खरी-अखरी : अगर किसी एक की कुर्सी गई तो पूरा सिस्टम ढह जाएगा और बीजेपी गर्त में चली जाएगी !
यह तो मनाईए कि छात्र अभी अनुशासन में हैं। अगर उन्होंने अनुशासन तोड़ दिया तब क्या होगा ? आप लाठियां डंडे बरसा जरूर रहे हैं। लेकिन सोचिए वह शांति के साथ बैठा है। देख रहा है, समझ रहा है। सोच के रखिएगा जो हकीकत है उससे मुंह मत चुराइए। कितना अनुशासन में विद्यार्थी था, युवा लोग था। उनका भी हाथ पैर था। वो लोग भी हाथ पैर हिला सकता था। नहीं किया लेकिन अनुशासन में रहा। यह तो जबरन वो लोग अपना झड़प ले लोग को पीटने का काम किया लेकिन वो जबाव नहीं दिया। इतना अनुशासन में विद्यार्थी क्यों था क्योंकि वह जानता है कि यह लड़ाई हमारा है। यह लड़ाई राजनीतिक नहीं है। रोजगार की लड़ाई है। एक नाॅन पालिटिकल लड़ाई है। यह कहना है झारखंड में बीजेपी विधायक चंपई सोरेन का जिन्हें बड़े गाजे बाजे के साथ बीजेपी में लाया गया था। जो खुले तौर पर यह बताता है कि चंपई सोरेन जं जी के साथ खड़े हैं और जं जी के साथ जो कुछ भी दिल्ली, बिहार, झारखंड और देश के अन्य हिस्सों में हुआ उसका विरोध कर रहे हैं।
यानी स्थितियां विस्फोटक हो चली हैं। यह परिस्थिति मौजूदा वक्त में सरकार को ऐसी दिशा में ले जाकर खड़ा कर चुकी है जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के बीच कोई संवाद नहीं हो रहा है। दोनों के रास्ते दो अलग अलग दिशाओं में अलग अलग तरीके से समाधान खोजने में व्यस्त हैं। गृहमंत्री अमित शाह की प्राथमिकता जं जी नहीं है उनकी प्राथमिकता परिसीमन है। जो एक बार हो जाए तो दिल्ली की सत्ता चिरस्थायी हो जाए। लेकिन बीजेपी के अजगरी स्वाभाव को विपक्ष अच्छी तरह से जान पहचान चुका है। वह देख समझ चुका है कि बीजेपी ने जिस भी पार्टी का हाथ थामा है उसको निगल लिया है यानी नेस्तनाबूद सा करके रख दिया है। इस दौर में बीजेपी यानी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की साख गिर चुकी है इस कारण से कोई भी बीजेपी का सहयोगी दल उसके निर्णय को मानने के लिए तैयार नहीं है। बीजेपी के सहयोगी दलों के भीतर से भी आवाज उठने लगी है कि अब बीजेपी को अपना चेहरा बदल लेना चाहिए। मुखौटे को हटा देना चाहिए। क्योंकि वह चेहरे और मुखौटे देश के भीतर सवालों के दायरे में हैं। चेहरे और मुखौटे का सीधा मतलब है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह।
बीजेपी के सहयोगी दलों का साफ साफ संदेश है कि आपके जरिए जो कोई भी निर्णय लिया जाएगा और अगर हम उसमें शरीक हो जाएंगे तो फिर हमारी राजनीति कहीं की नहीं रहेगी। आज की स्थिति में बीजेपी के भीतर नंबर एक पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और दूसरे नंबर पर गृहमंत्री अमित शाह हैं। इसके बाद तीसरे से लेकर सौवें नंबर पर कौन है ना तो कोई जानता है और ना ही वह कोई महत्व मायने रखता है। यानी इस गुजराती जोड़ी ने पार्टी के भीतर सेकंड लाइन ही खत्म कर दी है। पार्टी के सौवें नंबर पर खड़ा कार्यकर्ता भी यह सोचने लगा है कि अगर जरा सी भी पहचान मिल गई तो पता चले कल उसको हटा दिया गया है। बीते 12 बरस में सिर्फ और सिर्फ इलेक्ट्रोल पाॅलिसी पर ही काम किया गया है यानी चुनाव में जीत कैसे हासिल की जाए ? जिससे यह मैसेज निकल कर आया कि यही दो चेहरे हैं जो बीजेपी को चुनाव दर चुनाव जीत दिला सकते हैं।
