खरी-अखरी : क्या समय आ गया है छात्र जोड़ो यात्रा निकालने का ?
विपक्ष भी देश के उन छात्रों के बीच जाकर खड़ा हो गया है जो फेसलेस हैं
सभी सोच रहे हैं कि मौका मिले तो दबोच लें। लेकिन मौका मिलेगा कैसे ? सवाल है – – यह देश है किसका ? सत्ता का। बिल्कुल नहीं। क्या देश सत्ता को इशारों पर चलाने वालों का है ? बिल्कुल नहीं। क्या देश उनका है जिन्होंने बीते 12 बरस सत्ता को बनाए रखने के लिए बहुत स्टेक लगाए और पाया ? बिल्कुल नहीं। यह देश तो उस भविष्य का है जिस भविष्य को बनाने के लिए वही छात्र सड़कों पर थे जिसकी रिपोर्ट सरकार के हाथ पांव फुला रही है। तो फिर सवाल यही है कि अमित शाह की गृहमंत्री वाली कुर्सी जाएगी या नहीं जाएगी ? कुर्सी जाने या नहीं जाने के पहले अमित शाह बतौर गृहमंत्री अपनी मुट्ठी में कैद ईडी, आईटी, सीबीआई, सीआरपीएफ, रैपिड एक्शन फोर्स, दिल्ली पुलिस आदि के जरिए कोई कार्रवाई करेंगे या नहीं करेंगे ? शायद कुछ नहीं कर सकते ! क्योंकि एक ऐसी परिस्थिति के बीच देश आकर खड़ा हो गया है जिसको समझ बूझ तो देश का जं जी रहा है और उसकी महक जेनुल्फा या कहें अल्फा तक जाकर खड़ी हो गई है। यानी देश के देश के छठवीं से लेकर आठवीं तक के बच्चे जो तकरीबन 6 करोड़ 50 लाख हैं और इसमें तकरीबन 38 करोड़ जं जी को भी जोड़ लिया जाए और यदि इनकी छात्र जोड़ो यात्रा शुरू हो गई तो क्या देश के भीतर पालिटिकल रिफार्म्स की स्थिति नहीं आ जाएगी ? निश्चित तौर पर आएगी और फिर इन्हीं छात्रों के बीच में ही निकलेगा प्राइम मिनिस्टर, होम मिनिस्टर, फाइनेंस मिनिस्टर, एज्युकेशन मिनिस्टर, लाॅ मिनिस्टर………. ।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का पार्लियामेंट की जगह इंस्ट्राग्राम पर मौजूद रहना संभावनाओं की जगह कुशंकाओं यानी आशंकाओं को पैदा करता है। खास तौर पर उस आशंका को जिसका जिक्र देश में हो रहा है कि अब समय आ गया है कि देश में छात्र जोड़ो यात्रा शुरू हो जानी चाहिए। 2014 के मुकाबले एज्युकेशन लोन में लगभग बारह सौ फीसदी इजाफा हो गया है। यानी एज्युकेशन के लिए भारत छोड़ कर जाने वाले छात्रों की संख्या बढ़ गई है। देश की करेंसी की ताकत लगातार कमजोर होती जा रही है जिसे थामने के लिए चंद रोज पहले ही रिजर्व बैंक ने फिर से सात बिलियन डॉलर बेचे हैं। देश का युवा इससे अनभिज्ञ नहीं है। दुनिया भी अब जं जी के जरिए ही भारत को देख रही है। वह जानना चाहती है कि भारत के भीतर जो सोशल ट्रांसफार्मेशन का सवाल एज्युकेशन को लेकर किया जा रहा है क्या वह देश के पालिटिकल सिचुएशन को बदल सकता है ? उस पालिटिकल सिचुएशन को जिसके भीतर इस वक्त पार्लियामेंट कोई मायने नहीं रखती है।
स्टूडेंट्स अपने तौर पर खड़े हैं और पालिटिक्स स्टूडेंट्स के जरिए अपने रास्तों को तलाशना चाहती है। यानी छात्रों की मौजूदगी देश को पालिटिकल ट्रांसफार्मेशन की दिशा में ले जाएगी और लोग देखते रहेंगे। इस दौर में पार्लियामेंट का ना होना, पालिटिक्स का बेमानी लगना, और इस सबके बीच इस सवाल का खड़ा हो जाना कि सत्ता में बैठा सबसे ताकतवर शख्स क्या देश के किसी भी हिस्से में लाठी, डंडा, गोली चलवा सकता है ? AK-47 निकल आई और सिवान ने उस पर मोहर भी लगा दी। दिल्ली में पैट गन चल गई और सुप्रीम कोर्ट ने उसे जायज भी ठहरा दिया। यानी दिल्ली और सिवान के भीतर छात्रों का मरना, घायल होना सब कुछ जायज है ! ब्यूरोक्रेसी के कोई सरोकार देश के साथ हैं नहीं ! सब कुछ अपनी जिंदगी, अपनी नौकरी, अपना वेतन, अपना घर, सरकारी सुख सुविधा के भीतर जाकर समा गया है। मीडिया के भीतर से भी जन सरोकार गायब हो चुके हैं। वह तो भोंपू की भांति उसी राग को अलापता रहता है जो सरकार उसे अलापने के लिए कहती है। जिसे सुनना लगभग लगभग जनता बंद कर चुकी है।
