खरी-अखरी : जैसे सारे बेरोजगार तिलचट्टे हैं आजाद भारत में ठीक वैसे ही आजादी के दीवाने तिलचट्टे थे गुलाम भारत में
Chief Justice of India Surya Kant on Saturday issued a clarification over his oral remarks made during a court hearing yesterday saying that a section of the media had miss quoted him and wrongly portrait his comments as a criticism of the youth of the country. In a statement issued after the remarks triggered controversy online CJI sad observations but doctorated only against a person’s how had entered profession such as the legal field using fake and bogus degrees and not against young people in general. I am pained to read how a section of the media has miss quoted my oral observations made during the hearing of a privilege case yesterday. What I had specifically criticised but those how have entered the professions like the Bar legal profession with the end of fake and bogus degrees. Similar persons have sneaked in the media, social media and other noble profession am well and hans they are like parasites. It is totally baseless to suggest that I criticise the youth of our nation. Not only I am proud of our present and future human resources but every youth of India inspires me. It is not an excusations to say that Indian youth have great regards and respect for me. And I to see them as pillars of a developed India. There are youngsters like Cockroaches. How don’t get any ample employment and don’t have an place in the profession. Sume of them become media, Sume of them become social media, Sume of them become RTI activist, Sume of them become other activist and they start attacking everyone.
शायद ही किसी ने कल्पना की होगी की न्याय की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठा हुआ व्यक्ति सड़क छाप फूहड़ता भरी टिप्पणियां कर सकता है। मगर यह सच है। और जब देश के चारों खूंट आलोचनाओं की बौछार होने लगी तो स्पष्टीकरण जारी कर जेन-जी से पीछा छुड़ाने के लिए अपनी ही बिरादरी के एक तबके वकीलों को लपेट दिया कि उनकी टिप्पणी तो लीगल प्रोफेशन में आने वाले फेक और बोगस डिग्रीधारियों के लिए थी। दुर्भाग्य है लीगल प्रोफेशनल्स का कि उनका सबसे बड़ा पदाधिकारी सत्ता की गोद में बैठकर राज्यसभा का मेम्बर बना बैठा है अन्यथा अभी तक बार कौंसिल आफ इंडिया ने भी चीफ जस्टिस आफ इंडिया सूर्य कांत से इस्तीफा मांग लिया होता। अगर लीगल प्रोफेशन में फर्जी डिग्रीधारी आ सकते हैं तो क्या ज्यूडशरी में फर्जी डिग्री की बदौलत जज नहीं बन सकते हैं ? अच्छा होता अपना मुंह खोलने के पहले मी लार्ड अपने गिरेबां में झांक लिए होते। उनका खुद का न्यायिक सफर और चरित्र बहुत धवल नहीं है।
30 जनवरी 2019 को अतुल दवे का एक लेख जस्टिस सूर्य कांत के न्यायिक सफर को लेकर कैरवान पत्रिका पर छपा था। जिसका मजलूम यही था कि जस्टिस सूर्य कांत पर भृष्टाचार के गंभीरतम आरोप लगाये गये थे। जिसकी शिकायतों के दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट के भीतर दबे पड़े हुए हैं। उन पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। यही कारण है कि आज सूर्य कांत देश की सबसे बड़ी अदालत की सबसे ऊंची कुर्सी पर विराजमान हैं। 2012 में एक रियल ऐस्टट एजेंट ने जस्टिस सूर्य कांत पर करोड़ों रुपये के ट्रांजेक्शन में घोटाला करने के सबूतों सहित शिकायत सुप्रीम कोर्ट में की थी। इसी तरह से 2017 में एक प्रिजनर ने कंम्पलैंट फाइल करते हुए कहा था कि आठ केसों की हियरिंग सूर्य कांत इसलिए कर रहे थे क्योंकि उसमें अच्छी खासी घूस की रकम उन्हें मिली हुई थी। तत्कालीन जस्टिस गोयल के बेटे आशीष गोयल ने ट्यूट किया है कि The prestige of high office and an ensemble ego means judges Wil foot them celeb’s above constitution and people. What’s imported is how to select the judges or consider them for high offices. If then CJI paid heat to this objection by a former Supreme Court Judge, writing was on the wall.
