खरी-अखरी : ग्यारह साल में पहली बार ऊंट आया पहाड़ के नीचे
ग्यारह साल में पहली बार ऊंट आया पहाड़ के नीचे
दिल्ली दरबार यानी मोदी सरकार के लिए खतरे की घंटी बजने लगी है। लाल दीवारें को सेंट्रल विस्टा के तहत बदल तो दिया गया लेकिन सत्ता का मिजाज नहीं बदला है। वह आज भी उसी रास्ते चल रही है जहां वह विपक्ष को एक इंच जमीन देने को तैयार नहीं है। सत्ता को ऐसा लगता है कि वह अब चुनाव के आसरे कभी भी चुनाव हारेगी नहीं क्योंकि उसने चुनाव जीतने के लिए पूरे सिस्टम को अपने अनुकूल बना लिया है। देश की इकाॅनामी छठे नंबर पर आ चुकी है। देश के भीतर डूबती हुई अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी की परिस्थिति, डूबता हुआ एक्सपोर्ट इंपोर्ट, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की साख और इन सबके बीच खड़े भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहुंच, पकड़ और सोच का विजन इस दौर में जिस तरह से डगमगाया हुआ है उसे पूरी दुनिया देख रही है। देश के लोगों को परेशान कर रहे देश के मुद्दे चाहे वह सड़क पर चल रहे लोगों के हाथों में गैस सिलेंडर हों या फिर पेट्रोल डीजल खाद के लिए परेशान लोग और सरकार का लोगों से सरोकार ना हो पाना क्योंकि हर शाम टेलीविजन के सामने नौकरशाही का यह कहना सब कुछ बेहतर है चकाचक है। सरकार संसद में एक नहीं तीन तीन बिल यह कहते हुए लेकर आती है कि यह देश की प्रगति के लिए है और वह पार्लियामेंट में गिर जाता है तो साफ है कि लकीरें खिंच चुकी हैं और सत्ता तथा विपक्ष आरपार की परिस्थिति में आमने सामने आकर खड़े हो चुके हैं। जहां सत्ता को हरहाल में जीत चाहिए और चुनाव आयोग से लेकर न्यायपालिका तक उसके साथ कदमताल कर रहे हैं और विपक्ष लड़ने को तैयार है लेकिन अभी भी वह संसद के गलियारों से बाहर निकल कर लोगों के साथ जुड़ने का साहस जुटा नहीं पा रहा है क्योंकि उसका अपना पेट भरा हुआ है उसके अपने नेटवर्थ उसके साथ जुड़े हुए हैं और सांसद होने के नाते वह विशेषाधिकार के तहत मिली सुख सुविधाओं को भोग रहा है। देश की जनता बेहतरीन तरीके से पूरे तमाशे को देख रही है। बीच-बीच में ठहाके भी लगा लेती है। खलनायकों के बीच में से किसी एक को बतौर नायक चुन भी रही है लेकिन यह सर्कस लंबे समय तक चलेगा नहीं। क्योंकि जनता के मुश्किल हालातों से जो सवाल उठ रहे हैं वह किसी बिल या संविधान संशोधन के दायरे में आते नहीं है।
ये परिस्थितियां आपातकालीन संसद सत्र के बीच से निकलकर आई हैं। 2014 में जितना पैसा चुने हुए सांसदों को मिलता था उसमें 2024 तक 370 फीसदी की बढोत्तरी हो चुकी है। इसी तरह देश के टाप 20 कार्पोरेट्स का नेटवर्थ भी 2014 के मुकाबले 2024 में 3000 फीसदी पार कर चुका है। जीडीपी के हिसाब से देश में प्रति व्यक्ति आय में बमुश्किल 37 फीसदी बढोत्तरी दिखती है लेकिन जैसे ही देश के भीतर 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज और अलग अलग योजनाओं के जरिए लाभ पहुंचाने की दिशा में देखते हैं तो 100 करोड़ लोगों की प्रति व्यक्ति आय 60 हजार से 85 हजार रुपये के बीच डोलती नजर आती है। तो फिर कैसे हो सकते हैं पालिटीशियंस के सरोकार आम आदमी के साथ ? कौन देखेगा पिछड़े तबके को ? कौन समझेगा आदिवासियों की भाषा को ? कौन जुड़ेगा माइनारिटीज के अकेलेपन और दुख दर्द के साथ ? बीते एक दशक से देश का पूरा सिस्टम सत्ता और सरकार के आसरे इस तर्ज पर चल रहा है कि जो हमारे साथ खड़ा है वह कानून से ऊपर है।
