सरोगेट विज्ञापनों से जुड़ जाते हैं सेलिब्रिटी, फिर होता हैं विवाद?
इलायची-पानी के बहाने पान मसाला का खेल? सितारों को राष्ट्रपति की नसीहत, करोड़ों के कारोबार पर फिर उठे सवाल
पान मसाला और शराब जैसे उत्पादों के प्रत्यक्ष विज्ञापन पर नियमों की पाबंदियों के बीच ‘सरोगेट एडवरटाइजिंग’ एक बार फिर चर्चा में है। इलायची, मिनरल वॉटर या दूसरे वैध उत्पादों के नाम से ऐसे ब्रांडों की पहचान और प्रचार बनाए रखने पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। इसी बहस के बीच राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में फिल्मी सितारों से स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह उत्पादों का प्रचार करने से बचने की अपील की।
मामला इसलिए भी गरम है क्योंकि महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने विमल इलायची के विज्ञापन को लेकर शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को नोटिस जारी किए हैं। नियामक का आरोप है कि विज्ञापन का संबंध विमल पान मसाला ब्रांड से बनता है और यह अप्रत्यक्ष प्रचार की श्रेणी में आ सकता है। दिल्ली हाईकोर्ट ने सितंबर में इस मामले में दायर याचिका को क्षेत्राधिकार के आधार पर खारिज कर दिया था।
सरोगेट विज्ञापन में किसी प्रतिबंधित या सीमित विज्ञापन वाले उत्पाद के बजाय उसी ब्रांड नाम, लोगो या मिलते-जुलते विजुअल के साथ किसी दूसरे वैध उत्पाद को प्रचारित किया जाता है। शराब और तंबाकू से जुड़े ब्रांडों के मामले में भी यह तरीका चर्चा में रहा है। हालांकि, हर इलायची, पानी या दूसरे ब्रांड-विस्तार वाले विज्ञापन को स्वतः सरोगेट विज्ञापन मानना कानूनी रूप से सही नहीं है; वास्तविक स्थिति विज्ञापन की सामग्री और नियामकीय जांच पर निर्भर करती है।
कारोबार का आकार भी छोटा नहीं है। IMARC के अनुसार भारत का पान मसाला बाजार 2025 में करीब 48,455.9 करोड़ रुपये का था और 2034 तक इसके 67,034.8 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। ऐसे में ब्रांड की पहचान बनाए रखने के लिए किए जाने वाले विज्ञापनों और सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट पर नियामकों की नजर लगातार बनी हुई है।
राष्ट्रपति की अपील के बाद बहस सिर्फ सितारों की जिम्मेदारी तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह सवाल भी सामने है कि स्वास्थ्य पर असर डालने वाले उत्पादों के प्रचार को रोकने के लिए मौजूदा नियम और उनकी निगरानी कितनी प्रभावी हैं।

सरोगेट विज्ञापन पर बड़ा सवाल: ब्रांड याद रहे या उत्पाद? सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट पर कार्रवाई कितनी असरदार
नई दिल्ली। सरोगेट विज्ञापन को लेकर बहस अब केवल नियमों की तकनीकी व्याख्या तक सीमित नहीं रही है। सवाल यह है कि जब किसी वैध उत्पाद के विज्ञापन के जरिए दर्शकों के सामने किसी तंबाकू या शराब ब्रांड की पहचान बार-बार आती है, तो उसका वास्तविक व्यावसायिक प्रभाव क्या होता है। यही वजह है कि विज्ञापन में दिखाए जाने वाले उत्पाद की वास्तविक बिक्री, उपलब्धता और उसकी प्रस्तुति की जांच को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
