इंस्टाग्राम को लेकर कहां अटक रहा पाक्सो नियम : 19 लाख चाइल्ड एब्यूज अलर्ट, फिर भी FIR का आंकड़ा छोटा! Instagram मामले में NHRC ने Meta से मांगा जवाब
इंस्टाग्राम पर बच्चों से जुड़े यौन शोषण सामग्री (CSAM) के कथित प्रचार और उसके बाद पुलिस कार्रवाई को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने गंभीर सवाल उठाए हैं। आयोग ने Meta, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर दो सप्ताह में Action Taken Report मांगी है। मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि 2025 में भारत से जुड़े साइबरटिपलाइन अलर्ट की संख्या करीब 19 लाख बताई गई, जबकि FIR और आगे की कार्रवाई का आंकड़ा इसके मुकाबले काफी कम रहा।
पेड विज्ञापनों से Telegram चैनलों तक पहुंच का आरोप
शिकायत में आरोप लगाया गया कि इंस्टाग्राम पर कुछ पेड विज्ञापनों और आपत्तिजनक सर्च टर्म्स के जरिए यूजर्स को ऐसे Telegram चैनलों तक पहुंचाया जा रहा था, जहां बच्चों से संबंधित यौन शोषण सामग्री मौजूद थी। NHRC ने यह जानना चाहा है कि ऐसी जानकारी मिलने के बाद क्या POCSO एक्ट, 2012 के तहत पुलिस को अनिवार्य सूचना दी गई थी।
POCSO की धारा 19 के तहत किसी व्यक्ति को बच्चे के खिलाफ यौन अपराध की जानकारी या आशंका होने पर पुलिस अथवा विशेष किशोर पुलिस इकाई को इसकी सूचना देना जरूरी है। आयोग ने यह भी सवाल उठाया है कि केवल प्लेटफॉर्म की आंतरिक शिकायत व्यवस्था या सरकारी एजेंसियों के साथ बातचीत को इस कानूनी जिम्मेदारी का विकल्प माना जा सकता है या नहीं।
AI भूमिका पर भी उठे सवाल
NHRC के सामने दूसरा बड़ा सवाल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की कानूनी भूमिका को लेकर है। शिकायत में कहा गया है कि Meta के AI आधारित सिस्टम अब केवल यूजर्स की सामग्री होस्ट करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कैप्शन, पोस्टिंग और एंगेजमेंट जैसे पहलुओं को भी प्रभावित करते हैं। ऐसे में आयोग ने पूछा है कि क्या इस तरह की सक्रिय भूमिका के बावजूद प्लेटफॉर्म को केवल ‘इंटरमीडियरी’ के तौर पर कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए।
रिपोर्ट से FIR तक लंबी प्रक्रिया
साइबरटिपलाइन के जरिए मिलने वाले अलर्ट पहले संबंधित अंतरराष्ट्रीय तंत्र से भारतीय एजेंसियों तक पहुंचते हैं और फिर राज्य, जिला तथा स्थानीय पुलिस के स्तर पर भेजे जाते हैं। जांच में अकाउंट डिटेल, IP लॉग, फोन नंबर, ई-मेल और डिजिटल साक्ष्यों की जांच की जाती है। बच्चों की उम्र की पुष्टि और डिजिटल सामग्री के स्रोत की पहचान कई मामलों में जांच को जटिल बना देती है।
NCRB की 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, बच्चों के खिलाफ IT Act के तहत दर्ज 1,238 साइबर अपराध मामलों में से 1,099 मामले बच्चों से संबंधित यौन सामग्री के प्रकाशन या प्रसारण से जुड़े थे। ऐसे मामलों में FIR के बाद भी डिजिटल डिवाइस, IP और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की फॉरेंसिक जांच महत्वपूर्ण होती है।
UNICEF रिपोर्ट ने भी खतरे की गंभीरता बताई
UNICEF की 21 देशों में की गई स्टडी में 12 से 17 वर्ष के करीब 2.1 करोड़ इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले बच्चों को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए। रिपोर्ट के अनुसार, बड़ी संख्या में बच्चों ने ऑनलाइन यौन शोषण या उत्पीड़न का सामना किया, जबकि बहुत कम मामलों की जानकारी अधिकारियों तक पहुंची।
ऐसे में Instagram से जुड़े मामले पर NHRC का नोटिस सिर्फ एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तक सीमित नहीं है। यह सवाल भी सामने है कि लाखों ऑनलाइन अलर्ट को FIR, जांच और दोषियों तक पहुंचाने के लिए मौजूदा सिस्टम कितना प्रभावी है।





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