यानी एक झटके में टेलीविज़न गायब हो गया, अखबारों में आर्टिकल ना के बराबर लिखे जा रहे हैं। अल्टरनेटिव सोच रखने वाला लिटरेरी आस्पेक्ट छू मन्तर हो गया है। यानी मीडिया गायब, नौकरशाही गायब, पालिटीशियन गायब, इंस्टीटयूशन गायब, सुप्रीम कोर्ट कुछ कहने की स्थिति में है नहीं, इलेक्शन कमीशन की अब कोई जरूरत नहीं रह गई है । किसी पालिटिकल पार्टी के आव्हान के बगैर देश के लगभग सभी राज्यों के अलग अलग शहरों, कस्बों, गांवों से भारी तादाद में छात्रों का समूह निकल कर दिल्ली के जंतर-मंतर पर जमा होता चला गया और मोदी सरकार ने छात्रों के मुद्दों को अनदेखा, अनसुना करते हुए मानवता की सभी सीमाओं को रौंदते हुए छात्रों (जं जी से लेकर अल्फा तक) पर अमानवीय अत्याचार करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।
पार्लियामेंट के भीतर मुद्दे उठते हैं, उन पर बहस होती है और फिर सत्ता पार्लियामेंट को अपने अनुकूल चलाने लगती है। यह खेल बरसों बरस से खेला जा रहा है और बीते बारह बरस से इस खेल का नग्न रूप हर छात्र ने अपनी नंगी आंखों देखा है। उसने देखा है कि सत्तापक्ष कैसे विपक्ष के दोपायों की खरीद फरोख्त कर सरकार गिराता है, कैसे विपक्षी पार्टियों के भृष्ट, बिकाऊ नेताओं को साम दाम करके तोड़ता है। कैसे राज्यपाल दिल्ली दरबार के ऐजेंट बनकर संवैधानिक मर्यादाओं का चीरहरण करते हैं। वह इससे भी भलीभांति परिचित हो गया चुका है कि क्यों और कैसे चुनाव आयोग तथा सुप्रीम कोर्ट के फैसले सत्तानुकूल होते हैं।
छात्र जब अपनी सौ प्रतिशत जायज मांगो को लेकर मोदी सत्ता की ढ्योढी पर आया तो सरकार के पास ऐसा कोई समाधान नहीं था सिवाय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के। लेकिन उसके पहले गृहमंत्री अमित शाह के अधीन आने वाली ऐजेंसियों ने छात्रों के साथ क्रूरतम अमानवीयता का नंगापन दिखाया उसके बाद अमित शाह को गृहमंत्री की कुर्सी से हटाने की मांग छात्रों से लेकर विपक्ष तक करने लगा है। नरेन्द्र मोदी की तरह ही टैक्स पेयर्स के पैसे से अमित शाह का भी औरा बनाया गया है तो क्या वह भी अब एक झटके में ढ़ह जाएगा या फिर क्रूरता के दम पर उसे बरकरार रखने की कोशिश की जाएगी ! वैसे इस दौर में विपक्ष के किसी नेता की कोई हैसियत रह नहीं गई है। अब तो विपक्ष को अपनी राजनीति साधने के लिए हर मुद्दे को लेकर छात्रों के पीछे खड़ा होना पड़ रहा है। कारण भी साफ है कि बीते बारह बरस से जमीन आसमान एक करने के बाद भी वह मोदी सरकार के मंत्री तो दूर संतरी तक का बाल बांका नहीं कर सका है जो जं जी ने चंद दिनों के भीतर करके दिखा दिया।
पेपर लीक को लेकर कानून बनवाने की कवायद करने के बावजूद मोदी सरकार आखिर डरी हुई क्यों दिख रही है ? शायद उसका कारण यह है कि छात्र जानना चाहते हैं कि पार्लियामेंट में पेपर लीक बिल पेश होने से लेकर पास होने तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की पार्लियामेंट के भीतर गैरमौजूदगी क्यों थी ? और उसका जवाब सरकार में किसी के पास नहीं है ! यानी साफ है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की नजर में इस बिल का कोई महत्व नहीं है। ये सिर्फ और सिर्फ इंस्टाग्राम पर रील बनाकर संवेदनशीलता का दिखावा कर रहे थे। पेपर लीक बिल पास होने के साथ ही झारखंड और उडीसा से पेपर लीक होने की खबर आ गई। तो क्या अब उन छात्रों को छात्र जोड़ो यात्रा शुरू करनी होगी जो फेसलेस हैं ?
