धरना-प्रदर्शन में पुलिस ने रोका या गिरफ्तार किया? जानिए क्या कहते हैं संविधान और कानून
शांतिपूर्ण प्रदर्शन मौलिक अधिकार, लेकिन कानून-व्यवस्था बिगड़ने पर प्रशासन को कार्रवाई का अधिकार; हिरासत और गिरफ्तारी में भी नागरिकों के संवैधानिक अधिकार रहते हैं सुरक्षित
नई दिल्ली। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को अपनी बात शांतिपूर्ण तरीके से रखने और सरकार की नीतियों के खिलाफ विरोध दर्ज कराने का अधिकार प्राप्त है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित की गई है, जिसके दायरे में शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन और सभा भी शामिल हैं। हालांकि यह अधिकार पूर्ण नहीं है और सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सरकार आवश्यक परिस्थितियों में उचित प्रतिबंध भी लगा सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहता है तो उसे लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। लेकिन सड़क जाम करना, हिंसा, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना या सुरक्षा बलों पर हमला जैसी गतिविधियां कानून के दायरे में अपराध मानी जाती हैं। ऐसे मामलों में पुलिस और प्रशासन को हस्तक्षेप करने तथा आवश्यक कार्रवाई करने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट भी अपने विभिन्न फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि विरोध प्रदर्शन का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे आम जनता के अधिकार और दैनिक जीवन बाधित नहीं होने चाहिए।
यदि किसी क्षेत्र में शांति भंग होने की आशंका हो तो कार्यपालक मजिस्ट्रेट भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 लागू कर सकते हैं। इस आदेश के उल्लंघन पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223 के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है और परिस्थितियों के अनुसार पुलिस हिरासत या गिरफ्तारी की कार्रवाई कर सकती है।
हालांकि कानून यह भी सुनिश्चित करता है कि हिरासत या गिरफ्तारी के दौरान नागरिकों के मौलिक अधिकार समाप्त नहीं होते। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक व्यक्ति को गरिमा के साथ जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। पुलिस को गिरफ्तारी का कारण बताना अनिवार्य है तथा गिरफ्तार व्यक्ति को वकील से संपर्क करने और अपने परिजनों को सूचना देने का अधिकार होता है। सुप्रीम कोर्ट के डी.के. बसु फैसले में गिरफ्तारी और हिरासत को लेकर विस्तृत दिशा-निर्देश भी निर्धारित किए गए हैं, जिनका पालन सभी जांच एजेंसियों के लिए आवश्यक है।
संविधान के अनुसार किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना अनिवार्य है। यदि केवल एहतियातन हिरासत में लिया गया हो तो स्थिति सामान्य होने पर रिहा किया जा सकता है। वहीं, यदि मुकदमा दर्ज होता है तो आगे की प्रक्रिया न्यायालय के माध्यम से चलती है। संबंधित प्रावधानों के तहत कुछ मामलों में जमानत थाने स्तर पर भी संभव होती है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी नागरिक को लगे कि उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है या उसे अवैध रूप से हिरासत में रखा गया है, तो वह संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट तथा अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। लोकतंत्र में अधिकारों के साथ-साथ कानून का पालन करना भी प्रत्येक नागरिक की समान जिम्मेदारी है।




Leave a Reply
Want to join the discussion?Feel free to contribute!