एआई और इंटरनेट से बढ़ती डिजिटल थकान: कारण और समाधान
आज का युग तकनीक का युग है और आज के इस तकनीक और डिजिटल युग में हर किसी में डिजिटल फटीग (डिजिटल थकान) तेजी से बढ़ती समस्या बनती जा रही है। दिनभर या यूं कहें कि लगातार स्क्रीन पर काम करना, बार-बार आने वाले नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग, ऑनलाइन बैठकों और एआई आधारित टूल्स पर बढ़ती निर्भरता के कारण लोगों में मानसिक थकान, एकाग्रता की कमी, आंखों में तनाव और चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है। उत्पादकता बढ़ाने के लिए बनाए गए डिजिटल साधन कई बार मानसिक दबाव का कारण भी बन जाते हैं। इसलिए स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करना, नियमित अंतराल पर विश्राम लेना और डिजिटल संतुलन बनाए रखना आज की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
कहना ग़लत नहीं होगा कि मोबाइल या लैपटॉप पर बार-बार आने वाले नोटिफिकेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) द्वारा तैयार की जा रही सामग्री, स्क्रीन पर लगातार काम करने की आदत और विभिन्न एआई टूल्स के बढ़ते उपयोग के कारण आज लोगों में मानसिक और डिजिटल थकान तेजी से बढ़ रही है। विडंबना यह है कि जिन तकनीकों और टूल्स को हमारी उत्पादकता बढ़ाने के लिए बनाया गया था, वे ही अब एकाग्रता में कमी, तनाव और ‘बर्नआउट’ का मुख्य कारण बन रहे हैं। ऑनलाइन लेक्चर, वर्चुअल मीटिंग्स, इंटरनेट पर उपलब्ध असीमित जानकारियों, रील्स और शॉर्ट वीडियोज ने लोगों को इस कदर बांध लिया है कि किताब पढ़ते समय भी ध्यान बार-बार मोबाइल फोन की ओर चला जाता है, जिसका सीधा असर हमारी स्मरण शक्ति और निर्णय लेने की क्षमता पर भी पड़ रहा है। लगातार डिजिटल माध्यमों के संपर्क में रहने और एआई-आधारित टूल्स से मिलने वाले अलर्ट्स, रिमाइंडर्स व परफॉर्मेंस रिपोर्ट्स के कारण आज मानसिक बोझ बढ़ रहा है।
पाठक जानते हैं कि आज शिक्षा से लेकर कार्यस्थल तक एआई कौशल सीखने पर विशेष जोर दिया जा रहा है, लेकिन जब हम एआई के उत्तरों पर पूरी तरह निर्भर होने लगते हैं, तो गहराई से सोचने, तर्क करने और नए समाधान खोजने की हमारी मौलिक व रचनात्मक क्षमता कमजोर पड़ने लगती है। इंटरनेट मीडिया पर स्क्रॉलिंग की कोई निश्चित सीमा नहीं होती और एआई एल्गोरिदम उपयोगकर्ताओं के व्यवहार व रुचियों के आधार पर लगातार व्यक्तिगत व आकर्षक कंटेंट दिखाते रहते हैं, जिससे लोग कुछ मिनट के लिए प्लेटफॉर्म खोलकर भी वहां घंटों बिता देते हैं। इस ‘इन्फॉर्मेशन ओवरलोड’ (सूचना की अधिकता) के कारण मानसिक संतुलन प्रभावित होता है और व्यक्ति थकान व भ्रम का शिकार हो जाता है। इस स्थिति से बचने के लिए गैर-जरूरी नोटिफिकेशन बंद करना, स्क्रीन टाइम सीमित रखना, प्रतिदिन सुबह और रात को कुछ समय डिजिटल डिवाइस से दूर रहना तथा हर आधे घंटे में छोटा ब्रेक लेना बेहद आवश्यक है।
वास्तव में, आज चिंता का विषय यह नहीं है कि एआई मानव रचनात्मकता का स्थान ले लेगा, बल्कि यह है कि उस पर अत्यधिक निर्भरता हमारी जिज्ञासा और स्वतंत्र सोच को सीमित कर देगी; इसलिए एआई का उपयोग केवल एक सहायक उपकरण के रूप में होना चाहिए।
बहरहाल, देश में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है और ‘भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण’ (ट्राई) की हालिया रिपोर्ट बताती है कि भारत में अब लगभग 109 करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं, जहां मोबाइल-इंटरनेट उपभोक्ता औसतन हर महीने 26.7 जीबी डेटा खर्च कर रहे हैं, तथा कुल टेलीफोन उपभोक्ताओं की संख्या बढ़कर 133 करोड़ से अधिक हो गई है, जिससे स्पष्ट है कि डिजिटल कनेक्टिविटी मजबूत होने के साथ भारत तेजी से एक डिजिटल समाज और डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है।
अंत में निष्कर्ष के तौर पर यही कहूंगा कि डिजिटल क्रांति और एआई निश्चित रूप से प्रगति के बड़े माध्यम हैं, लेकिन इनका अनियंत्रित उपयोग मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। भारत के तेजी से बढ़ते डिजिटल समाज में ‘डिजिटल वेलबीइंग’ (डिजिटल कल्याण) को प्राथमिकता देना अब वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य हो गया है। तकनीक हमारी सोच और क्षमताओं को बढ़ाने के लिए है, न कि उसे नियंत्रित करने के लिए। अतः सजगता, सीमित उपयोग और समय-समय पर डिजिटल डिटॉक्स अपनाकर ही हम इस बढ़ते मानसिक तनाव से बच सकते हैं और तकनीकी विकास का वास्तविक लाभ उठा सकते हैं।
सुनील कुमार महला,
फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार,
पिथौरागढ़, उत्तराखंड



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