उपभोक्ता के लिए भी यह समझना जरूरी है कि किसी सेलिब्रिटी की मौजूदगी या आकर्षक विज्ञापन किसी उत्पाद को स्वास्थ्यवर्धक या सुरक्षित साबित नहीं करता। वहीं, विज्ञापन करने वाली हस्तियों के लिए भी ब्रांड और उत्पाद की प्रकृति की जानकारी लेना जिम्मेदारी का हिस्सा है।
सेलिब्रिटी पर कार्रवाई का मुद्दा भी इस बहस में अहम है। अमिताभ बच्चन ने पहले पान मसाला ब्रांड के विज्ञापन से खुद को अलग कर लिया था। वहीं, विमल इलायची के विज्ञापन को लेकर महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को नोटिस जारी किए थे। हालांकि, नोटिस जारी होना अपने आप में किसी कानूनी दोष का अंतिम निर्धारण नहीं है। मामले में आगे की कार्रवाई और उसके नतीजे अलग विषय हैं।
सरोगेट विज्ञापन पर विवाद का मूल सवाल यही है कि क्या विज्ञापन में दिखाया जा रहा वैध उत्पाद ही वास्तविक रूप से बेचा और प्रचारित किया जा रहा है, या उसके जरिए किसी दूसरे उत्पाद की ब्रांड पहचान को मजबूत किया जा रहा है? इसीलिए विशेषज्ञों की बहस अब स्पष्ट नियम, पारदर्शी विज्ञापन और नियमों के समान अनुपालन पर केंद्रित है।
पान मसाला से शराब तक हजारों करोड़ का बाजार, राष्ट्रपति की नसीहत के बीच कारोबार और विज्ञापन पर नजर
नई दिल्ली। पान मसाला और शराब भारत के बड़े उपभोक्ता बाजारों में शामिल हैं, लेकिन दोनों के बाजार का आकार अलग-अलग रिपोर्टों और गणना के तरीकों के कारण बदलता रहता है। ताजा बाजार अनुमान के मुताबिक भारत में पान मसाला बाजार का आकार 2025 में करीब 48,455 करोड़ रुपये रहा। IMARC के अनुसार यह बाजार 2034 तक बढ़कर करीब 67,035 करोड़ रुपये पहुंच सकता है।
यहां पान मसाला और तंबाकूयुक्त गुटखे को एक ही श्रेणी मानना सही नहीं होगा। दोनों की संरचना और नियामकीय स्थिति अलग हो सकती है। तंबाकू और निकोटिन वाले उत्पादों पर केंद्र तथा राज्यों के अलग-अलग नियम लागू होते हैं, जबकि शराब का नियमन मुख्य रूप से राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है।
शराब का बाजार भी बेहद बड़ा है। बाजार आंकड़ों के एक अनुमान के अनुसार भारत में मादक पेय उद्योग का 2024 का राजस्व करीब 52.7 अरब डॉलर रहा। इस आंकड़े को बाजार का राजस्व समझना चाहिए, इसे सरकार की आबकारी कर आय नहीं माना जा सकता। बीयर, स्पिरिट, वाइन और अन्य श्रेणियों को शामिल करने के आधार पर बाजार के आंकड़ों में अंतर आ सकता है।
विज्ञापन पर राष्ट्रपति की नजर
बड़े कारोबार के बीच इन उत्पादों के प्रचार और सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट पर भी बहस जारी है। 22 सितंबर को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने फिल्म जगत से स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देने और स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह पदार्थों का प्रचार करने से बचने की अपील की। उन्होंने कलाकारों के बच्चों और युवाओं पर पड़ने वाले प्रभाव का भी उल्लेख किया।
ऐसे में पान मसाला और शराब जैसे बड़े बाजारों के साथ जुड़ी ब्रांडिंग, सरोगेट विज्ञापन और सेलिब्रिटी प्रचार की निगरानी आने वाले समय में कारोबार और विज्ञापन उद्योग दोनों के लिए अहम मुद्दा बनी रह सकती है।
विवादित विज्ञापनों पर तुरंत रोक क्यों नहीं लगती?
