खरी-अखरी : चीन, रशिया, ईरान और भारत क्या एक नये ग्रुप के तौर पर उभर कर सामने आयेंगे ?
चीन, रशिया, ईरान और भारत क्या एक नये ग्रुप के तौर पर उभर कर सामने आयेंगे ?
अमेरिका भारत के साथ ना ट्रेड डील कर रहा है ना ही टैरिफ को लेकर समझौता कर रहा है और इन सबके बीच जिस लहजे में वह वेंजुला, कोलंबिया, कनाडा, ग्रीनलैंड सहित ईरान को धमकी दे रहा है उससे भारत के भीतर लोकतांत्रिक परिस्थितियों में यह सवाल तो है कि अमेरिका के साथ ट्रेड डील की जाए या अपनी आर्थिक परिस्थितियां देखी जाए। अपने करीबी देशों के साथ संबंध बनाये जाएं या फिर अमेरिका जिस डील को अपनी शर्तों पर चाहता है उन शर्तों को मान लिया जाए। ईरान और ग्रीनलैंड पर अमेरिका जिस तरह की कार्रवाई करना चाहता है उसको लेकर दुनिया दो हिस्सों में बंटी हुई है। ईरान और ग्रीनलैंड को लेकर यूरोपीय कंट्रीज दोहरी मानसिकता रखती हैं। जहां एक ओर यूरोपीय कंट्रीजअमेरिका द्वारा ईरान में तख्तापलट करने का समर्थन करने की मानसिकता रखती हैं तो वहीं दूसरी ओर वेनेजुएला में की गई कार्रवाई की निंदा कर रही हैं, ग्रीनलैंड को लेकर किये जाने वाली कार्रवाई का विरोध कर रही हैं। ग्रीनलैंड को लेकर यूरोपीय कंट्रीज खुले तौर पर कह रही हैं कि यह नाटो पर हमला होगा। सवाल यह है – क्या ट्रंप चाहते हैं कि नाटो खत्म हो जाय ? तो नाटो को खोखला करने के लिए ट्रंप ने यह पहल की है ग्रीनलैंड को लेकर और नाटो मजबूत रहे इसको लेकर यूरोपीय कंट्रीज खड़ी हैं अमेरिका के पीछे ईरान में तख्तापलट को लेकर। मिडिल ईस्ट में इस बात को लेकर भय है कि अगर अमेरिका ईरान में तख्तापलट कर देता है तो फिर मिडिल ईस्ट देशों को कौन बचायेगा ? एशियाई देशों में कौन बचेगा ? ऐसा कौन सा देश होगा जिसे वह अपने ईशारे पर नहीं नचायेगा ? यह सवाल कहीं ना कहीं भारत के भीतर भी है टैरिफ और ट्रेड डील की उलझी हुई परिस्थितियों को लेकर। इसीलिए शायद इस मुश्किल घड़ी में भारत अपनी आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए चीन के साथ संबंधों को प्रगाढ़ बना रहा है। जिस तरीके से भारत चीन के करीब जा रहा है उसको लेकर अमेरिका के भीतर खास तौर से डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन्स के भीतर बैचेनी है कि भारत कैसे उस खेमे में जा सकता है जिससे आप लड़ाई लड़ रहे हैं ?
