भारत का संविधान: अतीत की विरासत और भविष्य की दिशा
प्रत्येक वर्ष 26 नवंबर को संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है। पाठकों को बताता चलूं कि इसे ‘राष्ट्रीय विधि दिवस’ के नाम से भी जाना जाता है। यह वही दिन है जब सन् 1949 में संविधान सभा ने भारत के संविधान को औपचारिक रूप से अंगीकृत किया था, जबकि इसे लागू 26 जनवरी 1950 को किया गया। बहुत कम लोग यह बात जानते होंगे कि भारत का मूल संविधान हाथ से लिखा गया है, तथा खूबसूरत कलाकृतियों से सजाया गया है और आज भी संसद भवन की लाइब्रेरी में एक विशेष हिलियम-युक्त केस में सुरक्षित रखा गया है। एक और कम ज्ञात तथ्य यह है कि संविधान निर्माण में डॉ. भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में बनी ड्राफ्टिंग कमेटी के अलावा कुल 22 समितियों ने अलग-अलग विषयों पर विस्तृत कार्य किया था। ध्यातव्य है कि 26 नवंबर की एक और बड़ी याद 2008 के मुंबई आतंकी हमलों की बरसी भी है। इस वजह से यह दिन हमें संविधान की रक्षा, देश की एकता और आतंकवाद के खिलाफ हमारी मजबूती की भी याद दिलाता है। इसलिए 26 नवंबर सिर्फ संविधान दिवस नहीं, बल्कि हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों, संस्थाओं पर भरोसे और देश की सुरक्षा के प्रति जागरूक रहने का खास मौका भी है। बहरहाल, यदि हम यहां पर भारतीय संविधान की विशेषताओं के बारे में बात करें तो भारतीय संविधान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे विस्तृत संविधान है, जिसमें देश की विविधता, संस्कृति और आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर प्रावधान बनाए गए हैं।
यह संविधान संघीय ढाँचे पर आधारित है, लेकिन केंद्र को पर्याप्त शक्तियाँ देकर इसे मजबूत संघ बनाया गया है। इसमें मौलिक अधिकारों के माध्यम से नागरिकों की आज़ादी और सम्मान की रक्षा की गई है, वहीं मौलिक कर्तव्यों से नागरिकों को राष्ट्र के प्रति जिम्मेदार बनने की प्रेरणा मिलती है। संविधान में धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, समानता और स्वतंत्र न्यायपालिका जैसी मूलभूत विशेषताएँ उसे आधुनिक और प्रगतिशील बनाती हैं। इसके अलावा, इसमें समय के साथ बदलाव की सुविधा भी है, जिससे संविधान बदलती परिस्थितियों के अनुरूप स्वतः विकसित होता रहता है। यही लचीलापन और व्यापकता भारतीय संविधान को दुनिया के सबसे सफल संविधानों में एक बनाती है। हमारे देश का संविधान दिवस हमें न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे लोकतांत्रिक आदर्शों को याद दिलाता है। यह सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का सम्मान है। वास्तव में, यह दिन हमें यह बताता है कि मजबूत लोकतंत्र मजबूत संवैधानिक संस्थाओं और कानून के शासन से ही कायम रहता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि भारतीय संविधान हमारे देश की नींव है। आज़ादी मिलने के बाद हमारे नेताओं ने मिलकर ऐसा नियम बनाया, जो हर नागरिक को अधिकार दे और देश को सही दिशा में चलाए। समय के साथ संविधान ने देश को मज़बूत लोकतंत्र बनाया, जहाँ हर व्यक्ति को बोलने, शिक्षा पाने, न्याय पाने और बराबरी का हक मिलता है। आज भी संविधान हमें सही और गलत में फर्क करने की ताकत देता है और सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाता है। आने वाले समय में तकनीक, इंटरनेट, सुरक्षा और समाज में होने वाले बदलावों के कारण नई चुनौतियाँ आएंगी, लेकिन संविधान की खासियत यही है कि यह समय के साथ बदलता है और देश को आगे बढ़ने का रास्ता दिखाता रहता है। इस तरह संविधान भारत के भूतकाल की शक्ति, आज की पहचान और भविष्य की दिशा-तीनों का आधार है।
