21 घंटे की मैराथन वार्ता बेनतीजा, अमेरिका-ईरान के बीच नहीं बनी सहमति
अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर और परमाणु मुद्दों को लेकर इस्लामाबाद में 20 घंटे से अधिक चली गहन बातचीत बिना किसी समझौते के समाप्त हो गई।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने प्रेस वार्ता में बताया कि लंबी चर्चा के बावजूद दोनों पक्ष किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सके। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने अपनी “रेड लाइन” स्पष्ट रूप से सामने रखी थी, लेकिन तेहरान ने शर्तें मानने से इनकार कर दिया।
वेंस ने दोहराया कि अमेरिका का प्रमुख लक्ष्य ईरान को परमाणु हथियार बनाने की क्षमता हासिल करने से रोकना है। उनके मुताबिक, वाशिंगटन अल्पकालिक आश्वासनों के बजाय दीर्घकालिक और विश्वसनीय प्रतिबद्धता चाहता है, जो फिलहाल ईरान की ओर से दिखाई नहीं दे रही।
उन्होंने यह भी कहा कि बातचीत के दौरान अमेरिकी टीम ने लचीला रुख अपनाया और शीर्ष नेतृत्व के साथ लगातार संपर्क में रही, लेकिन इसके बावजूद सहमति नहीं बन सकी।
विश्लेषकों का मानना है कि यह असफल वार्ता परमाणु कार्यक्रम को लेकर चल रही कूटनीतिक कोशिशों के लिए एक बड़ा झटका है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से जारी अविश्वास के कारण आगे की बातचीत का रास्ता फिलहाल और कठिन होता नजर आ रहा है।
अमेरिकी खुफिया आकलन—ईरान को समर्थन पर विचार कर रहा चीन, स्थिति पर बनी अनिश्चितता
वॉशिंगटन
अमेरिका की खुफिया एजेंसियों के ताजा आकलन में संकेत मिला है कि चीन, ईरान के साथ चल रहे तनावपूर्ण हालात में अपनी भूमिका बढ़ाने पर विचार कर रहा है। हालांकि, अधिकारियों ने साफ किया है कि यह जानकारी अभी पूरी तरह पुख्ता नहीं है और स्थिति पर अनिश्चितता बनी हुई है।
द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी एजेंसियों ने ऐसे संकेत जुटाए हैं जो चीन के संभावित समर्थन की ओर इशारा करते हैं। फिर भी, अब तक कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है कि संघर्ष के दौरान अमेरिकी या इजरायली बलों के खिलाफ चीनी हथियारों का इस्तेमाल हुआ हो।
रिपोर्ट के अनुसार, चीन फिलहाल सतर्क रुख अपनाए हुए है। सार्वजनिक तौर पर वह खुद को एक निष्पक्ष पक्ष के रूप में पेश कर रहा है, लेकिन अंदरूनी स्तर पर ईरान को सीमित समर्थन देने के विकल्पों पर चर्चा जारी है। माना जा रहा है कि मिसाइल और ड्रोन तकनीक से जुड़े कुछ अहम पुर्जों के लिए ईरान की निर्भरता चीन पर बनी हुई है, हालांकि बीजिंग इन्हें ‘सिविलियन उपयोग’ की श्रेणी में रख सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि चीन की यह रणनीति संतुलन साधने की कोशिश है। एक ओर उसके ईरान के साथ मजबूत आर्थिक और ऊर्जा संबंध हैं, वहीं दूसरी ओर वह वैश्विक व्यापार और कूटनीतिक समीकरणों को नुकसान पहुंचाने से भी बचना चाहता है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच हालिया संघर्ष के बाद तनाव कम करने के प्रयास जारी हैं। ऐसे में किसी भी बाहरी शक्ति की संभावित भूमिका क्षेत्रीय संतुलन और चल रही कूटनीतिक कोशिशों पर असर डाल सकती है।
होर्मुज पर रुख बरकरार, ईरान ने कहा अब अमेरिका करे पहल
ईरान और अमेरिका के बीच इस्लामाबाद में हुई वार्ता बेनतीजा रहने के बाद तेहरान ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य की मौजूदा स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। साथ ही, अगली बातचीत को लेकर भी फिलहाल कोई समय या स्थान तय नहीं हुआ है।
ईरानी सूत्रों के अनुसार, अमेरिका द्वारा रखी गई शर्तें “गैर-व्यावहारिक” और “गैर-कानूनी” थीं, जिन्हें मानने से तेहरान ने साफ इनकार कर दिया। ईरान का कहना है कि वह किसी भी दबाव में आकर समझौता नहीं करेगा और अब आगे की पहल वाशिंगटन को करनी होगी।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने वार्ता के दौरान अमेरिका की रणनीति पर भी सवाल उठाए हैं। उसका आरोप है कि अमेरिका ने न केवल सैन्य मोर्चे पर बल्कि कूटनीतिक स्तर पर भी हालात का गलत आकलन किया है। ईरान ने दोहराया कि जब तक “यथार्थवादी और संतुलित” प्रस्ताव सामने नहीं आते, तब तक किसी प्रगति की उम्मीद नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर यथास्थिति बनाए रखने का ईरान का फैसला वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए अनिश्चितता बढ़ा सकता है। फिलहाल, दोनों देशों के बीच गतिरोध बरकरार है और कूटनीतिक समाधान की राह और कठिन होती नजर आ रही है।
हम चाहते हैं सीजफायर बना रहे- इशाक डार
पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री इशाक डार ने कहा कि हम चाहते हैं कि सीजफायर बना रहे. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच आगे भी बातचीत की कोशिश करता रहेगा । मतलब अभी भी पाकिस्तान को उम्मीद है कि आगे अमेरिका और ईरान के बीच में वह वार्ताकार बनेंगे ।




Leave a Reply
Want to join the discussion?Feel free to contribute!