वैसे भी देखा जाए तो झारखंड बंगाल और बिहार से सटा हुआ है, बिहार उत्तर प्रदेश से तो उत्तर प्रदेश दिल्ली से लगा हुआ है। दिल्ली हरियाणा से तो हरियाणा राजस्थान से, राजस्थान मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से सटा हुआ है। महाराष्ट्र के साथ आंध्रप्रदेश और यही कड़ी तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरलम तक जुड़ती चली जाती है। और अगर यह कड़ी सही तौर पर जुड़ती चली गई तो यह ना तो पालिटिकल मूवमेंट होगा ना ही चुनाव के लिए आंदोलन। दरअसल यह उस सत्ता के सामने जवाबदेही और जिम्मेदारी को लेकर सबसे बड़ी सवालिया चुनौती होगी जिसको अभी तक सत्ता की ताकत के जरिए अनदेखा किया गया और उस ताकत का नंगा और नीचतापूर्ण प्रदर्शन जंतर-मंतर पर 20 जुलाई 2026 को ना केवल देश ने बल्कि पूरी दुनिया ने देखा।
जिस कमिश्नर ने यह कहते हुए पुलिसिया जुल्म ढाने से इंकार कर दिया कि यह ठीक नहीं है मगरूर सत्ता ने उसे हटाकर नया कमिश्नर नियुक्त कर दिया और उसने नंगा नाच नाचने में तनिक सी भी देरी नहीं की। वैसे भी यह तो दिल्ली है मणिपुर थोड़े है। दिल्ली से जो मैसेज निकल कर देशभर में गया है उसने भी मोदी सरकार की सांसे भारी कर दी है। क्योंकि वह जान गई है कि अगर देशभर के फेसलेस चेहरे जुड़ते चले गए तो मुश्किल होगी। शायद इसीलिए दिल्ली दरबार स्ट्रेटेजी बना रहा है। लंबा वक्त कैसे काटा जाए ? पार्लियामेंट से अमित शाह को कैसे दूर रखा जाए ? खबर तो यह भी निकल कर आ रही है कि सीजेआई जस्टिस सूर्य कांत के कार्यक्रमों को यह सोच कर रद्द करवाया जा रहा है कि वे फिर कहीं कुछ ऊलजलूल बोलकर नई मुसीबत ना खड़ी कर दें। क्योंकि काॅकरोच वाली फजीहत तो उन्हीं की खड़ी की हुई है। यानी सरकार ने अपनी बिसात के वजीर, प्यादे सभी गायब कर दिए हैं।
देशी मीडिया अंध भक्ति में डूबे होने के कारण अभी भी यह समझने को तैयार नहीं है कि देश के भीतर एक लावा था जिसका कार्क खुल चुका है। वह लावा देश के अलग अलग जगहों पर निकलने लगा है। यह लावा कोई पालिटिकल ईश्यू के जरिए नहीं निकल रहा है बल्कि यह उस युवा की अपनी सोच का लावा है जिसको यह अह्सास हो चला है कि अब नहीं तो फिर कब ? शायद यह परिस्थिति भी मोदी सरकार को भयभीत कर रही है।
ऐसा क्यों हुआ कि सुप्रीम कोर्ट में दो जजों की बैंच दूसरे मामले की सुनवाई के दौरान मोदी सरकार के नुमाइंदे अटार्नी जनरल से पूछ बैठी कि “चुनाव आयुक्त की नियुक्ति सरकार क्यों करती है ? उसमें सुप्रीम कोर्ट की भागीदारी क्यों नहीं होनी चाहिए ? सरकारी वकील भला इसके अलावा और क्या जवाब देता “आप प्रधानमंत्री को शक की निगाहों से देख रहे हैं”।
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार



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