हम कब अपने बच्चों का नाम भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु रखेंगे?
शहीदी दिवस पर आत्ममंथन की जरूरत
आज 23 मार्च है —वह दिन जब भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। यह सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि बलिदान, साहस और क्रांति का प्रतीक है। लेकिन सवाल उठता है—क्या हम सच में इन शहीदों को याद रखते हैं? क्या हम सिर्फ उनके नाम पर फिल्में देखने और नारे लगाने तक सीमित रह गए हैं, या फिर उनके विचारों को अपने जीवन में उतारने की भी हिम्मत रखते हैं?
क्रांति के नायक, लेकिन कितनों के नाम भगत सिंह?
भगत सिंह पर कई फिल्में बनीं, किताबें लिखी गईं, भाषण दिए गए, लेकिन क्या आज का युवा सिर्फ मनोरंजन तक सीमित रह गया है? क्या हमने कभी सोचा कि हम अपने बच्चों का नाम भगत सिंह , राजगुरु , या सुखदेव क्यों नहीं रखते? क्या हमारे लिए फिल्मी सितारे और क्रिकेटर ही असली आदर्श बन गए हैं?
आज का यथार्थ यह है कि लोग अपने बच्चों का नाम किसी लोकप्रिय अभिनेता, खिलाड़ी या कारोबारी के नाम पर रखने में गर्व महसूस करते हैं, लेकिन भगत सिंह, सुखदेव या राजगुरु जैसे नामों की चर्चा शायद ही होती है। क्या यह हमारी चेतना की हार नहीं?

शहीदी दिवस का महत्व—सिर्फ एक तारीख या प्रेरणा?
23 मार्च 1931 को अंग्रेजों ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी थी। उस समय भगत सिंह मात्र 23 वर्ष के थे। इतनी कम उम्र में उन्होंने न सिर्फ अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दीं, बल्कि युवाओं के लिए प्रेरणा भी बने। उनकी शहादत ने पूरे देश में जोश भर दिया था, और यही ज्वार 1947 की आज़ादी में बदल गया।
लेकिन अब शहीदी दिवस का मतलब बस एक औपचारिक श्रद्धांजलि बनकर रह गया है। क्या हमें वाकई अपने इतिहास पर गर्व है, या फिर यह सिर्फ एक परंपरा निभाने भर तक सीमित है?
भगत सिंह की सीख, जो आज भी प्रासंगिक है
भगत सिंह सिर्फ एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि एक विचारक भी थे। उन्होंने अपने जीवन में जो बातें कहीं, वे आज भी हमें झकझोरती हैं:
- “बहरों को सुनाने के लिए धमाका जरूरी है।”
- “वो मुझे मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं मार सकते।”
- “जिंदगी तो अपने दम पर जी जाती है, दूसरों के कंधों पर तो सिर्फ जनाजे उठाए जाते हैं।”
- “आलोचना और आजाद सोच एक क्रांतिकारी के दो अनिवार्य गुण हैं।”
क्या हम इन विचारों को आत्मसात कर रहे हैं? या फिर सिर्फ सोशल मीडिया पर “इंकलाब जिंदाबाद” लिखकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर रहे हैं?
क्या भगत सिंह को सिर्फ फिल्मों तक सीमित कर दिया गया?
फिल्में जैसे “रंग दे बसंती” या “द लेजेंड ऑफ भगत सिंह” जब आती हैं, तो हम कुछ दिनों तक जोश से भर जाते हैं। लेकिन फिर वही रोजमर्रा की जिंदगी, वही समझौते, वही भूलने की आदत। हमें क्यों हर बार याद दिलाने के लिए फिल्मों की जरूरत पड़नी चाहिए, या फिर यह जिम्मेदारी हमारे अपने भीतर से आनी चाहिए?
आखिर कब रखेंगे हम अपने बच्चों का नाम भगत सिंह?
यह सवाल सिर्फ नामकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारी मानसिकता का प्रतिबिंब है। अगर हम सच में भगत सिंह के आदर्शों को मानते हैं, तो हमें सिर्फ उनका नाम नहीं, बल्कि उनके विचार भी अपने जीवन में उतारने होंगे।
अगर हम चाहते हैं कि भारत वह देश बने, जिसकी कल्पना भगत सिंह ने की थी, तो हमें उनके नाम को सिर्फ इतिहास की किताबों में नहीं, बल्कि अपनी सोच और जीवनशैली में भी उतारना होगा। यही शहीदी दिवस की असली सीख होगी।
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