हमारे देश का संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है , बल्कि यह हमारे स्वतंत्रता संघर्ष की आकांक्षाओं, बलिदानों और लोकतांत्रिक सपनों का परिणाम है। गौरतलब है कि 1946 में संविधान सभा का गठन हुआ और लगभग तीन साल तक विस्तृत बहसों, समितियों और चिंतन के बाद 26 नवंबर 1949 को हमारे देश का संविधान अंगीकृत हुआ। इसमें दुनिया के श्रेष्ठ लोकतांत्रिक मूल्यों को भारतीय परिस्थितियों और विविधता के अनुरूप ढाला गया, फिर चाहे वह मौलिक अधिकार हों, सामाजिक न्याय की अवधारणा हो या संघीय व्यवस्था। यह वह समय था जब भारत ने कानून के राज, समानता, धर्मनिरपेक्षता और स्वतंत्रता को अपनी राष्ट्र-आत्मा बनाया। आज समय बदल चुका है, लेकिन संविधान भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ है। यह न केवल शासन व्यवस्था का मार्गदर्शन करता है, बल्कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और सत्ता पर नियंत्रण का साधन भी है। न्यायपालिका से लेकर चुनाव आयोग तक कई संस्थाएं संविधान की भावना को लागू करती हैं।तकनीक, अर्थव्यवस्था, वैश्वीकरण और सामाजिक चेतना के तेज़ बदलावों के बीच संविधान एक स्थिर आधार प्रदान करता है। संविधान में समय-समय पर संशोधन की व्यवस्था इसे जीवंत और समय के अनुरूप बनाती है। हाल फिलहाल, सरल शब्दों में यह कहा जा सकता है कि आने वाले समय में हमारे संविधान के सामने कई नई चुनौतियाँ आएँगी-जैसे डिजिटल दुनिया में हमारी निजता की सुरक्षा, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और साइबर अपराध, जलवायु से जुड़ी समस्याएँ, केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल, और समाज में एकता बनाए रखना।भविष्य का भारत संविधान से जुड़ी दो ज़रूरी जिम्मेदारियाँ निभाएगा। पहली, संविधान और उसकी संस्थाओं की रक्षा करना, और दूसरी, समय के अनुसार ज़रूरी बदलाव करना, ताकि लोकतंत्र सबके लिए और बेहतर बन सके। संविधान आगे भी हमें यही सीख देता रहेगा कि देश तभी मजबूत होता है, जब लोग अपनी जिम्मेदारियाँ निभाएँ और सरकार ईमानदारी से काम करे।संविधान दिवस 2025 केवल एक औपचारिकता मात्र नहीं है, बल्कि अपने लोकतांत्रिक सफर का आत्ममंथन करने का अवसर है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि संविधान की मूल आत्मा- न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता वही है, जो देश और समाज को दिशा देती है। बीते कुछ वर्षों में नागरिकों में संवैधानिक जागरूकता उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है।
स्कूलों, विश्वविद्यालयों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर संविधान को समझने और उस पर चर्चा करने का माहौल मजबूत हुआ है। डिजिटल भारत के विस्तार ने शासन को अधिक पारदर्शी और संवेदनशील बनाया है, जिससे सामान्य नागरिक तक सरकारी सेवाएँ आसानी से पहुँचने लगी हैं। आज न्यायपालिका में ई-कोर्ट्स और वर्चुअल सुनवाई जैसी पहलें हमारे देश की न्याय प्रक्रिया को आधुनिक और सुलभ बनाने का संकेत देती हैं। साथ ही, सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी योजनाओं ने समाज के कमजोर वर्गों को नया आत्मविश्वास प्रदान किया है, जो संविधान के सामाजिक न्याय की भावना को और सशक्त बनाता है। हालाँकि, इन उपलब्धियों के बीच कुछ चिंताएँ भी कम नहीं हैं। लोकतंत्र की नींव समझी जाने वाली असहमति की संस्कृति