़कर अगस्त में 18.1% हो गया।
यही वह मोर्चा है जहां ‘अर्थव्यवस्था मजबूत है’ वाला संदेश घर के बजट से टकराता है। GDP की रफ्तार आम आदमी के लिए तभी मायने रखती है जब कमाई बढ़े और रसोई का खर्च काबू में रहे।
Gen Z को सिर्फ रील से नहीं, रिजल्ट से मतलब
युवा मतदाताओं को सोशल मीडिया पर साधने की कोशिशें राजनीतिक दलों की रणनीति का हिस्सा बन चुकी हैं। लेकिन सर्वे का संदेश इससे कहीं ज्यादा गहरा है। Gen Z में सिर्फ 43.9% ने मोदी को अगले प्रधानमंत्री के लिए सबसे उपयुक्त माना, जबकि सभी आयु वर्गों में यह आंकड़ा 48.7% था।
यानी Instagram, वीडियो और डिजिटल संवाद अपनी जगह हैं, लेकिन युवा वर्ग का मूल सवाल रोजगार, परीक्षा की निष्पक्षता और भविष्य की सुरक्षा है। जब 53% युवा रोजगार को सबसे बड़ा मुद्दा बता रहे हों, तब केवल संचार रणनीति से उनकी बेचैनी खत्म होने की गारंटी नहीं है।
2024 का झटका भी याद रखने लायक
2024 लोकसभा चुनाव ने भी यह संकेत दिया था कि मोदी की लोकप्रियता को BJP की सीटों के साथ हमेशा एक ही पैमाने पर नहीं मापा जा सकता। BJP 2019 की 303 सीटों से घटकर 2024 में 240 सीटों पर आ गई और NDA के सहयोगियों के साथ सरकार बनी।
इसके बाद कई विधानसभा चुनावों में BJP ने वापसी की, इसलिए कहानी को सिर्फ गिरावट की सीधी रेखा मानना भी सही नहीं होगा। लेकिन अगस्त 2026 के सर्वे में मोदी के समर्थन में कमी जरूर दर्ज हुई। दूसरी तरफ राहुल गांधी का आंकड़ा जनवरी के 26.6% से अगस्त में 27.1% हुआ—यानी मोदी के घटे समर्थन का पूरा फायदा विपक्ष के किसी एक चेहरे को नहीं मिला।
असली मुश्किल यही—नाराजगी है, लेकिन विपक्ष को सीधा फायदा नहीं
यही राजनीतिक तस्वीर का सबसे पेचीदा हिस्सा है। सरकार से सवाल बढ़ सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह जरूरी नहीं कि मतदाता तुरंत किसी एक विपक्षी विकल्प के पीछे चला जाए।
इसलिए BJP के लिए चुनौती केवल विरोधियों से मुकाबला नहीं, बल्कि उस मतदाता को संतुष्ट करना भी है जो सरकार से पूरी तरह नाराज नहीं है, लेकिन नौकरी, महंगाई और आर्थिक सुरक्षा को लेकर जवाब चाहता है।
‘ब्रांड मोदी’ के सामने अब नया टेस्ट
12 साल की सत्ता के बाद सरकार के सामने स्वाभाविक रूप से उपलब्धियों के साथ-साथ जवाबदेही का सवाल भी बढ़ता है। अब सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं कि देश कितना आगे बढ़ा; जनता का एक हिस्सा यह भी पूछ रहा है कि उसकी अपनी जिंदगी कितनी आसान हुई।
इसलिए 2026 की तस्वीर को न तो ‘मोदी का जादू खत्म’ कहना आंकड़ों के अनुरूप होगा और न ही यह मान लेना कि रोजगार-महंगाई जैसे सवाल राजनीतिक रूप से मामूली हैं। सर्वे एक साथ दोनों बातें दिखाता है—मोदी की लोकप्रियता अभी भी मजबूत है, लेकिन उस लोकप्रियता पर आर्थिक और युवा असंतोष के सवाल जरूर दस्तक दे रहे हैं।
आखिरकार ‘ब्रांड’ विज्ञापन से बन सकता है, लेकिन लंबे समय तक उसकी विश्वसनीयता का असली इम्तिहान नौकरी, कमाई और घर की रसोई ही लेती है।



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