तुम सिर्फ़ गुलाम पत्रकार हो… 2014 की आज़ादी के बाद…?
व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन
पत्रकार बंधुओं, अगर अभी भी आपको लगता है कि आप लोकतंत्र के चौथे स्तंभ हैं, तो कृपया यह भ्रम तुरंत छोड़ दीजिए। भ्रम जितनी जल्दी टूट जाए, उतना अच्छा रहता है। क्योंकि आजकल भ्रम पालना सबसे महँगा शौक है। पेट्रोल महँगा है, गैस महँगी है, दाल महँगी है, लेकिन सबसे महँगा अगर कुछ है तो वह है स्वतंत्र पत्रकार होने का भ्रम।
कभी पत्रकार को देखकर लोग कहते थे “लो, मीडिया आ गया, अब न्याय मिलेगा।” आज कहते हैं “भाई, पहले बता देना किस चैनल से हो और किस लाइन के हो?” पत्रकार की पहचान अब उसकी खबर से नहीं, उसकी विचारधारा से तय की जाती है। कलम बाद में देखी जाती है, झुकाव पहले देखा जाता है। मानो पत्रकार नहीं, चुनाव लड़ने आया प्रत्याशी हो।
2014 के बाद देश में परिवर्तन का ऐसा महायज्ञ शुरू हुआ कि बहुत कुछ बदल गया। रेलवे स्टेशन वही रहे, रेल वही रही, प्लेटफॉर्म वही रहे, लेकिन पत्रकार की रियायत चली गई। सड़क वही रही, टोल प्लाज़ा वही रहे, लेकिन टोल छूट चली गई। बचा क्या? गले में लटकता एक कार्ड, जिसे देखकर सुरक्षा गार्ड मुस्कुरा देता है और कहता है “मोबाइल जमा कराइए और जल्दी बाहर आइए।
“कभी यह कार्ड सम्मान का प्रतीक था, आज प्रवेश-पास भर रह गया है। कुछ पत्रकार मज़ाक में कहते हैं कि इसकी असली कीमत तब समझ आती है जब किसी खबर के कारण पुलिस थाने जाना पड़ जाए। कम-से-कम परिचय देने में सुविधा रहती है कि “साहब, पेशा पत्रकारिता है।
“लेकिन गलती हमारी भी है। हमने सुविधाओं को सम्मान समझ लिया और सम्मान को सत्ता की कृपा। पत्रकार का सम्मान सरकार नहीं देती, उसकी विश्वसनीयता देती है। लेकिन विश्वसनीयता बची कहाँ? उसे तो हमने टीआरपी, क्लिक, विज्ञापन और राजनीतिक खेमों में बाँट दिया।
आज मीडिया दो हिस्सों में बँटा नहीं है, कई टुकड़ों में बँट चुका है। कोई सत्ता का मीडिया है, कोई विपक्ष का मीडिया है, कोई कॉरपोरेट का मीडिया है और कुछ बेचारे अभी भी जनता का मीडिया बनने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी हालत उस छात्र जैसी है जो परीक्षा में ईमानदारी से लिखता है और परिणाम आने पर सबसे पीछे रह जाता है।
सरकारों को भी अब पुराने जमाने वाले पत्रकार पसंद नहीं आते। वे पत्रकार जो फाइलें खंगालते थे, दस्तावेज़ पढ़ते थे, आरटीआई लगाते थे, गाँवों में घूमते थे, रातभर जागकर खबर लिखते थे। अब पसंद वह पत्रकार है जो प्रेस नोट को खबर बना दे, भाषण को विश्लेषण बना दे और उद्घाटन को ऐतिहासिक उपलब्धि घोषित कर दे।
सवाल पूछना अब पत्रकारिता का नहीं, जोखिम का विषय हो गया है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में कई बार सवाल से ज़्यादा सवाल पूछने वाले का चेहरा याद रखा जाता है। और अगर वही पत्रकार अगली बार किसी कार्यक्रम में न दिखे तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र ने फिर एक सवाल कम कर दिया।
कहते हैं मीडिया स्वतंत्र है। बिल्कुल है। इतनी स्वतंत्र कि हर शाम यह तय करने के लिए स्वतंत्र है कि किस खबर को पहले दबाना है और किसे बाद में। इतनी स्वतंत्र कि बहस का विषय भी वही होगा जो सत्ता और बाज़ार दोनों को स्वीकार हो। किसान, मज़दूर, बेरोज़गार, छोटे व्यापारी, गाँव की टूटी सड़क, अस्पताल की बदहाली ये सब स्वतंत्रता की सूची में अक्सर नीचे चले जाते हैं।
