नाग पंचमी : प्रकृति के प्रति सम्मान और सह-अस्तित्व का पर्व
— सुनील कुमार महला
भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण पर्व है—नाग पंचमी। इस वर्ष यानी वर्ष 2026 में नाग पंचमी का पावन पर्व 17 अगस्त (सोमवार) को मनाया जाएगा। जानकारों के अनुसार सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि 16 अगस्त को दोपहर 4:52 बजे से शुरू होकर 17 अगस्त को शाम 5:00 बजे समाप्त होगी और उदया तिथि के कारण यह त्योहार 17 अगस्त को ही मनाया जाएगा।

इस दिन नाग की पूजा की जाती है। दरअसल, नागों (सर्पों) को प्रकृति, शक्ति, सुरक्षा, उर्वरता और पर्यावरणीय संतुलन के प्रतीक माना गया है। इस पर्व का धार्मिक महत्व भी है। भगवान शिव ने अपने गले में नाग धारण कर रखा है। उनके गले में नाग का विराजमान होना प्रकृति और समस्त जीव-जगत के साथ उनके सामंजस्य का प्रतीक माना जाता है। भगवान विष्णु की शेषनाग पर शयन मुद्रा भी नागों के धार्मिक महत्व को दर्शाती है।
इस दिन नाग देवता की पूजा कर परिवार की सुख-समृद्धि, सुरक्षा और कल्याण की कामना की जाती है। जीव-जंतुओं का भारतीय संस्कृति में हमेशा से महत्वपूर्ण और अहम स्थान रहा है। जीव-दया, जीवों के प्रति करुणा और सह-अस्तित्व की भावना हमारे देश की संस्कृति रही है।
नाग या सर्प खेतों में चूहों जैसे कृंतकों की संख्या नियंत्रित करके फसलों की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इसलिए सर्पों को किसान का मित्र कहा जाता है। कहना गलत नहीं होगा कि सर्प विभिन्न जीवों की आबादी को नियंत्रित करके खाद्य-श्रृंखला (फूड चेन) को संतुलित रखते हैं।
पारिस्थितिकी तंत्र और जैव-विविधता को बनाए रखने में सर्पों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। हालांकि, यह बात अलग है कि सर्प स्वयं भी बाज, उल्लू, नेवला, मोर और अन्य जीवों के भोजन का हिस्सा हैं। इसलिए उनका अस्तित्व खाद्य-जाल की अनेक कड़ियों को प्रभावित करता है।
प्रकृति का अपना एक सिस्टम है और इस सिस्टम में हर छोटे से छोटे और बड़े से बड़े जीव की अपनी भूमिका व महत्व है। सर्प भी उनमें से एक हैं। लेकिन आज सर्पों को मार दिया जाता है और प्रकृति चक्र को डिस्टर्ब कर दिया जाता है। यह ठीक नहीं है।
सरल शब्दों में कहें तो सर्पों से भय के कारण उन्हें मार देना पर्यावरणीय दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। यदि हम सर्पों को मारेंगे तो धरती पर चूहों और कृंतकों की संख्या बढ़ सकती है तथा फसलों पर दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि चूहे और अन्य कृंतक बीज, अनाज और पौधों को अधिक नुकसान पहुंचा सकते हैं।
सर्प नहीं होंगे तो इससे हमारी खाद्य-श्रृंखला प्रभावित हो जाएगी, क्योंकि सर्प मोर, नेवला और अन्य शिकारी पक्षियों का भोजन हैं, जो पर्यावरण और प्रकृति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
सर्प नहीं होंगे तो हमें चूहों व अन्य कृंतकों से फसलों को बचाने के लिए रासायनिक उर्वरकों, पेस्टीसाइड्स और दवाओं का इस्तेमाल करना पड़ सकता है, जिससे रासायनिक उपायों पर निर्भरता बढ़ सकती है। इसलिए इनका संरक्षण करना बहुत आवश्यक है।
आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर वर्ष अनुमानतः 58 हजार लोगों की मृत्यु सर्पदंश से होती है, जिससे भारत विश्व में सर्पदंश से होने वाली मौतों से सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल है। हालांकि, उपचार एवं मृत्यु के मामलों की कम रिपोर्टिंग के कारण वास्तविक आंकड़ा अलग हो सकता है।
इसके बावजूद हमें यह याद रखना चाहिए कि सर्प प्रकृति के महत्वपूर्ण प्रहरी हैं। जैसा कि ऊपर इस आलेख में चर्चा कर चुका हूं, वे चूहों और अन्य कृंतकों की संख्या नियंत्रित कर खेतों तथा खाद्यान्न की रक्षा करने में सहायता करते हैं और खाद्य-श्रृंखला को संतुलित बनाए रखते हैं।
सर्प स्वयं भी अनेक पक्षियों और वन्यजीवों के भोजन का हिस्सा हैं। इसलिए उनका संरक्षण जैव-विविधता और पारिस्थितिक संतुलन के लिए आवश्यक है।
सर्पों के प्रति भय नहीं, बल्कि सावधानी और सह-अस्तित्व की भावना विकसित करना प्रकृति संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। नाग पंचमी का पर्व हमें नाग जैसे महत्वपूर्ण जीव के संरक्षण का संदेश देता है।
संक्षेप में कहें तो आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण और करुणा को जोड़ना ही नाग पंचमी का वास्तविक और असली संदेश है।
सुनील कुमार महला
फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार




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