परिसीमन की जो राजनीतिक प्रयोगशालाएं हैं मसलन गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, कुछ हद तक महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल इनमें सीटें बढ़ने के बाद दक्षिणी और अन्य राज्यों में भले ही कुछ सीटें बढ़ जाएं उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। वहा कोई मारामारी माथापच्ची करने की जरूरत नहीं होगी और सत्ता हमेशा के लिए हाथ में आ जाएगी। लेकिन अभी एसआईआर और परिसीमन का काम अधूरा है। इस दौर में राजनीतिक नहीं बल्कि गैर राजनीतिक तौर पर जो मुद्दे उभर कर सामने आ रहे हैं उन मुद्दों का समाधान इस 12 बरस की राजनीतिक सत्ता के पास है ही नहीं।
12 बरस की मोदी शाह की कोर यात्रा की शुरुआत 1980 में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए विश्व हिन्दू परिषद द्वारा शुरू किए गए आंदोलन से हुई थी। इसी बीच जब देश में मंडल कमंडल की राजनीति हावी हुई तो आरएसएस ने यह मान लिया कि अब सब कुछ हमारे अनुकूल होगा। लेकिन कौन जानता था कि संघ प्रचारक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रधान सचिव और संघ प्रचारक चंपत राय आपस में टकराने लगेंगे। मतलब नागपुर और दिल्ली के बीच का टकराव बीजेपी को ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर रहा है जो पीएम मोदी के माथे पर चिंता की लकीरें खींच रहा है।
कल तक पीएमओ देश को चला रहा था लेकिन मंत्री कोई मायने नहीं रखता था। तो संगठन की ओर कदम बढ़ाए गए। लेकिन सवाल है क्या बीजेपी का नया संगठन जं जी से संवाद बना पायेगा ? क्योंकि जिस तरह से सरकार को अल्टीमेटम दिये जा रहे हैं और हर अल्टीमेटम में सरकार घुटनाटेक हो रही है। तो क्या यह इस बात का सबूत है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का जो रसूख था, साख थी डगमगा चुकी है। और इन सबके बीच प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का तालमेल बिखर गया है। यह मैसेज शहरों से निकलकर दूरदराज के इलाक़ों तक जा चुका है। मतलब परिस्थितियां इसी ओर इंगित कर रही हैं कि एकनंबरी और दोनंबरी को बदलना होगा और ना बदलने की हठ ने दोनों नंबरियों के बीच एक मोटी लकीर खींच दी है। यानी वो गुजराती जोड़ी जो कलेक्शन करने में सिध्दहस्त है। जिसका गवर्नेंस पर और संगठन की उस पूंजी पर जिससे ताकत मिलती है उस पर पूरे तरीके से कब्जा है क्या वह भी इस दौर में डगमगा गया है। शायद इसीलिए विपक्ष हावी होता हुआ नजर आ रहा है।
