नए सप्ताह में शेयर बाजार की राह आसान नहीं, विदेशी बिकवाली से लेकर वैश्विक तनाव तक पांच बड़े फैक्टर तय करेंगे दिशा
मुंबई। भारतीय शेयर बाजार नए सप्ताह की शुरुआत कई चुनौतियों के बीच करने जा रहा है। पिछले सप्ताह बाजार में उतार-चढ़ाव और दबाव का माहौल देखने को मिला था, जिसके बाद निवेशकों की नजर अब उन प्रमुख कारकों पर टिकी है जो आने वाले दिनों में बाजार की चाल तय कर सकते हैं। विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली, वैश्विक बाजारों में कमजोरी, पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल ऐसे प्रमुख कारक हैं जो निवेशकों की रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं।
शुक्रवार को कारोबार के अंत में प्रमुख सूचकांकों में गिरावट दर्ज की गई। निवेशकों की सतर्कता और वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण बाजार में खरीदारी सीमित रही। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक वैश्विक संकेतों में सुधार नहीं आता और विदेशी निवेशकों की बिकवाली नहीं रुकती, तब तक बाजार में बड़ी तेजी की संभावना सीमित रह सकती है।
सबसे बड़ा दबाव अंतरराष्ट्रीय बाजारों से आ रहा है। अमेरिका के प्रमुख शेयर सूचकांकों में हालिया गिरावट ने वैश्विक निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। मजबूत रोजगार आंकड़ों के बाद यह आशंका गहराई है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती को लेकर जल्दबाजी नहीं करेगा। ऊंची ब्याज दरें वैश्विक निवेशकों को सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर आकर्षित करती हैं, जिससे उभरते बाजारों में पूंजी प्रवाह प्रभावित हो सकता है। इसका असर भारतीय बाजार पर भी देखने को मिल सकता है।
दूसरी ओर भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति भी बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। केंद्रीय बैंक ने नीतिगत दरों को यथावत रखते हुए मुद्रास्फीति और आर्थिक वृद्धि को लेकर संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है। हालांकि महंगाई के अनुमान में बढ़ोतरी और विकास दर के अनुमान में कुछ कमी ने निवेशकों के बीच सतर्कता बढ़ाई है। इसके बावजूद गैर-निवासी भारतीयों और ओवरसीज सिटीजन्स ऑफ इंडिया के लिए निवेश संबंधी नियमों में दी गई राहत को बाजार के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
विदेशी संस्थागत निवेशकों का रुख भी बाजार के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। हाल के दिनों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों में लगातार बिकवाली की है, जिससे बाजार पर दबाव बढ़ा है। हालांकि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने खरीदारी के जरिए कुछ हद तक संतुलन बनाए रखा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विदेशी पूंजी का बहिर्वाह जारी रहा तो बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है।
इसके साथ ही पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव वैश्विक अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों के लिए नई चुनौती बनकर उभरा है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती तनातनी ने ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य या राजनीतिक तनाव सीधे तौर पर कच्चे तेल की कीमतों को प्रभावित करता है। भारत जैसे ऊर्जा आयातक देश के लिए तेल की बढ़ती कीमतें महंगाई और व्यापार घाटे दोनों पर दबाव डाल सकती हैं, जिसका असर शेयर बाजार पर भी पड़ सकता है।
कच्चे तेल के साथ-साथ अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी भी निवेशकों की चिंता बढ़ा रही है। जब बॉन्ड पर रिटर्न बढ़ता है तो निवेशकों का एक वर्ग शेयर बाजार से पैसा निकालकर बॉन्ड में निवेश करना अधिक सुरक्षित मानता है। इससे इक्विटी बाजारों में निवेश प्रवाह प्रभावित होता है और जोखिम वाली परिसंपत्तियों पर दबाव बढ़ता है। हाल के दिनों में अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में आई तेजी को वैश्विक बाजारों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले सप्ताह में निवेशकों को केवल घरेलू आर्थिक संकेतकों पर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर भी बराबर नजर रखनी होगी। मानसून की प्रगति, महंगाई से जुड़े आंकड़े, विदेशी निवेशकों की गतिविधियां, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक बाजारों का प्रदर्शन बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।
बाजार विश्लेषकों के अनुसार फिलहाल भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी स्थिति मजबूत बनी हुई है, लेकिन वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितताओं के कारण निवेशकों को सतर्क रणनीति अपनाने की आवश्यकता है। अल्पकालिक उतार-चढ़ाव के बीच गुणवत्ता वाले शेयरों पर फोकस और जोखिम प्रबंधन निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण रहेगा। नए सप्ताह में बाजार की चाल इन पांच प्रमुख कारकों पर काफी हद तक निर्भर करेगी, जिन पर पूरे निवेशक समुदाय की नजरें टिकी रहेंगी।




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