खरी-अखरी : क्या मोदी सरकार के पास एक ही बल बचा है – – पुलिस बल ?
11 मेट्रो स्टेशन बंद करने और पुलिस की भारी तैनाती के बाद भी जंतर-मंतर पर बड़ी तादाद में लोगों का जमावड़ा हो गया इसकी कल्पना मोदी सरकार ने शायद ही की होगी। इससे एक बात तो साबित हो गई शासक कितना भी निरंकुश हो, तानाशाह हो, जुल्मी हो, निर्दयी हो, कितने भी जुल्मों सितम कर ले मगर गांधी के देश में जनता को अपने मौलिक और संवैधानिक अधिकारों की आवाज को बुलंद करने के लिए सड़क पर आने से रोक नहीं सकता है।
2 अक्टूबर गांधी जयंती के दिन दिल्ली के 11 मेट्रो स्टेशनों को बंद कर ताला जड़ दिया गया यानी लोगों की आवाजाही रोक दी गई। आजाद भारत में भारतियों की सरकार के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक स्थिति और क्या हो सकती है। ऐसे शर्मनाक हालात में देश को खड़ा करने के लिए तो देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को तत्काल अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए अगर उनमें रत्तीभर भी नैतिक बल है तो ! गांधी के देश में किसे खतरा महसूस हो रहा है ? क्या मोदी सरकार के पास एक ही बल बचा है – पुलिस बल ? आत्मबल और नैतिकबल क्या उसके पास से रफूचक्कर हो चुके हैं ? गांधी जयंती के दिन भी मोदी सरकार जिस तरह से देश के नागरिकों से डर रही है शायद इतना तो फिरंगी सरकार भी भयभीत नहीं हुई होगी ? देश की जनता ने सड़क पर उतर कर बता दिया है कि उसके दिल में आज भी गांधी जिंदा है। खासकर उन्हें जो गोडसे पूजक हैं और निरंतर गांधी को अपमानित करने से चूकते नहीं हैं। इतनी बड़ी सुरक्षा व्यवस्था बताती है कि गांधी से ज्यादा सम्मानित कोई दूसरा है ही नहीं। मोदी सरकार इतनी नासमझ तो होगी नहीं कि वह 2 अक्टूबर और गांधी जयंती के मायने और मतलब ना समझती हो। कनाट प्लेस के पूरे इलाके में तैनात पुलिस बल मोदी सरकार के अपराधबोध को बयां कर रहा है।

मोदी सरकार और उसकी पुलिस ने दो माह पहले 20 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर पर जमा होकर गांधीवादी तरीके से प्रोटेस्ट कर रहे जं जी, जं अल्फा, युवाओं, बच्चियों, उनके स्पोर्ट में आये माता-पिता दादा-दादी पर जो हिंसात्मक कार्रवाई की थी उसके घाव अभी भी हरे-भरे हैं। ना जाने कितने असामाजिक तत्वों, गुंडे मवालियों यहां तक कि जेल में बंद दुर्दांत अपराधियों को छोड़ कर जंतर-मंतर पर इसलिए भेज दिया गया था कि वे सादे कपड़ों में पुलिस के साथ मिलकर प्रदर्शनकारियों पर कील और करंट वाले लाठी डंडे चलाएं, दिल्ली पुलिस (अमित शाह की पुलिस) ने तो पैटल गन तक चलाने में कोई संकोच नहीं किया था । और जब की गई इन सारी अमानवीयता की जबावदेही तय करने की बात उठने लगी तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह चुप्पी साध कर ना जाने किस बिल में जा छिपे थे ! वह भी एक-दो दिन नहीं पखवाड़े भर से ज्यादा समय तक, वह भी तब जब संसद का मानसून सत्र चल रहा था, विपक्ष लगातार गृहमंत्री अमित शाह से सदन में उपस्थित होकर बयान देने की मांग कर रहा था लेकिन सदन में आने का साहस गृहमंत्री अमित शाह जुटा नहीं पाए, ना ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही जुटा पाए। जनता का गुस्सा भी सातवें आसमान पर था। गृहमंत्री अमित शाह आज तक इसका खुलासा करने की हिम्मत नहीं कर पाए हैं कि दो हज़ार से ज्यादा अपराधी जंतर-मंतर पर जुटकर सादे कपड़ों में पुलिस की भूमिका क्यों और कैसे निभा रहे थे ? पुलिस के रिकाॅग्निशन साफ़्टवेयर में कैसे पकड़े गए ? जो जेल में थे उन्हें जेल से किसके आदेश पर बाहर भेजा गया जंतर-मंतर पर उपद्रव करने के लिए ? 2 अक्टूबर गांधी जयंती के दिन जिस तरह से कनाट प्लेस पर पुलिस बल तैनात है वह पुलिस के अपराधबोध को भी उजागर कर रहा है।