वकील बिरादरी में सीजेआई सूर्य कांत द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण को लेकर कहा जा रहा है कि उनके द्वारा स्पष्टीकरण तब जारी क्यों नहीं किए गए जब उन्होंने 27 लाख लोगों को मताधिकार से वंचित करते हुए यह कह दिया था कि अगली बार वोट डाल लीजियेगा, एसआईआर पर सुनवाई कर तो रहा हूं लेकिन उसे बिहार और फिर बंगाल आदि राज्यों के विधानसभा चुनाव के पूर्व एक छोटे से प्वाइंट People’s representation of the people Act को डिसाइड नहीं कर पाया हूँ, कर्नल सोफिया को आतंकवादियों की बहन कहने वाले मध्यप्रदेश की मोहन यादव सरकार के मंत्री को स्व संज्ञान लेकर नोटिस ईश्यू करने वाले एमपी हाईकोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन का ट्रांसफर इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया, उत्तर प्रदेश के संभल में सीजेएम विभांशु सुधीर ने जब अपराधी प्रवृत्ति के सीईओ के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया तो उनका तबादला फैजाबाद कर दिया गया, जयपुर में जज दिनेश गुप्ता ने जब 1400 करोड़ की वसूली का नोटिस दिया तो अगला सूरज निकलने के पहले ही उन्हें 300 किलोमीटर दूर पटक दिया गया और पूंजीपतियों के लिए ज्युडीशरी के सारे रास्ते खोल दिए गए, बीजेपी की प्रवक्ता रही आरती साठे को जज बना दिया गया, जस्टिस पंचोली को सैकड़ा भर जजेज को सुपरशीट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ले आया गया।
दुनिया की राजनीति में गंभीरता से भी ज्यादा गंभीर भाषणबाजी से ज्यादा घातक और शक्तिशाली हथियार अक्सर व्यंग अथवा कटाक्ष अथवा कार्टून ही साबित हुए हैं। इतिहास में ऐसी घटनाएं भरी पड़ी हैं। भारत के भीतर एक फिल्म बनी थी जोकर (मेरा नाम जोकर)। जिसमें दर्द, वेदना को बेहतरीन तरीके से उकेरा गया है। देखा जाए तो आज भी देश में सर्कस ही चल रहा है। 1940 में एक फिल्म आई थी “द ग्रेट डिक्टेटर”। इसमें चार्ली चैप्लिन ने एडोल्फ हिटलर और बेनिटो मुसोलिनी की नकल करते हुए फासीवाद और नाजीवाद की आलोचना की गई थी। चैप्लिन का भावुक भाषण फिल्म का फाइनल सीन होता है जिसमें वह मानवता, लोकतंत्र और शांति की अपील करता है। जिसका असर यह हुआ कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब अमेरिका युद्ध में नहीं कूदा था तब इस फिल्म ने हिटलर के खिलाफ जनमत तैयार करने में काफी हद तक मदद की थी। फिल्म के प्रभाव को इस तरह से भी समझा जा सकता है कि घबराकर जर्मनी और उसके कब्जे वाले देशों में इस फिल्म को प्रतिबंधित कर दिया गया था। आज भी इस फिल्म को राजनीतिक व्यंग का क्लासिक उदाहरण माना जाता है। जो दुनिया को दिखाता है कि कैसे तानाशाही का विरोध किया जाता है।
2015 में फ़्रांस में एक पत्रिका ने चार्ली हेबद्दो द्वारा पैगम्बर मोहम्मद पर बनाए गए कुछ कार्टून छापे थे जिसे इस्लामिक कट्टरपंथियों ने आपत्तिजनक मानते हुए 7 जनवरी 2015 को पेरिस आफिस पर आतंकवादी हमला किया गया था। जिसमें 12 लोग मारे गए थे। इसके बाद विश्व भर में चला अभियान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सेकुलरिज्म का प्रतीक बन गया। इसी ने विश्व स्तर पर ईश निंदा और धार्मिक संवेदनशीलता को लेकर व्यंग की सीमाओं पर बहस छेड़ दी थी। 2008 में अमेरिकी चुनाव के बीच सैटरडे नाइट लाइव पर टीना फेका के अभिनय ने रिपब्लिकन वाइस प्रेसीडेंट कैंडीडेट सराह पालिन की उम्मीदवारी पर पानी फेर दिया था। यानी कामेडी भी चुनावी धारणाओं को बदलने की ताकत रखती है। 8वीं सदी में भी ब्रिटिश वन जेम्स गिलारे के कार्टूनों ने राजनीतिक हस्तियों को निशाना बनाया था।