देश के भीतर एक नया परसेप्शन यह बनने लगा है कि अब अगर बीजेपी कोई चुनाव जीतती है तो सवाल उठेगा कि जनता ने तो आपको वोट दिया नहीं है तो फिर आपने कहां से वोट मैनेज कर लिए। यानी सीधे-सीधे चुनाव आयोग निशाने पर आएगा और यह सिध्द हो जाएगा कि बीजेपी जो अभी तक चुनाव दर चुनाव जीत रही थी वह चुनाव आयोग की हेराफेरी वाली कारस्तानी से जीत रही थी। शायद इसीलिए सभी को सांप सा सूंघ गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने आपस में मुंह मोड़ लिया है। आरएसएस ने खामोशी बरती हुई है। संघ अब किसी प्रचारक को बतौर संगठन मंत्री बीजेपी को सम्हालने के लिए भेजेगा या नहीं इस पर सस्पेंश बना हुआ है। यानी जो तय करना है सत्ता खुद तय कर ले और सत्ता की उलझन यह है कि वह क्या और कैसे निर्णय ले क्योंकि इस वक्त कांग्रेस में नरेन्द्र मोदी द्वारा जनता के करोड़ों रुपये खर्च कर नामित हाईब्रीड बछड़ा सांड़ बनकर स्ट्रीट लीडर के तौर पर खड़ा हो गया है।
सारी उलझनों को सुलझाने के लिए सरकार (इस समय सरकार का मतलब केवल नरेन्द्र मोदी और अमित शाह है) समय चाहती है और वह स्ट्रीट लीडर समय देने के लिए तैयार नहीं है। तो क्या इसीलिए मोदी शाह ने खामोश रहना उचित समझा है। वर्ना बोलने पर पालिटिकल/सोशल विस्फोट हो जाएगा और हर वो मुद्दा जो वोट बैंक के आसरे साथ खड़ा है वह खिलाफ होने लगेगा। देश के भीतर छत्रपों की एक लंबी कतार है लेकिन किसी में इतना माद्दा नहीं है कि वह काॅकरोच जनता पार्टी फाउंडर अभिजीत दीपके के माफिक मोदी सत्ता को अल्टीमेटम दे सके। और दीपके के अल्टीमेटम का असर यह होता है कि सरकार तत्काल झुक जाती है। इसका मतलब तो यही निकाला जा सकता है कि देश का मिजाज बदल गया है। सरकार को लेकर सत्ता के भीतर से उठ रहे सवालों पर भले ही खामोशी हो लेकिन जनता के भीतर कतई चुप्पी नहीं है। we are not going to back off.
अपनी सत्ता को परिसीमन के आसरे अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए जरूरी है पूरे विपक्ष का सहयोग। लेकिन कोई भी पार्टी बीजेपी के साथ खड़े होने को तैयार नहीं है। अभी तक गृहमंत्री अमित शाह यह मानकर चल रहे थे कि सबकी फाइल तो है गृह मंत्रालय और पीएमओ के पास। लेकिन अब फाइलों का डर भी हवा हवाई होने लगा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस मंत्रीमंडल विस्तार की दिशा में बढ़ना चाह रहे हैं उसमें बीजेपी और सहयोगी दलों के भीतर से ही सवाल उठ रहा है कि मंत्री बनकर क्या करेंगे ? जब पावर कुछ मिलना नहीं है। यही सवाल उन नेताओं के भीतर भी आने लगा है जिनको एनडीए में शामिल करने की जद्दोजहद बीजेपी कर रही है और गाहेबगाहे मोदी और शाह सहलाते रहते हैं। एसआईआर भी एक बहुत बड़ी चुनौती बनकर सामने खड़ी है। अभी भी तकरीबन 22 राज्य बाकी हैं। अगर यह मिशन पूरा नहीं हुआ और एक बार ट्रिगर दबा तो राज्य दर राज्य परिस्थितियां नाजुक होती चली जाएंगी। वह कब उन दो राज्यों में आकर अटक जावे जो प्रयोगशाला के तौर पर देखे जाते हैं और अगर वही ध्वस्त हो गये तब क्या होगा ?