आजाद भारत के इतिहास में शायद यह पहला मौका होगा जब आवाम मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर सड़कों पर उतरा हो। ऐसा नहीं है कि मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश गुप्ता ने कोई पहली बार जनता के मौलिक और संवैधानिक अधिकारों पर प्रहार किया है। वह तो अपने पदभार ग्रहण करते ही हमला करने लगे थे। ज्ञानेश ही क्यों इसके पहले वाले मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने भी मौजूदा राजनीतिक सत्ता को सत्ता में बनाए रखने के लिए जनता के मौलिक और संवैधानिक अधिकारों को रौंदने में कोई कोताही नहीं बरती थी लेकिन आवाम कभी भी सड़कों पर नहीं उतरा। उसने चुनाव आयोग के सारे जुल्मों सितम को सहकर भी चुनाव आयोग पर अपना भरोसा बनाए रखा लेकिन अब आवाम का विश्वास चुनाव आयोग को लेकर पूरी तरह से टूट चुका है।
लोगों के जंतर-मंतर पर रवानगी से पहले ही चुनाव आयोग के भीतर का सच धीरे धीरे किस्तों में बाहर आने लगा है। वो सच जिसे स्वीकार करने की हिम्मत चुनाव आयोग जुटा नहीं पा रहा था। उसके भीतर का नैतिक बल भी प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के नैतिकबल की तरह मर चुका है वर्ना 23 सितम्बर 2026 को इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में वोट चोरी पकड़े जाने पर तत्काल तीनों चुनाव आयुक्त सामने आकर प्रेस कांफ्रेंस करते, अपनी गलती मानते और अपने-अपने पद से इस्तीफा दे देते। पिछले साल अगस्त के महीने में जब एसआईआर की शुरुआत हुई तब से लेकर अब तक एडीआर, सतर्क नागरिक संगठन समेत कईयों ने सुप्रीम कोर्ट में इसलिए गुहार लगाना शुरू किया क्योंकि उन्हें इस बात का अंदेशा हो चला था कि एसआईआर के जरिए कोई बड़ा खेल खेला जाने वाला है। चुनाव आयोग पर आरोप पर आरोप लगते रहे लेकिन वह मदमस्त हाथी की चाल चलता रहा। लेकिन जब यह सच हकीकत में बदल कर सामने आकर खड़ा हो गया कि 17 अगस्त 2025 को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश द्वारा दिया गया यह भरोसा झूठा निकल रहा है कि वह हर वोटर के साथ चट्टान की तरह खड़ा है, किसी भी वोटर का नाम बिना किसी वैलिड सबूत के नहीं काटा जाएगा।
लेकिन चुनाव आयोग वाकई हर मतदाता के साथ चट्टान की तरह खड़ा है क्या ? वाकई नहीं खड़ा है। यदि वह वाकई हर मतदाता के साथ खड़ा होता तो तेरह करोड़ से ज्यादा वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से काटे जाने पर हंगामा खड़ा नहीं होता ना ही इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में उसकी वोट चोरी का खुलासा होता और चुनाव आयोग को 01 अक्टूबर 2026 को एसआईआर वाले राज्यों के निर्वाचन अधिकारियों को यह आदेश निर्देश जारी करना पड़ता कि एक भी मतदाता छूटने ना पाए, इसके लिए विशेष अभियान चलाया जाए। तेरह करोड़ का आंकड़ा कोई साधारण आंकड़ा नहीं है जिस पर यह मान लिया जाए कि यह अनजाने में हो गया होगा। चुनाव आयोग के इस आदेश निर्देश का मकसद तो यही समझ में आता है कि वह लोगों को झांसे में रखना चाहता है ! पश्चिम बंगाल में 27 लाख लोगों को मताधिकार से वंचित कर दिया गया और अभी जिन दो सीटों पर उपचुनाव होने जा रहे हैं उसमें 18 हज़ार मतदाता एक बार फिर मतदान नहीं कर पायेंगे क्योंकि उनकी अपील आज भी पेंडिंग पड़ी हुई है। अगर चुनाव आयोग वास्तव में हर वोटर के वोट देने के अधिकार को लेकर सीरियस होता तो एक एक वोटर का नाम वोटर लिस्ट में दर्ज करने के लिए विशेष अभियान चलाता और जब तक एक भी वोटर का नाम वोटर लिस्ट में दर्ज होने से बाकी रह जाता तब तक उपचुनाव की घोषणा नहीं करता !