न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी इस खबर ने भी अमेरिका की पेशानी में बल ला दिए हैं जो कहती है कि ईरान अपने तौर पर अपनी फोर्थ जनरेशन आर्मी को मिनटों में खड़ा कर सकता है। चीन द्वारा ईरान को मार्डन एयरक्राफ्ट, फोर्थ जनरेशन के फाइटर प्लेन दिये जा रहे हैं। मिसाइल फैक्ट्री 24 घंटे काम कर रही है। वह 2000 से ज्यादा मिसाइल एक झटके में तैयार कर सकता है क्योंकि मिसाइल मटेरियल सोडियम पेट्रिऐट का भंडार है उसके पास। इन सबके बीच न्यूक्लियर बम बनाने के लिए यूरेनियम की सप्लाई भी चीन कर रहा है। ईरान की जो सीक्रेट साइट्स हैं वहां पर वह 24 घंटे के भीतर 11 न्यूक्लियर बम बना सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने जैसे ही सोशल मीडिया पर जब यह लिखा कि ईरान आजादी की तरफ देख रहा है और अमेरिका उसकी मदद के लिए तैयार है वैसे ही काउंटर करते हुए ईरानी स्पीकर ने पार्लियामेंट के भीतर यह ऐलान कर दिया कि इजराइल और अमेरिका दोनों उसके निशाने पर होंगे यानी ईरान के स्पीकर ने खुले तौर पर इजराइल और अमेरिका पर हमला करने का जिक्र कर दिया। मतलब अमेरिका भी अंतरराष्ट्रीय तौर पर युद्ध की परिस्थितियों के बीच खड़ा हो गया है। जब इजराइल और ईरान के बीच युद्ध हो रहा था तब अमेरिकी पार्लियामेंट के भीतर ट्रंप ने कहा था कि ईरान किसी भी हालत में अब परमाणु हथियार नहीं बना सकता है। हमने उसकी तमाम जगहों को पूरे तरीके से नष्ट कर दिया है। लेकिन अब ईरान दावा कर रहा है कि वह 24 घंटे के भीतर न्यूक्लियर बम बना सकता है।
और ऐसी ही रिपोर्ट न्यूयॉर्क टाइम्स ने छापी है। जहां चीन खुलेआम ईरान की मदद कर रहा है वहीं रशिया भी स्ट्रेटजिकली मदद करना शुरू कर चुका है। जिस वक्त ईरान के भीतर सत्ता के खिलाफ लोग सड़कों पर हैं उसी दौर में अमेरिका में बैठे क्राउन प्रिंस पहलवी भी वीडियो के जरिए ईरानी जनता से कह रहे हैं कि लोग सड़क पर उतरना जारी रखें क्योंकि अमेरिका कह रहा है कि अगर प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई होती है तो वह दखल देगा। इस दखलंदाजी का इंतजार इजराइल को भी है। वहीं लंदन में ईरानी दूतावास वहां पर भी एक प्रदर्शनकारी इस्लामिक गणराज्य का झंडा हटाकर 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के पहले जो झंडा होता था उसे लगा देता है और प्रदर्शनकारी नारे लगाते रहते हैं फ्री ईरान, डेमोक्रेसी फार ईरान। जिस तरह से ट्रंप ने ईरान की आजादी का जिक्र किया उसी तर्ज पर खेमनेई ने भी बकायदा सोशल मीडिया पर ट्वीट के जरिए कहा कि 14 दिनों तक युद्ध चला जिसमें सैकड़ों ईरानी मारे गए तो फिर अमेरिका ईरान के लोगों के साथ खड़ा कैसे हो सकता है ? ईरानियों को समझना चाहिए। खबरों के मुताबिक ईरान के भीतर 100 से ज्यादा शहरों में हिंसा हो रही है। दो सैकड़ा से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। तीन हजार के लगभग गिरफ्तारियां हो चुकी है। यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष उर्सला बेन ने सोशल मीडिया पर लिखा कि तेहरान की सड़कों और दुनिया भर के शहरों में आजादी की मांग कर रही ईरानी महिलाओं और पुरुषों के कदमों की गूंज सुनाई दे रही है। बोलने, इकट्ठा होने, यात्रा करने और सबसे बढ़ कर आजादी से जीने की आजादी के लिए यूरोप पूरे तरीके से उनके साथ खड़ा है। हम इन जायज प्रदर्शनों के हिंसक दमन की कड़ी निंदा करते हैं। हम सभी जेल में बंद प्रदर्शनकारियों को तुरंत रिहा करने की मांग करते हैं। और इन सबके बीच ईरान में पहली बार खुले तौर पर न्यायिक अधिकारियों को कह दिया गया है कि जो भी लोग सड़क पर हैं उनके खिलाफ तत्काल कानूनी कार्रवाई की जाए। ईरान के जनरल प्रोसिक्यूटर काजिम मुआदेही ने न्यायिक अधिकारियों को मुकदमा चलाने का जो निर्देश दिया गया है उसमें बकायदा कहा है कि दंगों में शामिल सभी लोगों पर एक ही आरोप तय करें “खुदा के खिलाफ युद्ध” जिसकी सजा है सजा-ए-मौत।