एक तरफ चंदा चोरी के जरिए देश के भीतर जो मंदिर थे उसको टूरिज्म में कन्वर्ट करके उसके ईर्द गिर्द बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर और उसकी कमाई पर जो गुजरात लाॅबी का कब्जा होता चला गया। यह ठीक उसी तर्ज पर हुआ जैसे पहले पालिटिकल रैलियों के दौरान बीजेपी वर्कस का हुआ करता था । लेकिन इस दौर में सब कुछ सिमटता चला गया। बात आस्था से होते हुए कमाई पर कब्जा करने के लिए दानपात्र को ही अपने कब्जे में लेने की लड़ाई होने लगी। दूसरी तरफ करप्शन को सेंट्रलाइज कर लिया गया। एनओसी के जरिए पालिटिकल पूंजी पार्टी के पास कैसे आएगी। लेकिन पार्टी का मतलब जब एक दो शख्स हो जाय और सारी चीजें वहीं सिमटती चली जाए और जब एक झटके में जनता ने सवाल खड़े करने शुरू कर दिए तो सत्ता के हलक से जुबान हो गायब हो गई। क्या यही वह संकट है जिससे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के बीच संवाद भी बंद हो चला है। कोई समाधान दिखाई नहीं दे रहा है। विजन गायब है। 12 बरस से प्रोपेगेंडा और भ्रामक प्रचार के जरिए टैक्स पेयरों के अरबों खरबों रुपये खर्च करके अथक प्रयास से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जो औरा बनाया गया था वह धू धू करके जलता हुआ दिखाई देने लगा है।
और अभी इलेक्शन कमीशन का आपरेशन पूरा नहीं हुआ है। एसआईआर कई राज्यों में बाकी है। परिसीमन को लेकर राजनीतिक दलों से सहमति बन नहीं पाई है। चंदा चोरी या कहें चंदा डकैती ने आस्था की उस पूरी धारा को मटियामेट कर दिया है जिसके आसरे हिन्दुत्व का परचम लहराते हुए देश में वोट कबाड़े जाते हैं। जं जी ने सीधे तौर पर गृहमंत्री अमित शाह को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सीजेपी ने दुनिया को बताया कि भारत में तबेले में स्कूल लगते हैं। यानी भारत का एजुकेशन सिस्टम खोखला है। और एजुकेशन को लेकर नौकरी की दिशा में बढ़ते हुए कदमों के बीच सिर्फ और सिर्फ करप्शन है। और इसी बीच जो सवाल आजाद भारत में आज तक नहीं उठा वह भी उठ गया इंटर्नल सिक्युरिटी को लेकर। शायद हिन्दुस्तान के इतिहास में पहली बार हुआ है जब सरकार ने अपने खिलाफ आंदोलन करने की परमीशन खुद आंदोलनकारियों को एयरपोर्ट पर जाकर दी है। इसके बाद उन्हीं आंदोलनकारियों पर पुलिस से पैलेट गन तक चलवाई और जब एफआईआर दर्ज करने की नौबत आई तो उन्हीं पुलिस कर्मियों पर एफआईआर भी दर्ज कर दी गई।
क्या बीजेपी के सामने ऐसी परिस्थिति आकर खड़ी हो गई है जहां उससे ना निगलते बन रहा है ना उगलते बन रहा है। क्योंकि सामने वही दो चेहरे हैं जो निर्णय ले रहे हैं और उन्हीं निर्णयों के आसरे देश चल रहा है। उन्हीं के आसरे चुनावी जीत हासिल की जाती है। अगर एक झटके में किसी एक की कुर्सी गई तो पूरा सिस्टम ढह जाएगा और बीजेपी गर्त में चली जाएगी। मसला इस वक्त ना तो सिर्फ छात्रों का है ना ही सिर्फ एजुकेशन का है। मसला तो जंतर-मंतर पर घायल हुई प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उस पूरी छबि का है जिसे टेक्नोलॉजी के जरिए या कहें सोशल मीडिया के जरिए पूरी दुनिया ने देख लिया है ।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार



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