क्या बदलेगा तीन दशक बाद भी चंडीगढ़ मेयर चुनाव का तरीका ? चंडीगढ़ मांग रहा हर साल वाला नहीं, पांच साल वाला मेयर जिसे चुने जनता ना की पार्षद !
चंडीगढ़ नगर निगम चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, शहर में एक पुरानी लेकिन महत्वपूर्ण बहस फिर तेज हो गई है। सवाल यह है कि क्या चंडीगढ़ को हर साल बदलने वाला मेयर चाहिए या फिर देश के अधिकांश नगर निगमों की तरह पांच वर्ष का स्थिर कार्यकाल वाला महापौर? प्रशासनिक अनुभव और विकास कार्यों की गति को देखते हुए यह मुद्दा अब केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सुशासन से भी जुड़ गया है।
चंडीगढ़ नगर निगम की स्थापना 24 मई 1994 को हुई थी। पिछले लगभग तीन दशकों में शहर को 29 मेयर मिल चुके हैं। इस दौरान नगर निगम की सत्ता पर अधिकांश समय भारतीय जनता पार्टी का वर्चस्व रहा, जबकि कांग्रेस भी कई बार मेयर पद तक पहुंची। आम आदमी पार्टी केवल एक बार, वर्ष 2024 में कुलदीप कुमार को मेयर बनाने में सफल रही। लगातार बदलते नेतृत्व के कारण नगर निगम की दीर्घकालिक विकास योजनाएं अक्सर अधूरी रह जाती हैं।
एक वर्ष का कार्यकाल किसी भी मेयर के लिए प्रभावी प्रशासनिक बदलाव लाने के लिहाज से बेहद सीमित माना जाता है। पदभार संभालने के शुरुआती सप्ताह औपचारिक बैठकों, विभागीय समन्वय और योजनाओं की समीक्षा में निकल जाते हैं। वहीं कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनावी प्रक्रिया और प्रशासनिक प्रतिबंधों के चलते निर्णय लेने की गति धीमी पड़ जाती है। परिणामस्वरूप कई परियोजनाएं कागजों तक सीमित रह जाती हैं या उनका श्रेय और जिम्मेदारी तय करना भी मुश्किल हो जाता है।
शहर के कई सामाजिक संगठनों और नागरिकों का मानना है कि यदि मेयर का कार्यकाल पांच वर्ष का हो तो वह स्वच्छता, ट्रैफिक प्रबंधन, जल निकासी, पार्कों के विकास, स्मार्ट सिटी परियोजनाओं और बुनियादी सुविधाओं पर दीर्घकालिक योजना बनाकर उसे पूरा भी कर सकेगा। इससे जवाबदेही भी तय होगी और जनता पांच साल बाद विकास के आधार पर अपने प्रतिनिधि का मूल्यांकन कर सकेगी।
दिसंबर 2026 में प्रस्तावित नगर निगम चुनावों से पहले यह मांग फिर जोर पकड़ रही है कि केंद्र सरकार और संबंधित प्राधिकरण चंडीगढ़ में मेयर के कार्यकाल को लेकर गंभीरता से विचार करें। यदि शहर को तेज, स्थिर और जवाबदेह प्रशासन देना है, तो केवल चेहरे बदलने से नहीं, बल्कि व्यवस्था में बदलाव लाने की आवश्यकता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या चंडीगढ़ को हर साल बदलने वाले महापौर की परंपरा से बाहर निकालकर पांच वर्ष के स्थायी नेतृत्व की दिशा में कोई ठोस पहल होती है।
हालांकि इसको लेकर वर्तमान सांसद मनीष तिवारी लोकसभा में आवाज उठा चुके हैं की चंडीगढ़ को पूर्ण कालिक मेयर की जरूरत है ना कि अंशकालिक मेयर की । भरोसा सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी की तरफ से भी इस बार पत्र व्यवहार केंद्र सरकार से किया जा रहा है । भाजपा से ही जुड़े हुए एक नेताजी ने टेलीफोन लाइन पर बताया कि भाजपा की पूरी कोशिश है कि 5 साल का मेयर अगर नहीं मिले तो कम से कम जो मेरे हो उसका कार्यकाल ढाई साल का तो हो । क्योंकि 5 साल का मेयर अगर चुना जाएगा तो उसे वह सीधे जनता के द्वारा चुना जाएगा ना कि पार्षदों के द्वारा । और अभी तक जो मेयर चुने की प्रक्रिया है वह चुने गए पार्षद मेयर को चुनते हैं ना की जनता ।
अब देखना यह होगा कि दिसंबर 2026 में प्रस्तावित नगर निगम के चुनाव के पहले क्या चंडीगढ़ को पूर्ण कालिक मेयर मिल सकेगा जिसको जनता चुनेगी अथवा ढाई साल का मेयर जिसे पार्षद चुनेंगे या फिर जिस तरीके से परंपरा पिछले तीन दशक से चली आ रही है वहीं परंपरा आगे भी कायम रहेगी।


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