सरकारी नियमों की पाबंदी से सिमट रहे पूरी रात के जागरण, श्रद्धालुओं में बढ़ रही नाराजगी
नवरात्र से पहले धार्मिक आयोजनों पर समय सीमा का असर, विशेष छूट की उठी मांग
चैत्र नवरात्र बुधवार से शुरू होने जा रहे हैं, लेकिन इस बार भी पूरी रात चलने वाले पारंपरिक जागरणों पर सरकारी नियमों की छाया बनी हुई है। वर्षों से चली आ रही धार्मिक परंपरा अब समय सीमा में सिमटती नजर आ रही है, जिससे श्रद्धालुओं और आयोजकों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।
नवरात्र में जागरण की परंपरा पर असर
नवरात्र के दौरान देशभर में माता रानी के जागरण आयोजित किए जाते हैं, जो आमतौर पर पूरी रात चलते थे। इन जागरणों में भजन-कीर्तन, कथा और धार्मिक प्रस्तुतियों के जरिए श्रद्धालु पूरी रात जागकर पूजा-अर्चना करते थे।
हालांकि, पिछले कुछ वर्षों से इन आयोजनों की अवधि घटकर मात्र 2 से 3 घंटे तक सीमित रह गई है। अधिकांश जागरण अब रात 10:00 बजे या अधिकतम 11:00 बजे तक ही समाप्त कर दिए जाते हैं।
क्या है सरकारी नियम?
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट द्वारा ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए जारी निर्देशों के तहत रात 10:00 बजे के बाद लाउडस्पीकर और तेज ध्वनि वाले उपकरणों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया गया है।
इन निर्देशों के अनुसार:
- रात 10:00 बजे से सुबह 6:00 बजे तक माइक और साउंड सिस्टम का उपयोग प्रतिबंधित है।
- किसी भी कार्यक्रम के लिए विशेष अनुमति आवश्यक होती है।
- अधिकांश मामलों में प्रशासन द्वारा रातभर की अनुमति नहीं दी जाती।
इन्हीं नियमों के चलते पूरी रात चलने वाले जागरण अब संभव नहीं रह गए हैं।
आयोजकों के सामने बढ़ी चुनौतियां
जागरण समितियों और आयोजकों का कहना है कि सीमित समय में कार्यक्रम आयोजित करना कठिन होता जा रहा है। धार्मिक भावनाओं और परंपराओं के साथ समझौता करना पड़ रहा है।
कई आयोजकों का कहना है कि अनुमति प्रक्रिया भी जटिल है और समय पर मंजूरी मिलना मुश्किल हो जाता है।
समाजसेवियों की मांग—मिले विशेष छूट
पंचकूला के समाजसेवी दिनेश गुप्ता का कहना है कि सरकार को विशेष अवसरों पर नियमों में लचीलापन देना चाहिए।
उन्होंने कहा, “नवरात्र, शिवरात्रि जैसे धार्मिक पर्वों पर सरकार को विशेष छूट देनी चाहिए। यदि पूरी छूट संभव नहीं है, तो कम से कम सीमित ध्वनि स्तर के साथ रातभर जागरण की अनुमति दी जानी चाहिए, ताकि धार्मिक आस्था भी बनी रहे और नियमों का पालन भी हो सके।”
श्रद्धालुओं में बढ़ती नाराजगी
स्थानीय लोगों का कहना है कि जागरण केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा का भी हिस्सा हैं। ऐसे में इन पर पाबंदी से उनकी भावनाएं आहत हो रही हैं।
कई श्रद्धालुओं ने मांग की है कि प्रशासन धार्मिक आयोजनों के लिए अलग से दिशा-निर्देश जारी करे, जिससे परंपरा और कानून के बीच संतुलन बनाया जा सके।
धार्मिक आस्था और कानूनी नियमों के बीच संतुलन बनाना प्रशासन के लिए चुनौती बनता जा रहा है। नवरात्र जैसे पावन अवसर पर जागरणों का सीमित होना परंपराओं में बदलाव का संकेत दे रहा है। अब देखना यह होगा कि सरकार श्रद्धालुओं की मांगों पर कितना ध्यान देती है।




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