शेयर बाजार ने तोडा 30 साल का रिकॉर्ड
भारतीय अर्थव्यवस्था का विरोधाभास: शेयर बाजार में हाहाकार, रुपया कमजोर लेकिन GDP बरकरार – आखिर ऐसा कैसे हो रहा है?
भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय एक अजीब विरोधाभास से गुजर रही है—जहां एक ओर शेयर बाजार में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है, रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर GDP ग्रोथ स्थिर बनी हुई है और सरकार इसे आर्थिक मजबूती का संकेत मान रही है। बीते पांच महीनों से भारतीय शेयर बाजार लगातार कमजोर प्रदर्शन कर रहा है, और 28 फरवरी को सेंसेक्स 1,414 अंक गिरकर 73,198 पर आ गया, जबकि निफ्टी 420 अंक की गिरावट के साथ 22,124 पर बंद हुआ। निफ्टी अक्टूबर 2024 से अब तक 12% तक लुढ़क चुका है, जो पिछले 28 वर्षों में पहली बार देखा गया है। बाजार में इस भारी गिरावट का मुख्य कारण विदेशी निवेशकों की बड़े पैमाने पर बिकवाली है, जिन्होंने अक्टूबर 2024 से फरवरी 2025 के बीच भारतीय बाजार से 3.11 लाख करोड़ रुपये निकाल लिए हैं। अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में संभावित बढ़ोतरी, चीन में बढ़ते निवेश अवसर और वैश्विक अनिश्चितताओं के चलते भारतीय शेयर बाजार पर दबाव बना हुआ है। दूसरी ओर, भारतीय रुपया भी लगातार कमजोरी का सामना कर रहा है और फरवरी 2025 के अंत तक डॉलर के मुकाबले 84.70 तक गिर चुका है, जो बीते छह महीनों में लगभग 4% की गिरावट दर्शाता है। रुपये की इस कमजोरी के पीछे कई कारण हैं—कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, विदेशी निवेशकों की वापसी, और वैश्विक स्तर पर डॉलर की मजबूती। रुपये में गिरावट का असर सीधे तौर पर महंगाई पर पड़ सकता है, जिससे आयात महंगा हो सकता है और देश की आर्थिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है। इन सब चुनौतियों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था का एक दिलचस्प पक्ष यह है कि GDP ग्रोथ अब भी स्थिर बनी हुई है। वित्त वर्ष 2024-25 की तीसरी तिमाही में GDP ग्रोथ 6.2% रही, जो दूसरी तिमाही के 5.4% से अधिक है। सरकार ने पूरे वित्त वर्ष के लिए 6.5% की GDP वृद्धि का अनुमान जताया है, जो कि वैश्विक मंदी के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शाता है। कृषि और सेवा क्षेत्र में मजबूत प्रदर्शन के कारण GDP ग्रोथ बनी हुई है, जहां कृषि क्षेत्र ने 5.6% और सेवा क्षेत्र ने 7.4% की वृद्धि दर्ज की है। हालांकि, मैन्युफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन सेक्टर अब भी धीमी ग्रोथ की समस्या से जूझ रहे हैं। लेकिन क्या वास्तव में भारतीय अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है, या फिर बाजार और मुद्रा की कमजोरी आने वाले समय में बड़ी आर्थिक चुनौती बन सकती है?
आइए, इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।
शेयर बाजार में लगातार गिरावट, निवेशकों को बड़ा झटका
भारतीय शेयर बाजार पिछले पांच महीनों से लगातार कमजोरी दिखा रहा है और निवेशकों के लिए यह बेहद मुश्किल दौर साबित हो रहा है। 28 फरवरी को सेंसेक्स 1,414 अंक गिरकर 73,198 पर आ गया, जबकि निफ्टी 420 अंकों की गिरावट के साथ 22,124 पर बंद हुआ। यह गिरावट महज एक दिन की नहीं है—पिछले पांच महीनों में निफ्टी लगभग 12% गिर चुका है, जो पिछले 28 वर्षों में पहली बार देखा गया है। यह मंदी सिर्फ घरेलू कारकों के कारण नहीं है, बल्कि वैश्विक कारणों ने भी इसे प्रभावित किया है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में संभावित बढ़ोतरी के संकेतों के बाद विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से भारी मात्रा में पैसा निकालना शुरू कर दिया है।
अक्टूबर 2024 से फरवरी 2025 के बीच विदेशी निवेशकों (FII) ने भारतीय शेयर बाजार से 3.11 लाख करोड़ रुपये निकाल लिए हैं, जो अब तक की सबसे बड़ी बिकवाली में से एक मानी जा रही है। इस बिकवाली के पीछे कई कारण हैं—अमेरिका में बढ़ती ब्याज दरें, चीन में निवेश के नए अवसर और यूरोपीय बाजारों में स्थिरता। इसके अलावा, घरेलू मोर्चे पर भी कई चिंताएं हैं—2024 के आम चुनावों के बाद सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर असमंजस, राजकोषीय घाटे को लेकर चिंताएं और कुछ सेक्टर्स में धीमी ग्रोथ।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार और RBI ने जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए तो यह गिरावट लंबी हो सकती है। निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ है, और बाजार में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। अगर आने वाले महीनों में बाजार में स्थिरता नहीं आई, तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर डाल सकता है, खासकर कॉर्पोरेट सेक्टर और स्टार्टअप्स के लिए, जिनके लिए फंडिंग का प्रमुख जरिया शेयर बाजार ही होता है।
