अंतरराष्ट्रीय खुशी दिवस पर विशेष : डिजिटल भागदौड़ में मन थका, आयुर्वेद दिखा रहा संतुलन का रास्ता
डिजिटल भागदौड़ में मन थका, आयुर्वेद दिखा रहा संतुलन का रास्ता
लेखक : प्रोफेसर सतीश गंधर्व, डीन प्रभारी, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, पंचकूला
भारतीय संस्कृति में खुशी केवल एक भावना नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। स्वस्थ्य रहें, खुश रहें और जीवन को संतुलित तरीके से जीएं, यही आयुर्वेद का मूल मंत्र है, यानी आयुर्वेद में खुशियों की राह छिपी है। आयुर्वेद सिखाता है कि शरीर, मन और आत्मा के बीच संतुलन बनाकर ही जीवन में खुशी हासिल की जा सकती है। इसलिए जरूरी है कि भागदौड़ और डिजिटिलाइजेशन दुनिया की व्यवस्तता से थोड़ा समय अपने लिए जरूर निकालें और अपने स्वास्थ्य तथा मानिसक शांति को महत्ता दें।
आयुष मंत्रालय भारत सरकार के तत्वाधान में कुलपति प्रोफेसर (डॉ.) संजीव शर्मा और डीन प्रोफेसर गुलाब चंद पमनानी के मार्गदर्शन में राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान पंचकूला आयुर्वेद के माध्यम से निरोग जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। योग-ध्यान, आहार-व्यवहार और आयुर्वेद उपचार रोगियों को तनाव, अनिद्रा, अवसाद तथा थकान से मुक्ति दिलाने में असरकारक साबित हो रहा है, क्योंकि जीवन का असली उद्देश्य केवल सफलता या संपत्ति नहीं, बल्कि संतुलित और खुशहाल जीवन है।
डिजिटल क्रांति से हमारा जीवन आसान हो गया है, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने हमें दुनिया के हर कोने से जोड़ दिया है। एक क्लिक पर हम अपने विचार, भावनाएं और अनुभव साझा कर सकते हैं। लेकिन इसी सुविधा के साथ एक चुनौती भी जुड़ी है क्या यह डिजिटल जुड़ाव हमें सच में खुश कर रहा है, या हम केवल आभासी संतुष्टि के जाल में उलझते जा रहे हैं? अंतरराष्ट्रीय खुशी दिवस हमें यह याद दिलाता है कि जीवन की असली दौड़ खुश रहने की है। वर्ष 2026 में इस दिवस की थीम डिजिटल प्रौद्योगिकी और भावनात्मक कल्याण के बीच जटिल संबंधों पर केंद्रित है। यह विषय बेहद प्रासंगिक है, क्योंकि आज का मनुष्य वास्तविक दुनिया से अधिक डिजिटल दुनिया में सक्रिय हो चुका है।
डिजिटल दुनिया में “वर्चुअल कनेक्शन” तो बढ़ रहे हैं, लेकिन “रियल कनेक्शन” कमजोर पड़ते जा रहे हैं। परिवार के बीच बैठकर भी लोग अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त रहते हैं। बातचीत की जगह चैट ने ले ली है और भावनाओं की जगह इमोजी ने। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि हम तकनीक का उपयोग संतुलित और सजग तरीके से करें। प्रतिस्पर्धा, भागदौड़ भरी जीवनशैली, सामाजिक दबाव और डिजिटल जीवन ने इंसान को भीतर से अकेला और असंतुष्ट बना दिया है। ऐसे समय में भारतीय आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति, योग एवं ध्यान जीवन में खुशहाली लाने में कारगर साबित हो रही है, क्योंकि खुशी केवल एक भावनात्मक अनुभव नहीं है, बल्कि इसका हमारे स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। खुश रहने वाले लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक मजबूत होती है और वे मानसिक रूप से भी अधिक संतुलित रहते हैं।
खुशी का सीधा संबंध हमारे सामाजिक संबंधों से भी है। जो लोग परिवार, मित्रों और समाज के साथ सकारात्मक संबंध बनाए रखते हैं, वे अधिक संतुष्ट और खुश रहते हैं। इसलिए जीवन में केवल सफलता ही नहीं, बल्कि मानवीय रिश्तों का होना भी महत्वपूर्ण माना जाता है। जब व्यक्ति खुश होता है तो शरीर में एंडोर्फिन, सेरोटोनिन और डोपामिन जैसे सकारात्मक हार्मोन सक्रिय हो जाते हैं, जो तनाव को कम करते हैं और मन को शांत रखते हैं। इसके विपरीत लगातार तनाव और नकारात्मक सोच शरीर में कई बीमारियों को जन्म देती है, जिनमें उच्च रक्तचाप, अनिद्रा, अवसाद और हृदय रोग शामिल हैं। आयुर्वेद में स्वास्थ्य को केवल शारीरिक अवस्था नहीं माना गया है, बल्कि इसे शरीर, मन और आत्मा के संतुलन की स्थिति कहा गया है। आयुर्वेद के अनुसार जब शरीर के तीन दोष वात, पित्त और कफ के साथ-साथ मन को भी संतुलित एवं प्रसन्न रखना आवश्यक है।
आयुर्वेद में मानसिक संतुलन को महत्वपूर्ण माना गया है। इसमें बताया गया है कि संतुलित आहार, नियमित दिनचर्या, योग, ध्यान और सकारात्मक विचारों से व्यक्ति मानसिक शांति प्राप्त कर सकता है। आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है कि यदि व्यक्ति प्रकृति के नियमों के अनुसार जीवन जीता है, तो उसका शरीर और मन दोनों स्वस्थ रहते हैं। सूर्योदय के समय उठना, स्वच्छ आहार लेना, नियमित व्यायाम करना और पर्याप्त नींद लेना ऐसी आदतें हैं जो शरीर के साथ-साथ मन को भी प्रसन्न रखती हैं।
आयुर्वेद में दिनचर्या और ऋतुचर्या का विशेष महत्व बताया गया है। यदि व्यक्ति अपनी जीवनशैली को प्रकृति के अनुसार ढाल ले तो वह कई शारीरिक और मानसिक समस्याओं से बच सकता है। सुबह जल्दी उठना, योग और प्राणायाम करना, पौष्टिक भोजन करना और समय पर सोना आयुर्वेदिक जीवनशैली के महत्वपूर्ण तत्व हैं। इससे शरीर में ऊर्जा बनी रहती है और मन शांत रहता है। आयुर्वेद में भोजन को औषधि के समान माना गया है। ताजे फल, हरी सब्जियां, अनाज, घी, दूध और औषधीय जड़ी-बूटियां शरीर को मजबूत बनाती हैं और मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद करती हैं। इसके साथ ही पर्याप्त नींद लेना, डिजिटल उपकरणों का सीमित उपयोग करना और प्रकृति के संपर्क में रहना भी खुशहाल जीवन के लिए जरूरी है।
अंतरराष्ट्रीय खुशी दिवस-2026 की थीम हमें यही सिखाती है कि तकनीक को खुशी का साधन बनाना है, न कि बोझ। सबसे पहले, सोशल मीडिया के उपयोग की सीमा तय करना जरूरी है। “डिजिटल डिटॉक्स” यानी कुछ समय के लिए तकनीक से दूरी बनाना मानसिक शांति के लिए बेहद लाभकारी हो सकता है।
लेखक : प्रोफेसर सतीश गंधर्व, डीन प्रभारी, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, पंचकूला




Leave a Reply
Want to join the discussion?Feel free to contribute!