सीजेआई जस्टिस सूर्य कांत द्वारा युवाओं खासतौर पर सिस्टम की सडांध के चलते बेरोजगारी की मार झेल रहे युवाओं पर की गई काकरोच, परजीवी जैसी टिप्पणी ने उनकी सेहत पर भले ही कोई आंच ना डाली हो लेकिन देश की राजनीति के भीतर एक नई पार्टी का इंद्राज तो करा ही दिया है और नाम भी सीजेआई जस्टिस सूर्य कांत द्वारा दिये गये नाम को ही आत्मसात करते हुए रख दिया गया है काॅकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) । सीजेपी के फाउंडर प्रेसीडेंट अभिजीत दीपके ने पार्टी ज्वाइन करने वालों के लिए अनोखी शर्तें रखी है। पार्टी की मेम्बरशिप उसी को दी जाएगी जो बेरोजगार (unemployed) हो, सुस्त (lazy) हो, कालानुक्रमिक रूप से आनलाईन (chronically online) हो, विरोधात्मक ढ़ंग से शेखी बघारने की क्षमता (ability to rant protessionally) हो ।
सीजेपी ने ऐजेंडे को भी जारी करने में देर नहीं लगाई। पांच सूत्रीय ऐजेंडा जारी करते हुए कहा गया है कि कोई पद नहीं (no post) – retirement rewards for judges. no chief Justice shall be granted a Rajya Sabha seat as a Post-retirement reward. हर वैध मत की रक्षा (protect every legit vote) – if any legit vote is deleted whether in a CJP or opposition – ruled state, the CEC shall be arrested under UAPA, as taking a way voting rights of citizens is no less than terrorism ! महिलाओं को पचास प्रतिशत आरक्षण (50% reservation for women) – women shall reserve 50% reservation not 33% without increasing the strength of parliament additionally. 50% of all cabinet positions shall be reserved for women. स्वतंत्र पत्रकारिता (independent media – no godi media) – all media houses owned by Ambani and Adani shall have their license canceled to make way for totally independent media. bank accounts of godi media in closed shall be investigated. राजनीतिक दलबदल पर 20 वर्ष का प्रतिबंध (20 years ban on political defection) – any MLA or MP who defacts from one party to another shall be barred from contentig election and from holding and public office for a period of 20 years. इसके बाद लिखा गया है NEW POLITICS, STRONG DEMOCRACY – BETTER INDIA. पूरे मेनीफैस्टो के पाशर्व में भारत का तिरंगा छाया हुआ है यानी भारत की आत्मा रूह देखती है और सबसे नीचे काॅकरोच तिरंगा सम्हाले हुए है।
ऐसा मेनीफैस्टो आज तक किसी भी पालिटिकल पार्टी ने बनाने का साहस नहीं दिखाया है बल्कि पिछले 12 सालों से देश की सरकार चला रही पार्टी ने ठीक इस ऐजेंडे के विपरीत ही अपनी रीति नीति चलाई है। भला हो सीजेआई सूर्य कांत का जिन्होंने देश के सारे काॅकरोचों (तिलचट्टों) को एकजुट कर दिया है। देखना होगा इन काॅकरोचों को मारने के लिए सीजेआई और मोदी सरकार कौन कौन से हिट लेकर आती है।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार


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