महंगाई का झटका: जून में थोक महंगाई 44 महीने के उच्च स्तर पर, खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़े
नई दिल्ली। आम आदमी की जेब पर महंगाई का दबाव बढ़ता जा रहा है। जून 2026 में थोक महंगाई दर (WPI) बढ़कर 9.87% पहुंच गई है, जो पिछले 44 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। इससे पहले सितंबर 2022 में थोक महंगाई 10.70% दर्ज की गई थी। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने मंगलवार को जून के थोक महंगाई के आंकड़े जारी किए।
महंगाई बढ़ने की मुख्य वजह रोजमर्रा की जरूरतों के सामान और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी रही। इससे पहले जारी खुदरा महंगाई (CPI) के आंकड़ों में भी लगातार छठे महीने वृद्धि दर्ज की गई थी। जून में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.38% पर पहुंच गई।
खाने-पीने की चीजों की महंगाई बढ़ी
जून में प्राथमिक वस्तुओं (Primary Articles) की थोक महंगाई दर बढ़कर 7% हो गई, जो मई में 4.99% थी। वहीं खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर भी 4.49% से बढ़कर 6.14% पर पहुंच गई।
आलू, अदरक और अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी का असर खुदरा महंगाई पर भी दिखाई दिया। विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी तनाव और कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव आने वाले समय में महंगाई को प्रभावित कर सकते हैं।
फ्यूल और पावर में मामूली राहत
ईंधन और बिजली (Fuel & Power) की थोक महंगाई दर जून में घटकर 27.41% रही, जबकि मई में यह 30.33% थी। वहीं मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के उत्पादों की महंगाई दर में कोई बदलाव नहीं हुआ और यह 7.48% पर बनी रही।
WPI में इन चीजों का होता है सबसे ज्यादा योगदान
थोक मूल्य सूचकांक (WPI) में तीन प्रमुख श्रेणियां शामिल होती हैं:
- मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स: 64.23% हिस्सेदारी
- प्राइमरी आर्टिकल्स: 22.62% हिस्सेदारी
- फ्यूल और पावर: 13.15% हिस्सेदारी
प्राइमरी आर्टिकल्स में खाद्य पदार्थ, गैर-खाद्य वस्तुएं, खनिज और कच्चा तेल शामिल होते हैं।
लंबे समय तक महंगाई बढ़ी तो उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है असर
थोक महंगाई लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर रहने से उत्पादन लागत बढ़ सकती है। कंपनियां अक्सर बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों तक पहुंचाती हैं, जिससे बाजार में सामान महंगा हो सकता है।
सरकार महंगाई को नियंत्रित करने के लिए टैक्स में बदलाव, खासकर ईंधन पर शुल्क में कटौती जैसे कदम उठा सकती है, लेकिन इसकी भी एक सीमा होती है।
खुदरा महंगाई में भी लगातार छठी बढ़ोतरी
खुदरा महंगाई जनवरी 2026 में 2.74% थी, जो जून तक बढ़कर 4.38% हो गई। मई में यह 3.93% रही थी। लगातार छह महीनों से इसमें बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।
कैसे मापी जाती है महंगाई?
भारत में महंगाई को मुख्य रूप से दो तरीकों से मापा जाता है:
खुदरा महंगाई (CPI): यह उन कीमतों पर आधारित होती है, जो आम ग्राहक बाजार में चुकाता है। इसमें खाने-पीने की चीजों, घर, ईंधन और अन्य सेवाओं को शामिल किया जाता है।
थोक महंगाई (WPI): इसमें थोक बाजार में कारोबारियों के बीच होने वाली कीमतों में बदलाव को मापा जाता है। इसमें फैक्ट्री उत्पादों, ईंधन और प्राथमिक वस्तुओं को अधिक महत्व दिया जाता है।
जून के आंकड़े संकेत देते हैं कि महंगाई का दबाव अभी पूरी तरह कम नहीं हुआ है और आने वाले महीनों में खाद्य वस्तुओं व वैश्विक बाजार की कीमतों पर नजर बनी रहेगी।



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