They new very clearly that this will actually can not be passed they new it they are not stupid they new every opposition person wood opposite this Will can no be passed this was a panicic reaction because the Prime Minister at any cost needed to send to massages. Number one he needed to change the ELECTORAL MAP OF INDIA. And number two he needed to send a massage again that he is pro women why he is doing that I will be live to your imagination. विपक्ष का नेता अपने भाषण में ईशारों ईशारों में देश की उस हकीकत को बयां करता चला गया जिसको बीते 11 सालों के अपने कार्यकाल में मोदी गवर्नमेंट दबाने का प्रयास बखूबी करती चला आ रही है। किस तरह से मोदी सरकार ने ओबीसी, दलित, माइनारिटीज को मिलने वाले अधिकार और सम्मान को खारिज किया है। एक तरफ संसद के भीतर सरकार संविधान की दुहाई और संविधान संशोधन का जिक्र कर रही थी लेकिन ऐन पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में होने जा रहे विधानसभा चुनाव के बीच परिसीमन और महिला आरक्षण 2023 को दरकिनार कर 30 महीने बाद नई सोच के साथ पार्लियामेंट का स्पेशल सेशन बुलाकर उसमें चली 21 घंटे की मैराथन बहस में यह सब कुछ उभरता चला जा रहा था। यह कैसे संभव हो सकता है कि जहां सहूलियत हो वहां संविधान, संविधान संशोधन का जिक्र कर लिया। जहां और भी ज्यादा सहूलियत हो वहां संविधान नहीं मौजूदा मौका परस्ती के जरिए अपने तर्कों से विपक्ष पर निशाना साधते रहो।
देश के भीतर महिला आरक्षण, सेंसस, कार्पोरेट्स, कार्पोरेट्स के साथ सत्ता का नेक्सेस इन तमाम परिस्थितियों में देश के भीतर ज्यूडीशरी, एज्युकेशन सेक्टर, हेल्थ सेक्टर से बात निकलते निकलते वहां तक पहुंच गई जिसको कहने से मोदी सत्ता कतराती रही है। महिला आरक्षण को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच सरकार किस तरह से पब्लिक सेक्टर्स को कार्पोरेट्स के हाथों बेचती या कहें सौंपती चली जा रही है। वहां तो आरक्षण भी नहीं है। कार्पोरेट्स पैसा बना रहे हैं और देश का पिछड़ा तबका मुख्यधारा से कटता चला जा रहा है। यहां तक कह दिया गया कि मोदी सत्ता अपनी हकीकत को छुपाने के लिए कभी 140 करोड़ देशवासियों के पीछे छिप जाती है तो कभी सेना के पीछे छिप जाती है। That they think they are the people of India. You are not the people of India. The people of India something else. The also think that they are the armed forces. You are not the armed forces. The armed forces are something else. You are a political organisation. You are not India and you are not the armed forces of India. We are not attacking the people of India. We are not attacking the armed forces of India. We are attacking you do not high behind the people of India and behind the armed forces.
सवाल है कि देश की संसद के भीतर सत्तापक्ष द्वारा जो बिल लाये जाते हैं क्या वो विशुद्ध रूप से अपनी राजनीति साधने और चुनाव जीतने के लिए लाये जाते हैं ? क्या जो मौजूदा महिला आरक्षण बिल लाया गया, जो कि संसद में औंधे मुंह भरभरा कर गिर गया तो इसकी आड़ में लाये जाने वाले दो अन्य बिलों को लाना स्थगित कर दिया गया, वह भी पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में महिलाओं के वोट अपने पक्ष में करने की नियत से लाया गया था ? बिल गिरने के बाद दो सवाल तो खड़े हो ही गये हैं। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में महिलाओं के जो वोट पडेंगे वो किसके पक्ष में पड़ेगे ? क्या विपक्ष ने बीजेपी जो मैसेज देना चाह रही थी उसे धराशाई कर दिया है ? महिला सशक्तिकरण, बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ, महिलाओं को लेकर चल रही तमाम योजनाओं के मद्देनजर नजर देश की आधी आबादी पर हो रहे तरह-तरह के अत्याचारों पर सतही नजर भी डालें तो यह कड़वी हकीकत है कि 50 फीसदी से ज्यादा मामले पुलिस और न्यायपालिका की चौखट तक पहुंच ही नहीं पाते हैं। मगर जो पहुंच पाते हैं उन्हें अगर NCRB के जरिए जांचें तो 2014 में इनकी संख्या 337922 थी जो 2024 में बढकर 462256 हो गई। वहीं कन्विक्शन रेट की बात है तो वह 2014 में 9 फीसदी था वह घटकर 6.9 फीसदी पर आ गया। यानी एक ऐसी परिस्थिति है जिसमें महिला आरक्षण, महिला सशक्तिकरण, महिलाओं के वोट चाहने की इच्छा, उनको नुमाइंदा बनाने की सोच, उनको प्रतिनिधित्व देकर पार्लियामेंट सजाने की कोशिश सब कुछ है लेकिन समाज में उसके अधिकार, उसकी सुरक्षा सब कुछ गायब है।
