रुपया 92.25 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर, पश्चिम एशिया तनाव और महंगे कच्चे तेल का असर
भारतीय रुपया मंगलवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरकर 92.05 के स्तर पर पहुंच गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। इससे पहले जनवरी में रुपया 91.98 तक फिसला था। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने घरेलू मुद्रा पर दबाव बढ़ा दिया है।
चालू वर्ष में अब तक रुपया दो प्रतिशत से अधिक कमजोर हो चुका है। इस गिरावट के साथ यह 2026 में उभरते बाजारों की कमजोर प्रदर्शन करने वाली प्रमुख मुद्राओं में शामिल हो गया है।
गिरावट के प्रमुख कारण
1. कच्चे तेल की कीमतों में उछाल
पश्चिम एशिया में इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतें 85 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं। भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, जिससे तेल महंगा होने पर डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपया दबाव में आ जाता है।
2. सुरक्षित निवेश की ओर झुकाव
तनावपूर्ण वैश्विक माहौल में विदेशी निवेशक जोखिम वाले एसेट्स से दूरी बनाकर डॉलर जैसी सुरक्षित मुद्रा में निवेश बढ़ा रहे हैं। इससे डॉलर मजबूत हो रहा है और उभरते बाजारों की मुद्राओं, खासकर रुपये, पर नकारात्मक असर पड़ रहा है।
3. महंगाई की आशंका
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें घरेलू महंगाई को बढ़ा सकती हैं। ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिसका असर रोजमर्रा की वस्तुओं पर पड़ता है। महंगाई बढ़ने की आशंका से विदेशी निवेशक सतर्क रुख अपना रहे हैं।
पिछली राहत क्यों नहीं टिक पाई?
पिछले महीने भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते की खबरों के बाद रुपये में थोड़ी मजबूती आई थी। विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार में निवेश बढ़ाया, जिससे मुद्रा को सहारा मिला। हालांकि, पश्चिम एशिया में हालात बिगड़ने के साथ यह सुधार अल्पकालिक साबित हुआ और रुपया फिर दबाव में आ गया।
आम लोगों पर संभावित असर
विदेश यात्रा और पढ़ाई महंगी
डॉलर मजबूत होने से विदेश यात्रा, होटल बुकिंग और विदेशी विश्वविद्यालयों की फीस का खर्च बढ़ सकता है। जिन छात्रों की फीस डॉलर में है, उन्हें अधिक रुपये खर्च करने होंगे।
इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों की कीमत
मोबाइल फोन, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान, जिनके पुर्जे विदेश से आते हैं, महंगे हो सकते हैं। कंपनियां आयात भुगतान डॉलर में करती हैं, इसलिए लागत बढ़ने का असर ग्राहकों पर पड़ सकता है।
पेट्रोल-डीजल पर दबाव
यदि कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोतरी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक पश्चिम एशिया में तनाव कम नहीं होता और कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता नहीं आती, तब तक रुपये पर दबाव बना रह सकता है। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक की नीतिगत हस्तक्षेप और विदेशी निवेश प्रवाह में सुधार से कुछ राहत मिल सकती है।



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