छोटे शहरों का पत्रकार सबसे बड़ा मज़क है। सुबह वह अपने पैसे से पेट्रोल भराता है। दोपहर में अपने मोबाइल से वीडियो शूट करता है। शाम को खबर लिखता है। रात को संपादक कहता है “बहुत अच्छी खबर है।” महीने के अंत में वही संपादक कहता है “अभी संस्था की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है।” पत्रकारिता मिशन है यह वाक्य सबसे ज़्यादा उसी पत्रकार को सुनाया जाता है, जिसे वेतन समय पर नहीं मिलता।
उधर मीडिया मालिकों की गाड़ियाँ बदलती रहती हैं, दफ़्तर बड़े होते रहते हैं, विज्ञापन बढ़ते रहते हैं और इधर पत्रकार की मोटरसाइकिल की किस्त तक अटक जाती है। फिर भी मंच से कहा जाता है “आप लोकतंत्र के प्रहरी हैं।”
प्रहरी! कितना सुंदर शब्द है। फर्क सिर्फ़ इतना है कि इस प्रहरी के हाथ में बंदूक नहीं, कलम है और उसी कलम की स्याही पर सबसे पहले नियंत्रण की कोशिश होती है।
पत्रकारिता का संकट केवल सरकार नहीं है। संकट यह भी है कि पत्रकारों ने भी धीरे-धीरे अपने पेशे से समझौते करना सीख लिया। सुविधा के बदले सवाल छोड़े गए। पहुँच के बदले दूरी छोड़ी गई। फोटो के बदले तथ्य छोड़े गए। और जब यह सब छोड़ दिया गया तो बचा क्या? सिर्फ़ माइक्रोफोन।
आजकल माइक्रोफोन बहुत हैं, लेकिन आवाज़ कम है। कैमरे बहुत हैं, लेकिन नज़र कम है। स्टूडियो बहुत बड़े हैं, लेकिन हिम्मत छोटी होती जा रही है।
सबसे खतरनाक वह दौर नहीं होता जब सरकार सेंसर लगाती है। सबसे खतरनाक वह दौर होता है जब पत्रकार स्वयं अपनी कलम पर सेंसर लगा लेता है। जब वह खबर लिखने से पहले सोचता है कि किसकी नाराज़गी मोल लेनी पड़ेगी। जब वह सच को इसलिए छोड़ देता है क्योंकि विज्ञापन चला जाएगा, पहुँच खत्म हो जाएगी या नौकरी चली जाएगी।
यहीं से गुलामी शुरू होती है।
गुलामी हमेशा हथकड़ी पहनाकर नहीं कराई जाती। कभी-कभी सुविधाओं, भय, लालच और चुप्पी से भी कराई जाती है। आदमी चलता-फिरता रहता है, लेकिन भीतर से आज़ाद नहीं रहता।
मेरे साथी पत्रकारों, अगर तुम्हारी कलम सत्ता के लिए है तो तुम लेखक हो सकते हो, प्रवक्ता हो सकते हो, प्रचारक हो सकते हो, लेकिन पत्रकार नहीं। पत्रकार की निष्ठा किसी दल, नेता, उद्योगपति या विचारधारा से पहले जनता के प्रति होती है। उसका धर्म प्रश्न पूछना है, उत्तर लिखना नहीं।
आज अगर पत्रकार अपनी भूमिका भूल जाएगा तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी हार होगी। क्योंकि अदालत तब जागती है जब मुकदमा पहुँचता है, संसद तब चलती है जब सत्र होता है, लेकिन पत्रकारिता हर दिन जनता और सत्ता के बीच खड़ी रहती है।
इसलिए याद रखिए, पत्रकारिता की सबसे बड़ी सुविधा रेल पास नहीं, टोल छूट नहीं, सरकारी कार्ड नहीं और न ही किसी मंत्री के साथ खिंचवाई गई तस्वीर है। उसकी सबसे बड़ी सुविधा है निर्भीक होकर सच लिख पाने की आज़ादी। जिस दिन यह आज़ादी बची रहेगी, उस दिन पत्रकार भी बचेगा और लोकतंत्र भी।
लेकिन जिस दिन पत्रकार स्वयं यह मान लेगा कि उसका काम केवल सत्ता की प्रशंसा करना है, उस दिन इतिहास बहुत छोटा-सा वाक्य लिखेगा
“कलम किसी ने छीनी नहीं थी, उसने स्वयं लिखना छोड़ दिया था।”



Leave a Reply
Want to join the discussion?Feel free to contribute!