CJP प्रदर्शन में पत्थरबाजी पर क्या लग सकती है BNS की धारा 152? जानिए नए कानून की कानूनी स्थिति
केवल हिंसा या पत्थरबाजी से नहीं बनता ‘देशद्रोह’ का मामला, भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता के खिलाफ मंशा व साक्ष्य साबित होना जरूरी
नई दिल्ली। किसी राजनीतिक प्रदर्शन के दौरान हिंसा या पत्थरबाजी की घटनाओं के बाद अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या ऐसे मामलों में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 152 के तहत कार्रवाई की जा सकती है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इसका उत्तर प्रत्येक मामले के तथ्यों, जांच और उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करता है। केवल प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा या पत्थरबाजी अपने आप धारा 152 को आकर्षित नहीं करती।
नई भारतीय न्याय संहिता (BNS) लागू होने के बाद भारतीय दंड संहिता (IPC) की पूर्व धारा 124A (राजद्रोह) को हटाकर धारा 152 लागू की गई है। यह प्रावधान भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता के विरुद्ध गंभीर कृत्यों, अलगाववाद, सशस्त्र विद्रोह या विध्वंसक गतिविधियों को बढ़ावा देने से संबंधित मामलों के लिए बनाया गया है। कानून के अनुसार अभियोजन पक्ष को अदालत में यह साबित करना होता है कि आरोपी की मंशा या कार्रवाई देश की संप्रभुता अथवा अखंडता को नुकसान पहुंचाने की थी।
कानूनी जानकारों के अनुसार यदि किसी प्रदर्शन में केवल पुलिस पर हमला, पत्थरबाजी, सरकारी संपत्ति को नुकसान या अन्य हिंसक घटनाएं हुई हैं, तो सामान्यतः दंगा, लोकसेवक पर हमला, सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाने, हत्या या हत्या के प्रयास जैसी अन्य आपराधिक धाराएं लागू हो सकती हैं। लेकिन यदि जांच में यह सामने आए कि हिंसक गतिविधियों का उद्देश्य देश की संप्रभुता, एकता या अखंडता को चुनौती देना, सशस्त्र विद्रोह भड़काना या अलगाववादी गतिविधियों को बढ़ावा देना था, तभी BNS की धारा 152 लगाने पर विचार किया जा सकता है।
न्यायपालिका भी अपने विभिन्न निर्णयों में स्पष्ट कर चुकी है कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत संरक्षित अधिकार है। हालांकि हिंसा, पत्थरबाजी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान संवैधानिक संरक्षण के दायरे में नहीं आते और ऐसे मामलों में पुलिस कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी प्रदर्शन में शामिल व्यक्ति को केवल हिंसा के आरोप के आधार पर “देशद्रोही” नहीं माना जा सकता। धारा 152 के तहत कार्रवाई तभी संभव है जब जांच में उसके सभी आवश्यक कानूनी तत्व और मंशा प्रमाणित हों। अंततः यह निर्णय जांच एजेंसियों द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और न्यायालय के मूल्यांकन पर निर्भर करता है।



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