दिल्ली से सिलीगुड़ी महज 6 घंटे में! बंगाल को पहली बुलेट ट्रेन का तोहफा, उत्तर भारत से पूर्वोत्तर तक हाई-स्पीड कनेक्टिविटी
कोलकाता। केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी को नई गति देने की दिशा में एक महत्वाकांक्षी कदम उठाते हुए दिल्ली-सिलीगुड़ी बुलेट ट्रेन कॉरिडोर की घोषणा की है। केंद्रीय रेल मंत्री Ashwini Vaishnaw ने शनिवार को इस हाई-स्पीड रेल परियोजना का ऐलान करते हुए कहा कि यह पश्चिम बंगाल की पहली बुलेट ट्रेन होगी, जो राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को उत्तर बंगाल के प्रमुख शहर सिलीगुड़ी से जोड़ेगी। परियोजना पूरी होने के बाद करीब 1,500 किलोमीटर की दूरी महज छह घंटे में तय की जा सकेगी।
नबन्ना में राज्य सरकार और रेलवे अधिकारियों के साथ हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद रेल मंत्री ने बताया कि यह देश का दूसरा प्रमुख बुलेट ट्रेन कॉरिडोर होगा। इससे पहले देश में Mumbai-Ahmedabad High-Speed Rail Corridor पर कार्य चल रहा है। नई परियोजना उत्तर भारत, पूर्वी भारत और पूर्वोत्तर क्षेत्र के बीच यात्रा को तेज, सुरक्षित और आधुनिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।
प्रस्तावित कॉरिडोर दिल्ली से शुरू होकर नोएडा के जेवर एयरपोर्ट, मथुरा, आगरा, इटावा, लखनऊ, प्रयागराज, वाराणसी, गाजीपुर, पटना और सिलीगुड़ी के निकट न्यू जलपाईगुड़ी तक पहुंचेगा। भविष्य में इस हाई-स्पीड नेटवर्क को पूर्वोत्तर के प्रमुख शहर Guwahati तक विस्तारित करने की संभावना भी जताई गई है।
रेल मंत्रालय के अनुसार परियोजना को दो चरणों में विकसित किया जाएगा। पहला चरण दिल्ली से वाराणसी तक हाई-स्पीड रेल नेटवर्क का होगा, जबकि दूसरा चरण वाराणसी से पटना होते हुए सिलीगुड़ी तक विस्तारित किया जाएगा। प्रारंभिक योजना के अनुसार परियोजना पर निर्माण कार्य वर्ष 2028 के आसपास शुरू होने की संभावना है। इसके लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट, भूमि अधिग्रहण और तकनीकी सर्वेक्षण की प्रक्रियाएं चरणबद्ध तरीके से पूरी की जाएंगी।
बुलेट ट्रेन के संचालन से दिल्ली और सिलीगुड़ी के बीच यात्रा समय में भारी कमी आएगी। वर्तमान में राजधानी और दुरंतो जैसी तेज ट्रेनों से यह यात्रा लगभग 18 से 20 घंटे में पूरी होती है। हाई-स्पीड रेल सेवा शुरू होने के बाद यही दूरी करीब छह घंटे में तय की जा सकेगी। ट्रेन की संभावित गति 250 से 300 किलोमीटर प्रति घंटा रहने का अनुमान है। इसके अलावा दिल्ली से वाराणसी का सफर लगभग साढ़े तीन घंटे और वाराणसी से सिलीगुड़ी की दूरी तीन घंटे से भी कम समय में पूरी की जा सकेगी।
रेल मंत्रालय का मानना है कि यह परियोजना केवल यात्री परिवहन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि व्यापार, पर्यटन और क्षेत्रीय आर्थिक विकास को भी नई दिशा देगी। सिलीगुड़ी को पूर्वोत्तर भारत का प्रवेश द्वार माना जाता है और यह रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इस कॉरिडोर के माध्यम से उत्तर भारत और पूर्वोत्तर राज्यों के बीच आवागमन और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को भी मजबूती मिलेगी।
परियोजना के लिए एक लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश की संभावना जताई गई है। रेल मंत्री ने कहा कि पश्चिम बंगाल में रेलवे और मेट्रो परियोजनाओं पर बड़े पैमाने पर निवेश किया जा रहा है, जिससे राज्य के परिवहन ढांचे को आधुनिक बनाया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि कई लंबित रेल परियोजनाओं को गति देने के लिए केंद्र और राज्य के बीच समन्वय बढ़ाया जा रहा है।
हालांकि इस महत्वाकांक्षी परियोजना के सामने कई तकनीकी और प्रशासनिक चुनौतियां भी हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के घनी आबादी वाले क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है। इसके अलावा सिलीगुड़ी का संवेदनशील ‘चिकन नेक’ क्षेत्र, जो पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है, इंजीनियरिंग और सुरक्षा के लिहाज से विशेष महत्व रखता है।
विशेषज्ञों के अनुसार भारी वर्षा, नाजुक भौगोलिक परिस्थितियां और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के निकट ट्रैक निर्माण जैसी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए परियोजना की योजना तैयार करनी होगी। इसके बावजूद रेलवे को विश्वास है कि आधुनिक तकनीक और विस्तृत सर्वेक्षण के माध्यम से इन बाधाओं का समाधान किया जा सकेगा।
यदि यह परियोजना तय समयसीमा के भीतर पूरी होती है तो यह भारत के हाई-स्पीड रेल नेटवर्क के विस्तार में एक ऐतिहासिक उपलब्धि साबित होगी। साथ ही उत्तर भारत, पूर्वी भारत और पूर्वोत्तर क्षेत्र के बीच आर्थिक, सामाजिक और पर्यटन गतिविधियों को नई गति मिलेगी, जिससे क्षेत्रीय विकास को भी महत्वपूर्ण बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।




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