कमजोर होती दिख रही है; अलग राय रखने वालों के प्रति असहिष्णुता बढ़ी है, जिससे संवाद की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और उनके बीच संतुलन पर उठते सवाल यह याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि मजबूत और निष्पक्ष संस्थाओं से चलता है। नागरिकों में अधिकारों के प्रति जागरूकता तो बढ़ी है, लेकिन कर्तव्यों की चेतना उतनी तीव्र नहीं दिखती। राष्ट्र के प्रति जिम्मेदार व्यवहार और सामाजिक सद्भाव की भावना को जितना विस्तार मिलना चाहिए था, वह अभी भी कहीं न कहीं अधूरा ही है। कुल मिलाकर, संविधान दिवस 2025 हमें यह सिखाता है कि हमने बहुत कुछ पाया है-जागरूकता, तकनीकी प्रगति और सामाजिक सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम। दूसरे शब्दों में कहें तो संविधान दिवस हमें यह सिखाता है कि एक देश तभी मजबूत बनता है, जब उसके नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी समझें। यह दिन हमें याद दिलाता है कि संविधान सिर्फ एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि यह तो हमारे देश की आत्मा है, जो हमें बराबरी, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व के रास्ते पर चलना सिखाता है। संविधान दिवस हमें प्रेरित करता है कि हम लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करें, विभिन्नताओं को स्वीकारें, और राष्ट्र की एकता तथा सामूहिक प्रगति के लिए मिलकर काम करें। यह दिन हमें यह भी समझाता है कि देश का भविष्य तभी सुरक्षित है, जब हम संविधान की रक्षा करें और इसे अपने व्यवहार का हिस्सा बनाएं।सच तो यह है कि भारतीय संविधान हमें अपने अधिकारों के साथ-साथ विभिन्न जिम्मेदारियों का भी बोध कराता है। पिछले वर्षों में पारदर्शिता और सामाजिक न्याय जैसे क्षेत्रों में प्रगति हुई है, लेकिन संवाद की संस्कृति, संस्थागत निष्पक्षता पर भरोसा और नागरिक कर्तव्यों की भावना जैसी मूल्यवान चीजें कुछ कमजोर पड़ी हैं।
संविधान दिवस हमें याद दिलाता है कि संविधान एक जीवंत दस्तावेज है, जिसे सिर्फ पढ़ने नहीं, बल्कि अपने दैनिक जीवन में अपनाने की आवश्यकता है।संविधान दिवस हमें यह याद दिलाता है कि अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्य भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। नागरिकों का प्रथम कर्तव्य है-संविधान का सम्मान करना और उसके आदर्शों को अपने व्यवहार में अपनाना। हमें राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय प्रतीकों और संस्थाओं का आदर करना चाहिए। कानून का पालन करना, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना, हिंसा और भेदभाव से दूर रहना भी हमारी जिम्मेदारी है। देश की एकता, अखंडता और सद्भाव बनाए रखना हर नागरिक का नैतिक कर्तव्य है। इसके साथ-साथ पर्यावरण की रक्षा करना, सार्वजनिक संपत्ति की देखभाल करना और समाज के हित में सकारात्मक योगदान देना भी संविधान द्वारा बताए गए प्रमुख कर्तव्यों में शामिल है।संक्षेप में, संविधान दिवस हमें सिखाता है कि एक जिम्मेदार नागरिक वही है, जो अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों का भी ईमानदारी से पालन करे। निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों को व्यवहार में उतारकर ही हम लोकतंत्र को मजबूत बना सकते हैं और उसके आदर्शों को सच में प्राप्त कर सकते हैं।
सुनील कुमार महला,
फ्रीलांस राइटर, कालमिस्ट व युवा साहित्यकार,
उत्तराखंड।





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