‘प्री-पेड मृत्यु’—सुविधा के दौर में संवेदनाओं का दिवालियापन
तेजी से भागती आधुनिक जीवनशैली ने इंसान को सुविधा-संपन्न तो बना दिया है, लेकिन क्या इसी के साथ उसने अपनी संवेदनाएं भी गिरवी रख दी हैं? “प्री-पेड मृत्यु” जैसी घटनाएं इसी कड़वी सच्चाई की ओर इशारा करती हैं, जहां रिश्ते अब जिम्मेदारी से ज्यादा औपचारिकता बनते जा रहे हैं।
एक ओर सफलता की ऊंचाइयों को छूता युवा वर्ग है—विदेशी कंपनियों में बड़े पद, महंगी जीवनशैली और समय की लगातार कमी। दूसरी ओर वे माता-पिता हैं, जिन्होंने अपने बच्चों के भविष्य के लिए अपना वर्तमान खपा दिया। लेकिन विडंबना यह है कि वही माता-पिता अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर अकेलेपन और उपेक्षा का सामना करते नजर आते हैं। “प्री-पेड” जैसी सोच, जहां एक पिता अपने अंतिम संस्कार तक की व्यवस्था पहले से कर जाता है ताकि बेटे को असुविधा न हो—यह केवल एक भावुक कथा नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक ढांचे का तीखा आईना है।
आज के समय में प्रोफेशनल कमिटमेंट्स और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं इतनी हावी हो चुकी हैं कि पारिवारिक जिम्मेदारियां पीछे छूटती जा रही हैं। आंकड़ों और सामाजिक रिपोर्ट्स में भी बुजुर्गों की बढ़ती उपेक्षा, अकेलापन और ओल्ड-एज होम्स की संख्या में वृद्धि इसी प्रवृत्ति की पुष्टि करती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आर्थिक सफलता के बदले हम मानवीय रिश्तों की कीमत चुका रहे हैं?
यह भी सच है कि हर व्यक्ति परिस्थितियों से बंधा होता है। काम का दबाव, दूरी और जीवन की व्यस्तताएं वास्तविक चुनौतियां हैं। लेकिन इन सबके बीच अगर माता-पिता के अंतिम समय में भी हम उनके साथ खड़े नहीं हो पा रहे, तो यह केवल समय की कमी नहीं, प्राथमिकताओं का संकट भी है।
“प्री-पेड मृत्यु” की कहानी दरअसल उस भावनात्मक दूरी को उजागर करती है, जो धीरे-धीरे हमारे समाज में सामान्य होती जा रही है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम अपने ही रिश्तों को ‘सुविधा’ के तराजू पर तौलने लगे हैं?
आखिरकार, अंतिम संस्कार की व्यवस्था कोई भी कर सकता है, लेकिन उस पल में साथ खड़े होने की संवेदना और अपनापन किसी एजेंसी से नहीं खरीदा जा सकता। माता-पिता का प्रेम न तो सीमित होता है और न ही उसका कोई विकल्प है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि हम अपने व्यस्त जीवन के बीच रिश्तों के लिए भी समय निकालें—क्योंकि कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जिन्हें न पहले से तय किया जा सकता है और न ही बाद में पूरा किया जा सकता है।
( सत्य घटना पर आधारित , इसलिए जगह का नाम नहीं लिखा जा रहा )
रीतेश माहेश्वरी




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