नई दिल्ली। सरोगेट विज्ञापन के मामलों में कार्रवाई सीधी नहीं होती। कंपनियां अक्सर तर्क देती हैं कि वे प्रतिबंधित उत्पाद के बजाय किसी वैध ब्रांड एक्सटेंशन का प्रचार कर रही हैं। ऐसे में नियामक को विज्ञापन की भाषा, पैकेजिंग, बाजार में उत्पाद की उपलब्धता और ब्रांड की पहचान जैसे पहलुओं की जांच करनी पड़ती है।
किस कानून के तहत कार्रवाई होगी, यह विज्ञापन के माध्यम और संबंधित उत्पाद के नियमों पर भी निर्भर करता है। नियामक नोटिस जारी कर जवाब मांग सकता है, लेकिन नोटिस को अंतिम दोष-निर्णय नहीं माना जाता। हाल में इलायची के विज्ञापन को लेकर महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन द्वारा शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को नोटिस दिए जाने की खबर सामने आई थी। मामले में नोटिस प्रक्रिया का हिस्सा है, अंतिम फैसला नहीं।
सेलेब्रिटी क्यों बनते हैं ब्रांड का चेहरा? फीस के साथ जिम्मेदारी का सवाल भी
नई दिल्ली। फिल्मी सितारों और मशहूर खिलाड़ियों की लोकप्रियता कंपनियों के लिए बड़ा विज्ञापन माध्यम है। उनकी पहचान और फैन फॉलोइंग के जरिए ब्रांड को कम समय में बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं तक पहुंचने की उम्मीद रहती है। इसके बदले सेलिब्रिटीज को विज्ञापन के लिए बड़ी फीस भी मिलती है।
हालांकि, विवादित उत्पादों से जुड़े विज्ञापनों में कलाकार की जिम्मेदारी को लेकर सवाल उठते हैं। क्या उन्हें उत्पाद की वास्तविक प्रकृति और ब्रांड की पूरी जानकारी थी, अनुबंध में क्या शर्तें थीं और कंपनी ने विज्ञापन को किस रूप में पेश किया—इन सवालों का जवाब हर मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है।
पान मसाला विज्ञापनों को लेकर पहले भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद सामने आ चुके हैं। पियर्स ब्रॉसनन ने 2016 में एक भारतीय पान मसाला विज्ञापन को लेकर विवाद के बाद माफी मांगी थी। उन्होंने कहा था कि उन्हें उत्पाद के बारे में पूरी जानकारी नहीं थी और उन्होंने इसे माउथ फ्रेशनर समझा था।
इलायची से म्यूजिक तक ऐसे चलता है सरोगेट विज्ञापन का खेल
नई दिल्ली। प्रतिबंधित या नियंत्रित उत्पादों के सीधे विज्ञापन पर रोक के बीच कंपनियां कई बार वैध उत्पादों के नाम से ब्रांड की पहचान बनाए रखने की रणनीति अपनाती हैं। पान मसाला और तंबाकू से जुड़े ब्रांडों के विज्ञापनों में इलायची, माउथ फ्रेशनर जैसे उत्पाद दिखाए जाते हैं, जबकि शराब से जुड़े ब्रांड पानी, सोडा, म्यूजिक या मनोरंजन के नाम से प्रचार करते नजर आ सकते हैं।
इन विज्ञापनों में कई बार वास्तविक उत्पाद से ज्यादा ब्रांड का नाम, लोगो, रंग और पैकेजिंग की पहचान दर्शकों के सामने दोहराई जाती है। इससे उपभोक्ता के बीच ब्रांड की पहचान बनी रहने का दावा किया जाता है। हालांकि, किसी विज्ञापन में वैध उत्पाद दिखना मात्र यह साबित नहीं करता कि वह सरोगेट विज्ञापन है। नियामक को विज्ञापन की पूरी प्रस्तुति और संबंधित ब्रांड की बाजार मौजूदगी समेत कई पहलुओं की जांच करनी होती है।
क्या है सरोगेट विज्ञापन? वैध उत्पाद के बहाने ब्रांड पहचान बनाए रखने की रणनीति
नई दिल्ली। सरोगेट विज्ञापन उस रणनीति को कहा जाता है, जिसमें सीधे प्रचार पर पाबंदी या सीमाएं वाले किसी उत्पाद के बजाय उसी ब्रांड से जुड़े दूसरे वैध उत्पाद को विज्ञापन में प्रमुखता दी जाती है। उदाहरण के तौर पर इलायची, सोडा या मिनरल वॉटर को विज्ञापन का चेहरा बनाया जा सकता है, जबकि दर्शक को उससे किसी पान मसाला या शराब ब्रांड की पहचान याद आती है।
हालांकि, हर इलायची या पानी का विज्ञापन सरोगेट विज्ञापन नहीं होता। किसी विज्ञापन की प्रकृति तय करने के लिए ब्रांड का नाम, लोगो, रंग, पैकेजिंग, जिंगल और प्रस्तुति जैसी चीजों को देखा जाता है। इसके साथ यह भी जांचना जरूरी होता है कि विज्ञापन वास्तव में दिखाए गए वैध उत्पाद की बिक्री बढ़ाने के लिए है या किसी प्रतिबंधित उत्पाद की ब्रांड पहचान को आगे बढ़ाने का माध्यम बन रहा है।




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