रुपये में ऐतिहासिक गिरावट, महंगाई बढ़ने का खतरा
शेयर बाजार के साथ-साथ भारतीय रुपया भी मुश्किल दौर से गुजर रहा है। फरवरी 2025 के अंत तक डॉलर के मुकाबले रुपया 84.70 के स्तर तक गिर चुका है, जो बीते छह महीनों में लगभग 4% की गिरावट दर्शाता है। यह गिरावट कोई अचानक नहीं आई, बल्कि पिछले एक साल से रुपये में लगातार कमजोरी देखी जा रही है।
इसके पीछे कई प्रमुख कारण हैं—
- कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें: भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है, और जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो रुपये पर दबाव बढ़ता है।
- विदेशी निवेशकों की बिकवाली: जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालते हैं, तो वे डॉलर खरीदते हैं, जिससे रुपये की मांग घट जाती है और यह कमजोर होता जाता है।
- वैश्विक स्तर पर डॉलर की मजबूती: अमेरिकी अर्थव्यवस्था फिलहाल मजबूत स्थिति में है, जिससे डॉलर का मूल्य बढ़ा है और अन्य मुद्राओं की तुलना में रुपया कमजोर हुआ है।
- भारत का बढ़ता व्यापार घाटा: भारत का आयात, खासकर चीन से, लगातार बढ़ रहा है जबकि निर्यात में अपेक्षित तेजी नहीं दिख रही। इससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव बन रहा है।
रुपये में गिरावट का सीधा असर आम जनता पर पड़ता है। जब रुपया कमजोर होता है, तो आयात महंगा हो जाता है और देश में महंगाई बढ़ सकती है। इलेक्ट्रॉनिक्स, पेट्रोल-डीजल, दवाइयां और अन्य आयातित सामान महंगे हो सकते हैं, जिससे मध्यम वर्ग की जेब पर सीधा असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर रुपया 85 के पार चला गया, तो महंगाई दर और अधिक बढ़ सकती है और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को ब्याज दरें बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ सकता है।
GDP ग्रोथ स्थिर बनी हुई है, लेकिन क्या यह असली तस्वीर है?
शेयर बाजार में गिरावट और रुपये की कमजोरी के बावजूद, भारतीय अर्थव्यवस्था का एक मजबूत पक्ष यह है कि GDP ग्रोथ अब भी स्थिर बनी हुई है। वित्त वर्ष 2024-25 की तीसरी तिमाही में GDP ग्रोथ 6.2% रही, जो दूसरी तिमाही के 5.4% से अधिक है। पूरे वित्त वर्ष के लिए सरकार ने 6.5% की GDP वृद्धि का अनुमान जताया है, जो वैश्विक मंदी के बीच भारत की आर्थिक मजबूती को दर्शाता है।
GDP ग्रोथ के पीछे कुछ अहम कारण हैं—
- कृषि और सेवा क्षेत्र में मजबूती: कृषि क्षेत्र ने 5.6% की ग्रोथ दर्ज की है, जबकि सेवा क्षेत्र, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, 7.4% की दर से बढ़ा है।
- सरकारी खर्चों में वृद्धि: सरकार ने बुनियादी ढांचे और ग्रामीण क्षेत्रों पर अधिक खर्च किया है, जिससे GDP को सहारा मिला है।
- घरेलू मांग का बढ़ना: भारत में उपभोक्ता खर्च अन्य देशों की तुलना में मजबूत बना हुआ है, जिससे आर्थिक गतिविधियां जारी हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या GDP ग्रोथ की यह स्थिरता लंबे समय तक बनी रहेगी? विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बाजार में गिरावट जारी रही और रुपये की कमजोरी बढ़ती गई, तो इसका असर धीरे-धीरे GDP ग्रोथ पर भी पड़ सकता है। निवेशक अगर भारतीय बाजार से पीछे हटते हैं और कंपनियां नई भर्तियों और निवेश से बचने लगती हैं, तो आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।
क्या सरकार और RBI उठा रहे हैं जरूरी कदम?
सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) दोनों इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। वित्त मंत्रालय ने विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए नई नीतियों पर काम शुरू कर दिया है, जबकि RBI रुपये को स्थिर रखने के लिए बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है। हालांकि, कई विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ अल्पकालिक उपायों से समस्या हल नहीं होगी। सरकार को लंबी अवधि की योजनाएं बनानी होंगी, जैसे—
- बाजार में स्थिरता लाने के लिए नीतिगत फैसले लेना
- रुपये की गिरावट रोकने के लिए आयात नीति में सुधार
- विदेशी निवेशकों के विश्वास को बहाल करने के लिए मजबूत आर्थिक रणनीति
कुल मिलाकर, भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय एक मिश्रित स्थिति में है—एक ओर GDP ग्रोथ मजबूत बनी हुई है, लेकिन दूसरी ओर बाजार और मुद्रा की कमजोरी चिंता बढ़ा रही है। अगर सरकार और RBI ने सही समय पर ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले समय में यह विरोधाभास आर्थिक संकट में बदल सकता है। निवेशकों, उद्योग जगत और आम जनता—सभी को सतर्क रहने की जरूरत है।
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