लगता है संसद जादूगर की जादूगरी से आगे निकल कर सर्कस में तब्दील सी हो गई है। क्योंकि पार्लियामेंट के भीतर और बाहर का नजारा तो यही दिखा रहा है कि अब सवाल जादूगर का नहीं जोकर का हो चला है। जिस तरह से सर्कस में शेर, हाथी, यहां तक कि हर चीज को अपने नजरिए से दिखाने की कोशिश होती है वैसा ही कुछ पार्लियामेंट में हो रहा था। लोकतंत्र के मंदिर में देश के भविष्य की परिभाषा गढ़ने की कोशिश संविधान संशोधन करने के जरिए की गई और वह फेल हो गई तो सरकार उसे अपने तरीके से बता रही है कांग्रेस पार्टी विशेष कर राहुल गांधी हर बात का विरोध करते हैं और आज जब नारी उत्थान और नारी के विकास के लिए नरेन्द्र मोदी की सरकार समर्पित है उसका भी विरोध आज कांग्रेस विपक्ष जो है ने किया जिससे उसका चाल चलन चरित्र दिख गया। This is an extremely sad day, a deeply disappointing day for the country’s democracy. Entire country has witnessed. Who is pro women reservation 33% and who is against. 11 साल में पहली बार है जब मोदी सरकार अपने बिल को संसद में पास नहीं करा पाई। वह तीन बिल लेकर आई थी लेकिन जैसे ही महिला आरक्षण बिल, जो 131 वां संविधान संशोधन बिल था, औंधे मुंह गिरा उसके बाद सरकार बाकी दो बिल परिसीमन और केन्द्र शासित प्रदेश संशोधन बिल को रखने की हिम्मत नहीं कर पाई। संविधान संशोधन के लिए संविधान के अनुच्छेद 368 के उपबंधों के अनुसार उपस्थित सदस्यों 540 में से 528 (12 गैरहाजिर) में से दो तिहाई बहुमत यानी 352 की जरूरत थी लेकिन वह 300 का आंकड़ा भी नहीं छू पाई। बिल के पक्ष में 298 और विपक्ष में 230 सांसदों ने मत दिया। लिहाजा बिल पास नहीं हो सका।
दरअसल इसके पीछे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एकला चलो की हठधर्मिता को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। 21 घंटे चली लंबी बहस में यह बात खुलकर सामने आई कि विपक्ष इस बात से नाराज था कि जब पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में वोटिंग होनी है तो उसके बीच में महिला आरक्षण और उसकी आड़ में परिसीमन का बिल, वह भी बार बार मांग करने के बाद बिना सर्वदलीय बैठक में विचार विमर्श न करने के बावजूद, क्यों लाया गया ? सही मायने में कहें तो देश की संसदीय व्यवस्था का वह पर्दा हट गया है जहां पर जिक्र बार बार संविधान की दुहाई देने का होता है, समाज के साथ सरोकार रखने का होता है, संसद की मौजूदगी इसलिए है कि उसका ध्यान देश की जनता पर है। इस वक्त सत्ता मदमस्त है इस संयोग से कि चर्चा के बीच में ही इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ लखनऊ हाईकोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने बीजेपी कार्यकर्ता विग्नेश शिशिर की अपील पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ दोहरी नागरिकता (ब्रिटेन) वाले मामले में एफआईआर दर्ज करने का आदेश पारित कर दिया। विपक्ष भी इस समय खुश है क्योंकि मोदी सरकार द्वारा लाया गया बिल पास नहीं हुआ और 11 बरस में पहली बार मोदी सरकार डगमगाई है।
पुनश्च
बीजेपी और उसके पितृ संगठन आरएसएस तथा उन्हें फालो करने वालों में से जिस तरह से दुश्चरित्रों के चरित्र देश दुनिया के सामने आ रहे हैं उससे यह भी कहा जाने लगा है “भारतीय जनता पार्टी और महिलाओं के सम्मान की बात यानी सरदारों के मोहल्ले में नाई की दुकान” ।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार




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