सवाल कई हैं। क्या वाकई ईरान का तख्तापलट तय है ? क्या ईरान वाकई परमाणु हथियारों से लैस हो जायेगा ? दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की दिशा में वह भी परमाणु युद्ध की दिशा में बढ़ जायेगी ? क्योंकि जो मैसेज वेनेजुएला से निकल कर आया है उसने अमेरिका की आर्थिक ताकत को मजबूत करने की दिशा में ट्रंप को लाकर खड़ा कर दिया है। तो क्या अब ईरान के भीतर के तेल और मिनरल भंड़ार पर अमेरिका की नजर है ? जिस तरीके से चीन भी रोड़ एंड बैल्ट परियोजना को दुनिया के 150 देशों के साथ जोड़ चुका है तो क्या अब उसकी ताकत को अमेरिका या कहें ट्रंप अपनी आर्थिक ताकत के दम पर चुनौती देना चाह रहे हैं ? यानी यह लड़ाई आर्थिक ताकत बनने की है। यानी दुनिया के भीतर जहां – जहां तेल मौजूद है, जहां – जहां मिनरल्स मौजूद है वहां – वहां अमेरिका अपनी ताकत के साथ कब्जा करना चाहता है। और इस परिस्थिति में चीन और रशिया अगर ईरान के साथ आकर खड़े हो रहे हैं तो क्या यह युद्ध की घोषणा होगी ? कनाडा में भी लोग ईरान के पक्ष में अमेरिका के खिलाफ सड़क पर हैं। अपने तौर पर अपनी नीतियों और मुद्दों को लेकर तेल अवीव में भी नेताओं का विरोध हो रहा है। अमेरिका के भीतर ट्रंप का विरोध हो रहा है। तो सवाल है कि ट्रंप या कहें अमेरिका का अगला कदम कौन सा होगा ? अगर वेंजुला के बाद अगला कदम ग्रीनलैंड की ओर उठता है अमेरिका का तो फिर नाटो कंट्रीज और यूरोपीय यूनियन क्या करेगी ? अगर कदम ईरान की ओर उठते हैं तो चीन और रशिया क्या करेंगे ? मिडिल ईस्ट का क्या होगा ? और अगर इससे हटकर सिर्फ और सिर्फ आर्थिक ताकत बनने के लिए एक नये सौदेबाज़ी के तौर पर सामरिक युद्ध की परिस्थितियों में लोगों को झोंकना है तो फिर यूनाइटेड नेशन क्या सोचेगा ?
अलग – अलग देशों को लेकर ट्रंप की अलग – अलग रणनीति पर दुनिया के अलग – अलग देशों का नजरिया क्या वाकई अलग – अलग है ? अगर चीन खुले तौर पर ईरान के साथ खड़ा है और जैसा कि न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में बढ़ चुका है और वह 24 घंटे के अंदर 11 परमाणु बम बना लेगा, 2000 से ज्यादा मिसाइल बनाने की क्षमता विकसित कर लेगा तो फिर रास्ता क्या होगा उस दिशा में जहां पर अमेरिका के साथ खास तौर पर इजराइल कह रहा है कि ईरान के साथ युद्ध अभी रुका नहीं है ? भारत जैसे देशों के सामने भी सवाल है कि वे अपनी अर्थनीति को मजबूत करने के लिए किस रास्ते पर चलें, कब तक इंतजार करें ? अमेरिका के साथ डील फाइनल करें या अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए चीन से समझौता करें ? भारत के लिए संदेश साफ है उसे अपनी ताकत बढ़ानी होगी। स्वतंत्र देश के तौर पर दुनिया के सामने मजबूती के साथ खड़ा होना होगा। यूरोप, अमेरिका, एशियन कंट्रीज और उसमें भी चीन, रशिया, ईरान और भारत क्या एक नये ग्रुप के तौर पर उभर कर सामने आयेंगे ? क्योंकि दुनिया दो हिस्सों में बंटती हुई दिखाई दे रही है। तो क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह सारा खेल खुद की राजनीतिक सुरक्षा के लिए बनाया है या फिर अमेरिका को अगेन ग्रेट बनाने के लिए बनाया है या अंतरराष्ट्रीय तौर पर अमेरिका की ताकत का अह्सास कराने के लिए के लिए किया है ?
अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार



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