मोदी सरकार की गुजराती जोड़ी को यह आभास तो होने लगा है कि जनता अब एसआईआर के सच को ठीक ठीक समझने लगी है। उस जोड़ी को इस बात का डर सताने लगा है कि यदि जनता सड़क पर आ गई तो ज्ञानेश का इस्तीफा लिए बिना लौटेगी नहीं और बात बढ़ते बढ़ते उनके (गुजराती जोड़ी) इस्तीफे तक पहुंच जाएगी। देश में पहली बार हो रहा है कि मोदी सरकार की गुजराती जोड़ी ने देश को ऐसे मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां 2 अक्टूबर गांधी जयंती के दिन नागरिक, छात्र, समाजिक सांस्कृतिक संगठन, समाज, कई राजनीतिक दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश के फ्रॉड के खिलाफ, इस कठपुतली के सूत्रधार मोदी-शाह के खिलाफ प्रदर्शन करने सड़कों पर उतरने के लिए विवश हुए हैं। शायद जनता के लिए जनता के मौलिक और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और देश के संविधान को जिंदा रखने के लिए इससे अच्छी श्रध्दांजलि गांधी के लिए कोई दूसरी हो ही नहीं सकती है।
17 अगस्त 2025 को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश का झूठ तो चंद रोज बाद ही उजागर होने लगा था जब दिल्ली के भीतर ही अनेकों झुग्गी बस्तियों को मटियामेट कर वहां के वोटर गायब कर दिए गए। रिपोर्ट पर रिपोर्ट आती रहीं लेकिन उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा। अगर पड़ता तो ज्ञानेश कहते कि मीडिया में जो रिपोर्ट आ रही है हम उसे गंभीरता से लेते हैं, चेक करते हैं, किसी भी मतदाता का नाम लिस्ट से नहीं हटेगा। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। और अब जब जनता यह कहते हुए सड़क पर आ रही है कि यह वोट चोर है, इसने वोट चोरी कर मौजूदा सत्ता को सत्ता में बैठाए रखा है, इसने डेमोक्रेसी को आहत किया है। इसलिए इसे तत्काल रिजाइन करना चाहिए। बात तो यहां तक निकल कर आने लगी है कि सही मायने में ज्ञानेश के आका ही चोर हैं, उसके हुक्मरान ही चोर हैं तभी तो ज्ञानेश की तरफदारी करने के लिए आका की पार्टी के लोग सामने आ रहे हैं।
बात केवल एसआईआर और वोटर लिस्ट भर की नहीं है बात तो उसके आगे की भी है। पोलिंग बूथ पर कितना वोट पड़ा इसको लेकर भी फर्जी आंकड़े दिए गए। एकाएक मतदान प्रतिशत को बढ़ा दिया गया। जितने वोट पड़े उससे ज्यादा और उससे कम वोटों की फर्जी गिनती कर सत्तापक्ष के कैंडीडेट को विजयी घोषित कर दिया गया। हजारों मतदाताओं को मृत बताकर वोटर लिस्ट से नाम काट दिया गया जबकि वह व्यक्ति सशरीर उपस्थित होकर अपने जिंदा होने की गुहार लगाता रहा लेकिन उसकी गुहार को अनसुना कर दिया गया। इतना ही नहीं इन आवाजों का ज्ञानेश ने मजाक तक उड़ाया। उसके बावजूद भी जनता चुनाव आयोग पर भरोसा बनाए रखी। तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब वोटर को संविधान से मिले वोट के अधिकार की लूट हो सकती है तो फिर एक दिन संविधान से मिले तमाम अधिकारों को भी खत्म किया जा सकता है । और यह अंदेशा तब और बढ़ जाता है जब संविधान का कस्टोडियन सुप्रीम कोर्ट की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठा न्यायाधीश इस तरह की टिप्पणी करता है जो आभास कराते हैं कि देश की न्यायपालिका मौजूदा सत्ता से काॅप्रोमाइज्ड हो चुकी है।
ऐसा नहीं है कि वोटर लिस्ट से समुदाय विशेष (मुस्लिम) के ही नाम काटे गए हैं। वोटर लिस्ट से तो दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों के नाम भी डिलीट किए गए हैं। चुनाव आयोग का झूठ ही लोगों को जंतर-मंतर पर ज्ञानेश का इस्तीफा मांगने के लिए लेकर आ रहा है। ज्ञानेश गुप्ता पर केवल एसआईआर को लेकर ही आरोप नहीं लग रहे हैं, आयोग के दायरे से बाहर भी कई आरोप लग रहे हैं। 23 सितम्बर 2026 की रिपोर्ट के पहले भी द वायर, स्क्रोल रिपोर्टर्स, कलेक्टिव न्यूज, मिनर न्यूज, द हिन्दू में भी लगातार खबरें छपती रही हैं। लेकिन चुनाव आयोग बेफिक्र था क्योंकि उसे पूरा भरोसा हो चुका है कि भारत की जनता नींद की गोली खाकर बेसुध है। वह कभी भी लोकतंत्र को बचाने के लिए संघर्ष करने सड़कों पर नहीं उतरेगी। लेकिन अब चुनाव आयोग और उसके आका भयभीत हो चले हैं इसीलिए पुलिस का भारी भरकम इंतजाम है। चुनाव आयोग धीरे धीरे टुकड़ों में अपना गुनाह कबूल कर रहा है।
2 अक्टूबर गांधी जयंती के दिन अपने संवैधानिक अधिकारों की हिफाजत और संविधान को बचाने के लिए दिल्ली के जंतर-मंतर और मुंबई के शिवाजी पार्क में लोगों का एकत्रित होना इस बात का जीता जागता सबूत है कि देशवासियों में अपने वजूद को बचाने के लिए जिंदगी मौजूद है। एक बात बहुत साफ तरीके से सामने आ गई है कि जनता को धोखे में रखकर देश को धोखा दिया जा रहा है और इसका प्रमाण केवल मीडिया रिपोर्ट नहीं है बल्कि खुद चुनाव आयोग का धीरे-धीरे टुकड़ो टुकड़ो के किया जा रहा कबूलनामा है।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार



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